स्वप्ना का सपना, सोना हुआ अपना

अगर आपने सपना देखा है कि गोल्ड मेडल लाना है तो लाना ही है फिर उसके लिए चाहे कितना भी संघर्ष क्यों न करना प़ड़े। बंगाल के जलपाईगुड़ी की स्वप्ना ने गोल्ड का सपना देखा और उसे हासिल करके ही दम लिया। उसके इसी दृढ़ संकल्प का परिणाम था कि दांत में दर्द के बावजूद स्वप्ना बर्मन ने एशियाई खेलों की हेप्टाथलोन प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर एक नया इतिहास रच दिया है। इतिहास इसलिए क्योंकि वह इन खेलों में सोने का तमगा जीतनेवाली पहली भारतीय हैं। स्वप्ना के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां हैं। पांव की अतिरिक्त चौड़ाई खेलों में उसकी लैंडिंग को मुश्किल बना देती है, जिसकी वजह से उनके जूते जल्दी फट जाते हैं। २००६ से २०१३ तक स्वप्ना के कोच रहे सुकांत सिन्हा के अनुसार वह काफी गरीब परिवार से आती हैं और उसके लिए अपनी ट्रेनिंग का खर्च उठाना मुश्किल था। जब वह चौथी क्लास में थी, तब ही मैंने उसमें प्रतिभा देख ली थी। इसके बाद मैंने उसे ट्रेनिंग देना शुरू किया। २१ वर्षीय बर्मन ने दो दिन तक चली सात स्पर्धाओं में ६,०२६ अंकों के साथ सोना जीता।१८वें एशियाई खेलों में एक बार फिर देश का मान महिला एथलीट ने बढ़ाया, जिस पर भारत गर्व महसूस कर रहा है तो उनका गृहनगर जलपाईगुड़ी जश्न में डूबा हुआ है। स्वप्ना ने इस बात को साबित कर दिया कि असुविधा से हताश होने की बजाय उस पर मात करने की मन में यदि ठान लो तो ईश्वर भी मदद करता ही है।
हेप्टाथलोन में एथलीट को कुल ७ स्टेज में हिस्सा लेना होता है। पहले स्टेज में १०० मीटर फर्राटा रेस होती है। दूसरा हाई जंप, तीसरा शॉट पुट, चौथा २०० मीटर रेस, ५वां लांग जंप और छठा जेवलिन थ्रो होता है। इस इवेंट के सबसे आखिरी चरण में ८०० मीटर रेस होती है। इन सभी खेलों में एथलीट को प्रदर्शन के आधार पर अंक मिलते हैं, जिसके बाद पहले, दूसरे और तीसरे स्थान के एथलीट का फैसला किया जाता है। हेप्टाथलोन में स्वप्ना ने ऊंची कूद में (१,००३ अंक) और भाला फेंक (८७२ अंक) में पहला तथा गोला फेंक (७०७ अंक) और लंबी कूद (८६५ अंक) में दूसरा स्थान हासिल किया था। उनका खराब प्रदर्शन १०० मीटर (९८१ अंक, पांचवां स्थान) और २०० मीटर (७९० अंक, सातवां स्थान) में रहा। सात स्पर्धाओं में से आखिरी स्पर्धा ८०० मीटर में उतरने से पहले बर्मन ने चीन की क्विंगलिंग वांग पर ६४ अंक की बढ़त बना रखी थी।
 एक रिक्शाचालक की बेटी द्वारा एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतना किसी सपने से कम नहीं है। स्वप्ना की सफलता से खुश मां बाशोना इतनी भावुक थीं कि उनके मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। उन्होंने बेटी की खातिर भगवान से पूरे दिन प्रार्थना की, जिसका फल उन्हें मिला और बेटी ने देश में उनका नाम रोशन कर दिया। मां पूरे दो घंटे तक प्रार्थना करने में लीन रहीं, जिसकी वजह से वह अपनी बेटी को इतिहास रचते हुए नहीं देख सकीं। स्वप्ना के माता-पिता का हाल पल-पल में बदल रहा था। वह जितना खुश थे, उतना ही भावुक होते हुए अपनी परेशानियों के बारे में बता रहे थे क्योंकि स्वप्ना को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने भी कड़ी तपस्या की है। स्वप्ना के पिता पंचन बर्मन रिक्शा चालक हैं। पिछले कुछ समय से वो अस्वस्थ हैं और इसी वजह से बिस्तर पर हैं। स्वप्ना की मां ने बताया कि वे अपनी बेटी की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती थीं, लेकिन कभी उनकी बेटी ने इसकी शिकायत नहीं की। मां बशोना के अनुसार ‘यह उसके लिए आसान नहीं था। हम उसकी जरूरत पूरी नहीं कर पाते थे, पर उसने कभी शिकायत नहीं की। एक समय ऐसा था जब स्वप्ना को एक जोड़ी जूता पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था।