स्वभाविक है मधु अभिलाषा

पृथ्वी तमाम गंध, कीट-पतंग, वन-पर्वत, नदी, सागर और हम सबका भार लादे हुए सतत गतिशील है। इसके अंतस् में अनंत अक्षय मधुकोष है। गन्ना या र्इंख में मिठास पृथ्वी ही भरती है। आम, अमरूद, सेब, संतरा और अंगूर भी पृथ्वी के मधुरस से मीठे हैं। किसी-किसी अंगूर में गाढ़ी मिठास होती है। शक्कर ही शक्कर। शक्कर के भारी घनत्व के बावजूद अंगूरी लता को मधुमेह जैसी बीमारी नहीं होती।
स्वाद दिखाई नहीं पड़ता। सबके अपने स्वाद बोध हैं इसलिए सबका स्वाद भी अलग-अलग है लेकिन मीठा सबको प्रिय है। वैदिक पूर्वज मधुप्रिय जान पड़ते हैं। मधु फूलों के रस से बनता है। फूलों से रस लेकर अपना घर-नगर बनानेवाली मक्खियां मधुमक्खी कही जाती है। मधु नाम का यह रस प्रत्यक्ष रूप से पदार्थ है और स्वाद में मिठास का पर्यायवाची। ऋग्वेद और अथर्ववेद मधुरस से भरे पूरे हैं। मैं भी स्वाभाविक रूप से मधु प्रिय हूं लेकिन बैठे-बैठे काम करने की लत के चलते जीवन के उत्तरकांड में मधुमेही हो गया हूं। मधु स्वाद का अनुभव पुराना है। मधुप्रियता के संस्कार पूर्वजों से हम तक छाए हुए हैं। संभवत: कर्म, श्रम तप के पूर्वज संस्कार नहीं उतरे। प्रकृति का सृजन भी वैâसा मधुमय है? शरीर में शर्करा बढ़ती है। शरीर के तमाम अंगों को जीर्ण करती है लेकिन घटती है तो जीवन को ही समाप्त करने की ठान लेती है। शर्करा का बढ़ना सामान्य घटना है लेकिन शर्करा का घटना बहुत बड़ी घटना। मैंने शर्करा के घटने को प्रत्यक्ष देखा है कई बार। तब प्राण मधु प्यासे हो जाते हैं। मधु ही मधु मांगते हैं और चुटकी भर शर्करा पाकर लहालोट हो जाते है। प्रकृति ने रोगों को भी पूरी तन्मयता और मधुमयता के साथ बनाया है। संप्रति मधुमेह नाम का रोग समाज में प्रतिष्ठित होने का प्रतीक बन गया है। चाय में शक्कर न डालने का निर्देश देनेवाले मित्र प्राय: मुख्य अतिथि होते हैं। ज्यादातर प्रतिष्ठित मित्र इसी वर्ग के विशिष्ट अतिथि हैं।
हम सबका मधुमेही वर्ग पूरी तौर पर सेकुलर है। इसमें जाति, क्षेत्र, मजहब और दक्षिण वाम के भेद नहीं हैं। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों का उल्लेख है। मैं उनसे ईर्ष्या करता हूं। वे जुड़वा देवता हैं। जुड़वा होना नई बात नहीं है। बहुत लोग जुड़वा जन्म लेते हैं। दोनों के रूप, रंग आदि प्राय: एक जैसे होते हैं। माता-पिता दोनों के नाम अलग-अलग रखते हैं लेकिन वैदिक अश्विनी युगुल हर बात में एक जैसे हैं। दोनों के नाम एक ही हैं। दोनों तरुण हैं। दोनों कमल फूलों की माला पहनते हैं। दोनों एक ही रंग के हैं। ऋषि उन पर मोहित हैं लेकिन अपनी कविता के प्रति सजग हैं। कहते हैं ‘हे अश्विनीद्वय! तुम हमारे मंत्रों जैसे ही सुंदर हो। तुम वैसे ही मधुमय संयुक्त हो। जैसे मधु वचन बोलते दो होंठ।’ ऋषि ने दोनों को हिरण्यवर्ण व मधुवर्ण वाला बताया है। हिरण्य का अर्थ सुनहरा या कांतिमान चमकता पीतवर्ण है लेकिन मधुवर्ण का अर्थ क्या किया जाए? मधु एक स्वाद है। मधु शहद भी है। क्या शहद के रंग जैसे को मधुवर्ण कहा गया है? अश्विनी कुमारों की क्षमता दिव्य है। वे मधुवर्ण के साथ मधुहस्त हैं। उनके हाथ भी मधु से भरे हैं। वे ऋषि कवि को मधु देते हैं। तब ऋषि आज की तरह ‘नो शुगर प्लीज’ नहीं कहते होंगे।
