‘स्वामी’ को जो चाहिए वही होगा!

शिवाजी महाराज का ‘स्वामित्व’ किसी एक पार्टी के पास नहीं। महाराष्ट्र राज्य की ११ करोड़ मराठी जनता ही शिवराय का वंश। शिवराय ही महाराष्ट्र के ‘स्वामी’। ‘स्वामी’ को जो चाहिए वही होगा!

महाराष्ट्र के प्रत्येक कार्य में शिवराय का नाम लेने की प्रथा है, इससे राजनीति भी अछूती नहीं है। हम शिवराय के बताए रास्ते पर चलते हैं, ऐसा राजनीतिज्ञ कहते रहते हैं। मतलब वे सही में क्या कर रहे हैं? उसे तलाशना पड़ता है। ‘शिवराय का आशीर्वाद केवल हमें मतलब भाजपा को है।’ ऐसा प्रचार चुनाव में हुआ। सातारा के शिवराय के वंशज उदयनराजे ने भाजपा में प्रवेश किया और छत्रपति हमारे साथ हैं, ऐसा प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेताओं ने सातारा के प्रचार सभा में कहा था। सातारा की जनता ने उदयनराजे भोसले को पराजित किया। ये पराजय छत्रपति के विचारों की नहीं बल्कि व्यक्ति की थी। छत्रपति शिवाजी महाराज का उल्लेख ‘कौन बनेगा करोड़पति’ इस कार्यक्रम में ‘शिवाजी’ ऐसा किया तो लोग आक्रोशित हो गए और आखिरकार अमिताभ बच्चन को माफी मांगनी पड़ी। ये श्रद्धा, महत्व की है। महाराष्ट्र की राजनीति शिवराय के विचारों से सही में चल रही है क्या?
वे स्वराज्य थे
शिवाजी महाराज का राज्य बहुत बड़ा अथवा विशाल नहीं था, फिर भी वे स्वराज्य थे। शिवाजी महाराज का प्रदेश हमेशा अस्थिर (ळहोूूत् ग्ह a fत्लर््े) नहीं था, ऐसा कहकर मराठा साम्राज्य का विभाजन स्वराज्य व मुगलाई ऐसी थी, ये दिखाया जाता है। शिवराय की पत्रिका का वर्णन करते हुए कवि परमानंद कहते हैं कि शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के सिर पर पैर रखकर स्वराज्य की स्थापना की। इसी तरह ‘औरंगशाह को खुद ही दिल्ली में वैâद’ इस अंग्रेजी रिकॉर्ड में शिवाजी महाराज के वाक्य ने बहुत कुछ स्पष्ट किया है। शिवाजी महाराज का उल्लेख कुछ इतिहासकारों ने सिर्फ ‘शिवाजी’ ऐसा किया है। ऐसा उल्लेख करने से महाराष्ट्रवासियों के स्वाभिमान को ठेस लगेगी, ऐसा कटाक्ष दत्तो वामन पोतदार ने जदुनाथ सरकार पर किया था। ‘शिवाजी’ अथवा ‘शिवाजी महाराज’ ऐसा नाम निर्देश न करते हुए फारसी साधन के ‘शिवा’ यही नामाभिधान जदुनाथ सरकार इस्तेमाल कर रही है। इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पोतदार पूछते हैं कि उन्हें ‘जदुनाथ’ ऐसा संबोधित न करते हुए केवल ‘जदू’ ऐसा कहें तो वैâसा लगेगा? अपने युगपुरुष को ‘शिवा’ ऐसा कहना संपूर्ण मराठी समाज को अपना ही अपमान हुआ ऐसा लगेगा। ऐसा दत्तो वामन पोतदार ने उस समय के इतिहासकारों को चेताया था। वर्तमान में शिवाजी महाराज पर एक जातीय अधिकार कहनेवालों को दत्तो वामन पोतदार द्वारा दी गई टक्कर को भूलना नहीं चाहिए।

राजनीतिक व्यापार
शिवाजी महाराज को हमने एक दायरे में बैठाने का प्रयत्न किया। शिवाजी महाराज के नाम का इस्तेमाल राजनीतिक व्यापार में पहले हो चुका है। गुजरात में सरदार पटेल का ऊंचा स्मारक बनाया गया लेकिन ‘युगपुरुष’ शिवाजी महाराज का समुद्र में बननेवाले स्मारक की एक र्इंट भी नहीं रखी गई है। शिवराय ने पराक्रम किया। उनके मुकाबले का ‘योद्धा’ हुआ नहीं। उस समय आज के जैसी संचार, संपर्क के साधन नहीं थे फिर भी शिवराय के शौर्य की गाथा सभी को पता चलती थी। महाराज के पराक्रम की कीर्ति दूर आसाम तक पैâली हुई थी। आसामी भाषा में बखरी को ‘बुरंजी’ ऐसा कहते थे। इस पादशाही बुरंजी का अंग्रेजी भाषांतर उपलब्ध है। औरंगजेब के करीबी रिश्तेदार शाइस्ता खान को शिवाजी महाराज ने पराजित किया। ये कार्रवाई पूना में हुई। औरंगजेब के कड़े अनुशासनवाला होने के चलते उन्होंने शाइस्ता खान का तबादला आसाम-बंगाल के सूबेदार के रूप में किया। खान के वहां जाने पर वहां के स्थानीय राजा पूछते हैं, ‘शाइस्ता खान तुम वही हो न जिसकी उंगलियां शिवाजी महाराज ने काटी थीं?’ आज के जैसे संचार माध्यम न होते हुए भी यह गाथा आसाम तक पहुंची क्योंकि शिवाजी महाराज के नाम के इर्द-गिर्द था शौर्य का तूफान।

