स्मार्ट सिटी और आईओटी

पटना में पिछले दिनों पहले बाढ़ आई और पटना जिसे स्मार्ट सिटी बनाने के लिए घोषित किया गया था, वहां त्राहिमाम त्राहिमाम मच गया। मुख्यमंत्री जो खुद बाढ़ से पहले केंद्र से विशेष पैकेज मांग रहे थे और बाढ़ के बाद अखबार में विज्ञापन देकर जनता से विशेष पैकेज मांग रहे थे। आज के इस दौर में सीएम के उस बयान से खुद को शर्म आती है, जहां वह यह कह रहे थे कि यह मौसम की आपदा है। मौसम विज्ञानी सुबह कुछ और दोपहर कुछ और शाम कुछ और कहते हैं और ये तो हथिया नक्षत्र चल रहा है। ऐसे दौर में जब हम चांद और मंगल पर पहुंच रहे हैं एक ऐसे मुख्यमंत्री से जो इंजीनियर भी है, यह सुनना निराश करता है, एडवांस प्लानिंग ही तो उनकी जिम्मेदारी है।

पटना जिसे स्मार्ट सिटी बनना है कि यह आपदा प्राकृतिक कम मानव व तंत्रजनित ज्यादा थी। पटना नगर निगम और और बिहार के सरकारी इंजीनियर यदि स्मार्ट सिटी आइडिया पर व्याख्यान देने से आगे यदि इंटरनेट ऑफ थिंग्स पर बहस कर लेते तो शायद इसका समाधान मिल जाता और न तो ऐसा हादसा होता और न ही किसी सीवेज टैंक में किसी की मौत होती। आज की जल निकासी प्रणाली उच्च तकनीक नहीं है इसलिए जब भी रुकावट होती है तो रुकावट के सटीक स्थान का पता लगाना मुश्किल होता है। इसके अलावा रुकावट के शुरुआती अलर्ट प्राप्त नहीं होते हैं इसलिए रुकावट का पता लगाने और मरम्मत में समय लगता है। पाइप को पूरी तरह से अवरुद्ध होने पर स्थिति को संभालने के लिए यह बहुत असुविधाजनक हो जाता है। ड्रेनेज लाइन के लोगों को ऐसी विफलता के कारण बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें एक रुकावट के लिए जरूरत से कहीं ज्यादा गैर जरूरी जगहों पर रुकावट ढूंढ़ने का अनावश्यक खर्च और जान की भी हानि होती है। इन सब चीजों को इंटरनेट ऑफ थिंग्स के इस्तेमाल से दूर किया जा सकता है। आईओटी इसलिए जरूरी है क्योंकि यह मानव हस्तक्षेप के बिना काम करता है और अब कंप्यूटर वस्तुओं और उपकरणों से डेटा बिना मानवीय हस्तक्षेप के ऑटोमेटिक लेने में भी सक्षम हैं, जिससे लागत की कमी के साथ-साथ सटीकता भी प्राप्त होती है। इंटरनेट ऑफ थिंग्स में सेंसर का अहम रोल है, इस अवधारणा का विचार कम लागत, कम रखरखाव, तेजी से तैनाती और सेंसर की संख्या, लंबा जीवन-समय और सेवा की उच्च गुणवत्ता के कारण भी है।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स टेक्नोलॉजी स्मार्ट सिटी और स्मार्ट जीवन की एक एमर्जिंग टेक्नोलॉजी है, जिसका इस्तेमाल हिंदुस्थान में अब नगर निकायों और निगमों को करना चाहिए। यह पूर्णतया सुरक्षित कम लागत सेंसर आधारित होता है और इसे विश्व के कई देश प्रयोग कर रहें हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं घ्दऊ, या इंटरनेट ऑफ थिंग्स, एक छोटे, कम लागत, कम पॉवर कम बैटरी यूज करनेवाला, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के एक नेटवर्क के रूप में जाना जा सकता है, जहां डेटा और सूचनाओं का संचार सीधे मानव हस्तक्षेप के बिना होता है। प्रत्येक डिवाइस इस नेटवर्क में एक ‘स्मार्ट नोड’ के रूप में काम करता है, जो सूचनाओं को संवेदन और और निचले स्तर तक सिग्नल प्रसंस्करण का कार्य करता है और जो शोर से या अन्य स्रोतों से भी संकेतों को फिल्टर कर नोड-टू-नोड इंटरैक्शन के लिए आवश्यक बैंडविड्थ को भी कम करता है। नोड्स को केंद्रीकृत ‘क्लाउड’ के साथ संवाद करने की जरूरत होती है, जहां डेटा को सुरक्षित, संगृहीत और संसोधित किया जाता है और पुन: मनुष्यों को कार्रवाई योग्य जानकारी भेजी जाती है। इस प्रौद्योगिकी में छह प्रमुख चीजें होती हैं। कनेक्टिविटी, डेटा सेंसिंग, डेटा ट्रांसपोर्ट और एक्सेस में भूमिका, डेटा एनालिटिक्स, एक्शन द्वारा परिभाषित मूल्य और अंत में मानवीय मूल्य, एप्लिकेशन और अनुभव। इस आधुनिक तकनीक से ड्रेनेज सिस्टम में आई रुकावट का पता लगाने और ड्रेनेज सिस्टम से उस रुकावट को हटाने का तंत्र विकसित किया जाता है। जल निकासी में मैनहोल में मौजूद मॉड्यूल जो कि गैस सेंसर, स्तर संकेतक, आरएफआईडी के साथ माइक्रो कंट्रोलर इंटरफेस होता है, जब भी लेवल इंडिकेटर दो मैनहोलों के बीच किसी भी रुकावट की पहचान करता है तो यह अलार्म को ट्रिगर करेगा और रुकावट से दूरी के आधार पर अलग-अलग सिग्नल देकर उपयोगकर्ता को सटीक स्थान की जानकारी देगा। रुकावट के अलावा भी यह कई अन्य डेटा देता है जैसे पानी का लेवल कहां तक पहुंचा है, कौन-सी गैस है, इसे मौसम के भविष्यवाणी से भी कनेक्ट कर एडवांस अलार्म सिस्टम से जोड़ा जा सकता है। घ्ध्ऊ तकनीक पूरा सिस्टम जो कि ड्रेनेज सिस्टम में लगे सेंसर से लेकर कंट्रोल रूम तक जहां-जहां जुड़ा रहता है, कहां खराबी आई है?
इस सबके अलावा इंटरनेट ऑफ थिंग्स कचरा प्रबंधन में भी बड़ा कारगर होता है। आज के आधुनिक नगरीय प्रणाली में कचरा और जल निकासी यही दो मेजर इश्यु हैं और बदलते वक्त के साथ इन सबका इलाज इंटरनेट ऑफ थिंग्स ही है। कचरा संग्रहण प्रणाली के लिए धड़ल्ले से यूरोपियन देशों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स का प्रयोग हो रहा है। हर कचरे के डब्बे में एक सेंसर फिट होता है, जिसकी मॉनिटरिंग प्रणाली नगर निगम के कंट्रोल रूम में होता है, कचरा का डिब्बा कितना भरा है यह नगर निगम का कंट्रोल पैनल खुद ही देख लेता है और डिवाइस कनेक्टिविटी के तहत जुड़ी कचरा की गाड़ियों को कचरा संग्रह करने के आदेश का स्वत: ही सिग्नल भेज देता है, जिससे कचरा का डिब्बा भरते-भरते उसका संग्रहण हो जाता है। साथ ही यदि कोई कचरा का डिब्बा भरा है और यदि कचरे की गाड़ी उसके बगल से गुजरती है तो उसमे लगे सेंसर के कारण वहीं अलार्म बजने लगता है, जो यह बताता है कि यह डब्बा भर गया है और कचरावाली गाड़ी उसे उठा लेती है।
स्मार्ट सिटी बनाने के लिए दरअसल स्मार्ट वॉटर, स्मार्ट इलेक्ट्रिसिटी, स्मार्ट ट्रांसपोर्टेशन, स्मार्ट तंत्र आदि कई मापदंडों पर विचार करना होगा। स्मार्ट अंडरग्राउंड इंप्रâास्ट्रक्चर की भी जरूरत होगी, जिसमें अंडरग्राउंड वॉटर पाइपलाइन, कम्युनिकेशन केबल, गैस पाइपलाइन, इलेक्ट्रिक फ्लो आदि आदि शामिल हैं। हिंदुस्थान के अधिकांश शहरों ने भूमिगत जल निकासी प्रणाली को अपनाया है, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि यह प्रणाली जो अपनाया गया है यह शहर को साफ, सुरक्षित और स्वस्थ रखने के लिए उचित तरीके से काम करे। यदि वे जल निकासी प्रणाली को बनाए रखने में विफल रहते हैं तो शुद्ध पानी भी जल निकासी से दूषित हो सकता है और संक्रामक रोग पैâल सकते हैं इसलिए इन भूमिगत प्रणालियों का पता लगाने, उन्हें बनाए रखने और प्रबंधित करने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स तकनीक का प्रयोग बहुत जरूरी है। इसके अलावा लीकेज हो जाना, पाइप का फट जाना आदि जल वितरण प्रणाली प्रबंधन के अपरिहार्य पहलू हैं, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है और लंबी अवधि के लिए अनपेक्षित छोड़ दिए जाने पर जल वितरण नेटवर्क के भीतर भारी नुकसान के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
आज के दौर में मुकेश अंबानी ने खुद ही घोषणा की है कि हिंदुस्थान में आगे के ५ वर्ष में २५० करोड़ डिवाइस IOT से जुड़ेंगे, जिसमें से ४०% पर उसका लक्ष्य है तो बाकी ६०% मार्केट के लिए भी भारत में बहुत स्कोप है। IOT नेटवर्क के लिए जिस तरह के सिग्नल की जरूरत होती है उसमे मौजूदा २जी/३जी/४जी या ५जी की लागत ज्यादा हो सकती है, रिलायंस NB-IOT तकनीक के साथ साथ आ रहा है जबकि दुनिया में LoRA एवं Sigfox की नेटवर्क टेक्नोलॉजी भी इसपर बहुत तेजी से काम कर रही है, जिसकी नेटवर्क विस्तार लागत सामान्य नेटवर्क विस्तार लागत से बहुत ही कम है और इनके प्रयोग से डिवाइस की बैटरी लाइफ बहुत ज्यादा। देश के नगर निगमों को इंटरनेट ऑफ थिंग्स के इस्तेमाल के लिए एक कमेटी बनाके इस पर काम करना चाहिए तभी हिंदुस्थान में स्मार्ट सिटी बन सकती है।