मधु पदार्थ सबको आकर्षित करते हैं। स्वाभाविक भी है। भीतर मधुअभिलाषा हैं। मैं फूलों पर बैठी मधुमक्खियों को ध्यान से देखता हूं। वे गुनगुनाती हैं। एक साथ गाती हैं। शास्त्रीय संगीत नहीं जानती। शास्त्रीयता मनुष्य की रची है। मनुष्य के अतिरिक्त कोई भी जीव अपनी भाषा बोली का व्याकरण नहीं गढ़ते। मनुष्येतर प्राणी का जैसा मन वैसी वाणी। सत्य और सौंदर्य एक साथ। मधुमक्खियां मिलकर भी गाती हैं। उनकी गूंज अनुगूंज प्रिय लगती हैं। वे रस लेने के लिए फूलों की प्रदक्षिणा करती हैं। फूल पर देर तक नहीं बैठतीं। गाते हुए थोड़ा-सा रस लेती है। बैठने से फूल को क्षति हो सकती है। संभवत: यह बात वे जानती हैं। तितलियां भी फूल पर अपना भार नहीं लादती। एक दो पल फूल पर बैठी उड़ गई दूसरे फूल पर। सभी जीव सुंदर होते हैं। मधु अभिलाषा से युक्त होते हैं। अश्विनी देव मधुप्रिय हैं, उनका वाहन मधु से लदाफंदा हैं। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व मधुरसा है। आश्चर्य है उनको मधु अधिकता की कोई बीमारी नहीं है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण स्पष्ट है कि वे ऋग्वैदिक काल के चर्चित वैद्य भी हैं। मधुविद्या के जानकार थे ही। दूसरा कारण उनकी गतिशीलता है। वे लोकमंगल के लिए सतत सक्रिय रहते हैं। जो सतत चलता है, सतत सक्रिय है, उसे रोग शोक नहीं होते।
पृथ्वी तमाम गंध, कीट-पतंग, वन-पर्वत, नदी, सागर और हम सबका भार लादे हुए सतत गतिशील है। इसके अंतस् में अनंत अक्षय मधुकोष है। गन्ना या र्इंख में मिठास पृथ्वी ही भरती है। आम, अमरूद, सेब, संतरा और अंगूर भी पृथ्वी के मधुरस से मीठे हैं। किसी-किसी अंगूर में गाढ़ी मिठास होती है। शक्कर ही शक्कर। शक्कर के भारी घनत्व के बावजूद अंगूरी लता को मधुमेह जैसी बीमारी नहीं होती। सोचता हूं कि अंगूर सहित सभी मीठे फल अपनी शक्कर का स्वाद नहीं लेते। उसका उपभोग वे स्वयं नहीं करते। वे अहैतुक मिठास भरते हैं। स्वयं मिठाई का रस नहीं लेते। उनकी मिठास ‘उद््देश्यहीन उद्देश्य’ होती है। इमैनुअल कांट ने दर्शन में इसी तरह के उद्देश्य को ‘परपजलेस परपज’ कहा है। प्रकृति ने हम लोगों में रक्त शर्करा श्रम साधना के लिए भरी है। हम श्रम साधना नहीं करते। शर्करा नियंत्रक पैंक्रियाज नाम के देवता कोप में आते हैं। अपना काम छोड़ देते हैं और मधुमेह हो जाता है। यहां किसी चिकित्सीय विश्लेषण का दावा नहीं है। शिक्षित मित्र इसका कारण तनाव बताते हैं। मुझे सामान्यतया तनाव नहीं रहता लेकिन जितना तनाव रहता है, उतने तनाव को लेकर एक अलग तनाव रहता है। इस नए तनाव का क्या करें?
