स्थापत्य थैली के लिए प्रसिद्ध है कुशाल बिहारी

जयपुर रियासत के महाराजा सवाई माधोसिंह ने अपनी पटरानी कुशाल कंवर की स्मृति में भगवान श्रीकृष्ण और राधा को समर्पित भव्य मंदिर मथुरा के बरसाना में बनवाया। यह मंदिर अपनी स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर का निर्माण भरतपुर में स्थित बंसी पहाड़पुर से पत्थर लाकर करवाया गया। मंदिर का निर्माण १४ साल में पूरा हुआ था। यह मंदिर वर्ष १८१३ में बनकर तैयार हुआ था। महाराजा सवाई माधोसिंह की पटरानी कुशाल कंवर भगवान श्री कृष्ण और राधा की अनन्य भक्त थीं। महाराजा ने उनके इस प्रेम को देखते हुए उनकी मृत्यु के बाद बरसाना में गहवर परिक्रमा मार्ग पर राधारानी के प्रसिद्ध मंदिर के पास इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मुख्य मंदिर में श्यामवर्णी मुरलीधर और राधा रानी की प्रतिमा है। इसके एक तरफ हंसगोपाल जी तथा दूसरी तरफ नृत्य गोपाल जी के भी मंदिर हैं।
वर्तमान में यह मंदिर राजस्थान के देवस्थान विभाग के अधीन है। मंदिर में पाटोत्सव, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली आदि पर्वों पर विशेष झांकी और कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। बरसाना में गहवर की परिक्रमा करनेवाले भक्त इस मंदिर में मुरलीधर और राधा रानी के दर्शन करने आवश्य जाते है।
राधा रानी मंदिर बरसाना- बरसाना के मध्य पहाड़ी पर श्री राधा रानी जी का मंदिर है। इसी मंदिर को बरसाने में लाड़ली जी का मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण राजा श्री वीर सिंह ने १६७५ में करवाया था। राधा रानी जी को प्यार से बरसाना के लोग वृषभानु दुलारी भी कहा जाता है। राधाजी के पिता का नाम वृषभान जी और उनकी माताजी का नाम कीर्ति था। राधा रानी जी मंदिर बहुत ऊंची पहाड़ी पर बना है और श्री राधा रानी जी के मंदिर में जाने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी प़ड़ती हैं। बरसाने की लठमार होली भी संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है।
मोर कुटी बरसाना- मोर कुटी मंदिर लाल र्इंटों से बनाया गया है, जिसमें खिड़कियां नहीं हैं। मोर कुटी मंदिर, कुशाल बिहारी मंदिर और लाड़ली जी के मंदिर के नजदीक है। मोर कुटी मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की एक तस्वीर है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण मोर की तरह नृत्य कर रहे हैं, इसी मंदिर में भगवान श्री कृष्ण और मोर के बीच प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें भगवान श्री कृष्ण मोर से हार गए थे। संकरी खोर बरसाना— संकरी खोर, ब्रह्मगिरी पर्वत और विलास पर्वत के बीच का संकीर्ण मार्ग है। भगवान श्री कृष्ण अपने सभी सखाओं के साथ दान लीला किया करते थे। अक्सर गोपी अपने दूग्ध उत्पादों को बेचने के लिए बाजार में जाते थे। जब गोपियों को बाजार जाना होता था तो इसी मार्ग से गुजरते थे। तब भगवान श्री कृष्ण अपने मित्रों के साथ उनको रोक देते थे और दूध, दही और अन्य डेयरी उत्पादों के रूप में कर की मांगते थे। गोपियों से कर लेने के बाद ही भगवान श्री कृष्ण उनको वहां से जाने देते थे और जब कोई गोपी कर देने से मना कर देती थी तो श्री कृष्ण के सखा उस गोपी की मटकियां फोड़ देते थे।
कैसे पहुंचें- नजदीकी हवाई अड्डा दिल्ली में है। नजदीकी रेलवे स्टेशन कोसीकला है, जो मंदिर से लगभग कुछ किमी दूरी पर है। यह यहां का प्रमुख धार्मिक स्थान है और सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ।