स्वरूप आरोग्यवर्धनी वटी दिलाता है जलोदर रोग में आराम!

मेरी उम्र ४६ वर्ष है। मेरे मसूढ़े खराब हो रहे हैं। सत्रह-अट्ठारह वर्षों तक मैंने पान, तंबाकू, गुटखा खाया परंतु अब सब बंद कर दिया है। दांत भी पीले व खराब हो गए हैं। कृपया मसूढ़े और दांतों की सेहत के लिए मुझे कोई टिप्स बताएं?
– राजेंद्र प्रजापति, भिवंडी
दांत खूबसूरत हों तो चेहरे पर निखार आता है व चेहरा आकर्षक लगता है। यदि दांतों की उचित देखभाल न की जाए तो मसूढ़े भी प्रभावित होकर आपके व्यक्तित्व व छवि को प्रभावित करते हैं। दांतों को कम-से-कम दो बार साफ करें। ब्रश या दातून का इस्तेमाल करते वक्त ध्यान रखें कि मसूढ़ों की मालिश हो। बहुतांश लोग टूथब्रश का उपयोग गलत ढंग से करते हैं, जिसके कारण दांतों व मसूढ़ों को क्षति पहुंचती है। टूथ ब्रश कड़ा होने अथवा जोर से रगड़ने पर यह तकलीफ होती है इसलिए उंगली की सहायता से दंत मंजन किया जाए तो बेहतर है। सप्ताह में एक बार गर्म तिल तेल अथवा राई के तेल को लेकर मसूढ़ों की मालिश करनी चाहिए। देशी दंत मंजन या घर में निर्मित दंत मंजन बाजार में मिलनेवाले टूथपेस्ट से बेहतर हैं। दातून नीम और बबूल का हो तो वो बहुत ही श्रेष्ठ है। खाना खाने के बाद व्यक्ति को कुल्ला यानी मुंह अवश्य साफ करना चाहिए। बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, पान, सुपारी आदि से परहेज करें। दांतों में फंसे हुए अन्न के कणों को पिन, टाचनी, माचिस की तीली अथवा नुकीली चीजों से न निकालें। इससे मसूढ़े जख्मी हो जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में रहनेवाले लोग अखरोट की छाल का इस्तेमाल दांतों के लिए करते हैं जो कि दांतों में निखार उत्पन्न करता है।
मेरे पिताजी को गाऊट की बीमारी है। पिछले ८ वर्षों से उन्हें ब्लड प्रेशर भी है और उसकी दवा चल रही है। वे लंगड़ाकर चलते हैं। उन्होंने झायलोरिक की गोलियां भी खाई हैं। पिताजी की उम्र ४९ वर्ष है। कभी-कभी वे सोशल ड्रिंक भी करते हैं। हमें पंचकर्म करना है। हमें पंचकर्म उपचार व पथ्य बताएं?
– विनय गोयल, मालाड
आयुर्वेद में गाऊट बीमारी सहृदय वातखत व्याधि बताई गई है। वातखत व्याधि की चिकित्सा में पंचकर्म चिकित्सा बहुत ही उपयोगी है। इस व्याधि में जोड़ों में दर्द रहता है। विशेषत: यह हाथ व पैर के अंगुष्ठमूल से शुरू होती है। वहां दर्द, लालिमा व ज्वर रहता है। साथ ही साथ रक्त में यूरिक एसिड का प्रमाण बढ़ जाता है। सामान्यत: यूरिक एसिड ६ तक रहता है।
वैâशोर गुगुलु की दो-दो गोली, गुडुची घन दो-दो गोली तथा आरोग्यवर्धनी वटी की दो-दो गोली दिन में तीन बार दें। अमृतारिष्ट व मंजिष्ठादि क्वाथ दोनों तीन-तीन चम्मच एवं ६ चम्मच सादा पानी मिलाकर दिन में ३ बार लें। मांस-मछली, काजू-पिस्ता, अरहर दाल, पनीर, मशरूम, प्रâाइड फूड, वेफर, केक आदि बंद कर दें। हाई प्रोटीनवाले खाद्य पदार्थ कम करें। पंचकर्म में शूल कम करने व शरीर के कुपित दोषों को कम करने के लिए जलौका लगाकर रक्तमोक्षण करना चाहिए। जलौका अशुद्ध रक्त पीकर कुपित दोषों को बाहर निकाल देती है। विरेचन (जुलाब) से सार्वदैहिक शरीर की शुद्धि हो जाती है। विरेचन लेने के बाद शरीर में लघुता, जोड़ों का दर्द कम होकर अधिक भूख लगती है। पंचकर्म करने के लिए मरीज को आयुर्वेद अस्पताल में प्रविष्ट कराएं तो चिकित्सा बेहतर ढंग से होगी। आप पिताजी की ब्लडप्रेशर की गोली नियमित रूप से चालू रखें व उसकी रीडिंग प्रत्येक सप्ताह लेते रहें।
मेरे चाचाजी की उम्र ७२ वर्ष है। उन्हें प्रोस्टेट वैंâसर है। उसकी सर्जरी व प्राथमिक दवाएं दी जा चुकी हैं। फिलहाल अभी कोई तकलीफ नहीं दिखाई दे रही है। परंतु डॉक्टरों ने प्रत्येक छह महीने में जांच कराने को कहा है व उसके पुन: होने की संभावना बताई है। हमें आयुर्वेद की दवा बताएं, जिससे हम उन्हें स्वस्थ रख सकें?
– हरमीत सिंह, कलंबोली, नई मुंबई
आप नियमित रूप से अपने चाचाजी को प्रत्येक ६-६ महीने में परीक्षण करवाते रहें। मैं आपको आयुर्वेद की दवाओं की सलाह दे रहा हूं जो कि निश्चित रूप से उपयोगी व प्रभावशाली हैं व पुन: होने से रोकती हैं तथा शरीर में व्याधि प्रतिकार शक्ति बढ़ा, शरीर को स्वस्थ रखती हैं। चंद्र प्रभावटी व गोक्षुरादि गुगुलु की दो-दो गोलियां दिन में ३ बार पानी के साथ लें। बगशील फोर्टेज (अलारसीन कंपनी) की दो-दो गोलियां दो बार भोजन के बाद लें। वरुणादि क्वाथ तीन-तीन चम्मच दो बार समप्रमाण पानी मिलाकर लें। इसके अलावा गुडुची (गिलोय) घन की दो-दो गोली दो बार लें। वार्धक्य, कर्क रोग व वैंâसर की थेरेपी के कारण शरीर में पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है। अत: संतुलित पौष्टिक आहार खाने में लें। अंकुरित धान्य, घी आदि का प्रयोग करें। खाने में फल व सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं। मांसाहार कम करें। तीखा मिर्च-मसाला कम करें। पेट साफ रहे, मलबद्धता न हो इसलिए रात को सोते समय एक चम्मच पंचसकार चूर्ण गरम पानी के साथ लें। हल्का-फुल्का व्यायाम करें। अश्विनी मुद्रा करें। मन को प्रसन्नचित्त रखें और तनाव न पालें।
मेरे पेट में पानी भर गया है। डॉक्टरों ने ‘असाइटिस’ बताया है। उठने-बैठने, चलने-फिरने में बहुत तकलीफ हो रही है। पेट बढ़ता जा रहा है। बाकी शरीर दुबला और पतला होते चला जा रहा है। डॉक्टरी उपचार चालू है परंतु कोई विशेष फर्क नहीं पड़ रहा है। तीन से चार हफ्ते में एक बार डॉक्टर लोग पेट का पानी निकाल देते हैं। जीवन कष्टमय होता जा रहा है। मेरी उम्र ४४ वर्ष है। कृपया आयुर्वेदिक उपचार बताएं?
– रवि कुमार, बांद्रा
आपके पत्र से स्पष्ट है कि आप जलोदर रोग से पीड़ित हैं। आयुर्वेद में वर्णित उदर रोग के आठ प्रकारों में से एक व्याधि जलोदर है, जो कि कष्टकारी है। पेट में कई कारणों से पानी भर सकता है। आपने अपने पत्र में इसका कोई उल्लेख नहीं किया है। यदि इसका उल्लेख होता तो बेहतर होता। सिरोसिस ऑफ लीवर, टीबी, वैंâसर व अन्य कई कारणों से इस रोग की संभावना होती है। प्राथमिक चिकित्सा स्वरूप आरोग्यवर्धनी वटी की दो-दो गोली तथा पुर्ननवाष्टक क्वाथ ६-६ चम्मच दिन में तीन बार लें। गोमूत्र का सेवन नियमित रूप से करें। आधा कप गोमूत्र काढ़े में मिलाकर एक बार लें। ‘अभयादि मोदक’ की गोली दिन में एक बार रात को सोते समय लें। ठोस आहार पूरा बंद करें। आहार के रूप में केवल गौदुग्ध का ही सेवन करें। आयुर्वेद के माध्यम से इस कष्टकारी जलोदर को पूरी तरह नियंत्रित करने में सफलता मिलती है। रोगी को आयुर्वेदिक रुग्णालय में भर्ती कराकर विरेचन व अन्य पंचकर्म उपचार कराएं। मुंबई शहर के किसी भी आयुर्वेदिक महाविद्यालय के रुग्णालय से संपर्क कर चिकित्सा शुरू कराएं। यदि संभव हो तो आप अपनी अन्य रिपोर्ट की झेरॉक्स प्रति हमें भेज दें, जिससे हम आपको उचित सलाह दे सकें।