प्रकृति ने मनुष्य की शारीरिक संरचना में बड़ी बुद्धि लगाई है। जैसे प्रकृति प्रखर बौद्धिक-इंटेलीजेंट संरचना है वैसे ही मनुष्य। प्राकृतिक जीवनचर्या में शरीर मन बुद्धि और प्रीति आत्म स्वस्थ रहते हैं। प्रकृति विरुद्ध आचरण में सब कुछ गड़बड़ा जाता है। मैं प्रतिदिन लिखता हूं। लिखते समय आनंद मिलता है। कभी-कभी हमारा लिखा बहुत सारा बिल्कुल नया दिखाई पड़ता है। विद्वान नए कथ्य या सृजन को मौलिक कहते हैं। मौलिक का अर्थ है मूल से संबंधित। प्रकृति के अंतस् से उगा कोई तत्व आदि। सोचता हूं कि क्या लेखक का काम प्राकृतिक है? घंटों मेज पर झुके-झुके लिखने से गर्दन की नसें और संधि क्षेत्र कस गए हैं। चिकित्सक इसे स्पांडलाइटिस कहते हैं। मेरा मन कहता है कि लिखना प्राकृतिक आचरण नहीं होगा। बेशक लिखने के विषय में प्रकृति से एकात्म भाव बनता है लेकिन लिखने की कार्रवाई सृजन के साथ-साथ एक भौतिक श्रम भी है। बोलने में ऐसी शारीरिक कार्रवाई नहीं करनी पड़ती। शरीर का मधु बैठे-बैठे लिखने की कार्रवाई में ठीक उपापचय का भाग नहीं बनता। मेरे पास जरूरत से ज्यादा मधु है लेकिन असहाय हूं कि मैं इसका अन्यत्र सदुपयोग नहीं कर सकता। तो भी सृजन और सकारात्मक लोकमत के निर्माण में संलग्न हूं। मधु प्रिय मैं हूं ही।
अश्विनी देव वैदिक मधुप्रियता के शिखर प्रतीक हैं। ‘उनका रथ मधु वाहक है। रथ मधु अन्न से भरा है। वे जल को भी मधुर बनाते हैं। वे मधुइच्छा वाले हैं। उनका मुख मधु पीता है।’ तमाम प्रशंसा के बाद ऋषि कवि मधु को महत्वपूर्ण प्राप्य बताते हैं कि मधु प्राप्ति के लिए घोड़े जोतो पूरे मार्ग को मधु से भर दो।’ आगे देवों से स्तुति है ‘जैसे आप विद्वानों के पास जाते है वैसे ही हमारे यहां आओ और मधु पियो।’ यहां देवताओं के प्रति मित्र भाव है। कोई अंधविश्वास नहीं। वे देवों को घर आकर बुलाकर मधु पीने का न्यौता देते हैं। जान पड़ता है कि तब के प्रतिष्ठित लोग मधुप्रिय थे। दूर की बात नहीं है। हम सबके घर आए अतिथि का स्वागत मिठाई से होता था। क्या इसी काव्य का आधुनिकीकरण कर सकते हैं? ‘आओ मित्र हमारे घर। शुगर प्रâी चाय तैयार है। बिना शक्कर का मिष्ठान्न खिलाएंगे।’ मधु प्रियता जस की तस है। मधु अप्रिय नहीं हुआ लेकिन जीवन पद्धति के चलते हमारे जैसे लोग मूल मधुरसा पंक्ति से बाहर हैं। मधुवाणी अभी भी संभव है। मधुर मिलन को शुगर प्रâी करना उचित नहीं। मधु अभिलाषा बनी रहे, यही कामना है।