स्वयंभू हैं धाकलेश्वर महादेव

महालक्ष्मी मंदिर के पास धाकलेश्वर महादेव का एक शिव मंदिर है। इस मंदिर की मूर्ति ‘स्वयं भू’ बताई जाती है। कहते हैं कि ३०० वर्ष पहले मुंबई के एक व्यापारी धाकजी भाई सुबह-सुबह समुद्र के किनारे सैर कर रहे थे। समुद्र किनारे चलते-चलते उन्हें भगवान शिव की एक मूर्ति दिखाई पड़ी। जब वे वहां पहुंचे तो सच में वह शिव मूर्ति ही थी। धाकजी भाई ने उस शिव लिंग को वहीं पर स्थापित कर एक मंदिर बनवाया, जो धाकलेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समुद्र तट से सटे इस मंदिर में यूं तो शिव भक्तों की हमेशा भीड़ होती है लेकिन सावन महीना आते ही यहां का नजारा बदल जाता है। तुलसीदास गोपाल जी ट्रस्ट द्वारा संचालित धाकलेश्वर मंदिर में संत-महात्मा तथा भक्तों की भारी भीड़ रहती है। शिव भक्त सावन महीने को शिव जी का प्यारा महीना मानते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी महीने में माता पार्वती ने शिवजी का कठोर व्रत कर उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया था। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद जब सभी देवता सो जाते हैं तब भूतभावन भगवान भोलेनाथ समस्त चराचर जगत का भरण-पोषण करते हैं ताकि उनकी निद्रा भंग न हो। इसीलिए सावन महीना शिव जी की पूजा के लिए अति उत्तम महीना माना जाता है। इस महीने में लघुरुद्र, अतिरुद्र तथा महारुद्र पाठ के विधान से की गई पूजा-अर्चना से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
धाकलेश्वर मंदिर में शिव भक्त विविध प्रकार से अभिषेक करते हैं। शिव भक्त गंगाजल, बिल्व पत्र, दूध, दही, शहद, शक्कर, चावल, फल, फूल आदि अर्पित कर उनकी आराधना करते हैं। मंदिर प्रबंधक उमेश चक्रवर्ती कहते हैं कि यहां सावन महीने के प्रत्येक सोमवार के दिन घी तथा बर्पâ से भगवान शिव की विशेष प्रतिमा बनाई जाती है। बर्फानी बाबा के इस दर्शन के लिए शिवभक्त भारी संख्या में उपस्थित होते है