लड़ाई का उद्देश्य
शिवाजी महाराज की लड़ाइयों पर विचार करते समय हम सिर्फ औरंगजेब के साथ हुई लड़ाइयों पर चर्चा करते हैं लेकिन उस तरह की कई लड़ाई महाराज लड़ते थे और जीतते थे। फत्तेखान की लड़ाई रंगदार है। महाराज ने आदिल शाह के खिलाफ पहली बड़ी लड़ाई शिरवल के पास वेलसर गांव में की। फत्तेखान की उसमें पराजय हुई। ऐसा केवल नाम की ओर न देखकर फत्तेखान कौन, मुस्तैद खान कहां का? इसे समझना चाहिए। ये जीत उतनी ही बड़ी थी। इसके बाद महाराज ने अनेक जीत हासिल की। वो इतिहास भले ही सभी को पता हो पर उस लड़ाई, कार्रवाई और चढ़ाई का उद्देश्य क्या था? उससे क्या साध्य करना था, यह देखना पड़ता है। शिवाजी महाराज द्वारा लड़ी गई हर लड़ाई सत्ता के लिए नहीं थी, कई बार वो स्वाभिमान की थी।

हिंदुस्थान में कई परदेसी आए। उन्होंने शिवाजी महाराज, अकबर बादशाह, औरंगजेब को देखा लेकिन अंग्रेजी भाषा में जो गाथा लिखी गई वो सिर्फ शिवाजी महाराज की! उन्हें क्यों लगा कि शिवाजी महाराज की गाथा लिखी जाए, शिवाजी महाराज ऐसे कौन थे, जिनके बारे में उन्हें अपनी भाषा में लिखने को मन हुआ?
अ‍ॅबे करे को ही देखिए। उन्होंने शिवाजी महाराज के प्रांत से यात्रा की। वो प्रâेंच इंसान राजापुर (कोकण) में जाता था। वहां प्रâेंचों की बखार थी। वे क्या किए, उन्होंने स्वयं ही कहा है। चौल के गवर्नर ने उनका स्वागत किया और कहा कि, ‘मुझे राजापुर जाना है। आपके प्रदेश से जाना पड़ेगा।’ आगे हुई चर्चा में प्रâांस देश का विषय निकला तब ‘तुम्हारा राजा कौन, तुम्हारा कायदा-कानून वैâसा है?’ ऐसी उन्होंने पूछताछ की?

उल्टा अ‍ॅबे करे ने शिवाजी महाराज के संदर्भ में पूछा। उस समय उन्हें जो कहा गया वो महत्वपूर्ण है। ‘मेरे वे स्वामी हैं। उन्हें सिंधु से गंगा तक प्रदेश जीतना है।’ ऐसी बहुत सी जानकारी अ‍ॅबे करे ने दी है। लेकिन सवाल ऐसा है कि शिवराय का ध्येय क्या था? शिवाजी महाराज के बारे में चौल के गर्वनर ने करे को जो कहा उसका उल्लेख उसे क्यों करना चाहिए ऐसा लगा?
ये कोई काल्पनिक नहीं है बल्कि तारीख व समय अनुसार दिया गया है। शिवाजी महाराज जब कारवार जा रहे थे तब वहां ब्रिटिश व्यापारी थे। उन्होंने बहुत सुंदर वर्णन किया है, ‘जूलियस-सीजर जैसा शिवाजी जहां जाते हैं वहां देखते हैं और जीतते हैं।’ ये अंग्रेजी लेखक शिवराय की जूलियस-सीजर की तरह ही हानिबाल और अन्य से तुलना करते हैं। सीजर, हानिबाल और सार्टोरीस ये आम आदमी नहीं थे। यूरोप के इतिहास में उनका नाम है। वे सभी महान योद्धा थे। उन्हें अपने संदर्भ में क्या लगता है? उनको इन योद्धाओं से शिवाजी महाराज की तुलना क्यों करें, ऐसा लगा? उनके द्वारा लिखे गए पत्रों में इसका उल्लेख करें, ऐसा उन्हें क्यों लगा? ये सभी बातें देखकर उनका विचार करना ही चाहिए। ये निरपेक्ष सबूत हैं।
इतिहास के पन्नों-पन्नों पर इसका उल्लेख है। शिवाजी महाराज ने जो बोया वही महाराष्ट्र में और देश में उगा। महाराष्ट्र की मिट्टी में ढोंग और अहंकार नहीं चलता यही, शिवराय की सीख है। शिवाजी महाराज के नाम से राज्य चलता है। उनके नाम की शपथ ली जाती है। वचन दिया और लिया जाता है। वो वचन न निभानेवाले राजनेता के रूप में घूम रहे हैं जिससे महाराष्ट्र का अधोपतन शुरू हो गया है, ऐसा समझना होगा। महाराष्ट्र ने ‘स्वामिकार्य’ को प्राथमिकता दी। आज ‘स्वामिकार्य’ शुरू है। शिवराय एक जाति, एक पक्ष के नहीं हैं। महाराष्ट्र ये शिवराय का वंश। ११ करोड़ जनता ही वंशावली। ‘स्वामी’ को जो चाहिए वही होगा।