हकीम बन गया शायर

साहित्य कला की दुनिया में तकरीबन हर लेखक अपने नाम के आगे उपनाम जोड़ता है, ताकि लोग उसे उसके उपनाम से पहचान सकें। पहले लोग अपनी जन्मभूमि या जनपद के नाम से अपनी कविता या शायरी करते थे। कोई अपने नाम के आगे इलाहाबादी लिखता, तो कोई बनारसी, तो कोई आजमी, कोई फर्रुखाबादी, तो बिजनौरी। ऐसे कम ही लोग होंगे जो उनके असली नामों से वाकिफ होंगे। फिल्मी दुनिया के सदाबहार गीतों को लिखनेवाले एक शायर थे मजरूह सुल्तानपुरी।
मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार हुसैन खान था। पिता पुलिस की नौकरी करते थे और आजमगढ़ में पोस्टेड थे। असरार का जन्म आजमगढ़ में ही हुआ। पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी पढ़े। लिहाजा उन्होंने मदरसे में उनका नाम लिखवा दिया। उर्दू के साथ ही उन्होंने अरबी और फारसी की पढ़ाई पूरी की। यूनानी पद्धति से मेडिकल की पढ़ाई कर वे हकीम बन गए। लोगों की नब्ज देखकर वे मरीजों का इलाज करते थे। डॉक्टरी पेशे के साथ ही उन्हें शायरी लिखने का बड़ा शौक था। लखनऊ में डॉक्टरी पेशे के दौरान ही उन्हें एक तहसीलदार की बेटी से प्यार हो गया। लेकिन उनका वो प्यार सफल नहीं हुआ। प्यार में असफल होने के बाद उन्होंने अपना शायराना नाम ‘मजरूह’ रखा। हिंदी में ‘मजरूह’ का मतलब ‘घायल’ होता है। वे सुल्तानपुर के रहनेवाले थे इसलिए अपना नाम मजरूही सुल्तानपुरी रख लिया। जहां कहीं भी मुशायरा होता वे उसमें शिरकत करते और मजरूह के नाम से शायरी करते।
एक मुशायरे के दौरान ही उनकी मुलाकात मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से हुई और वे उनके शागिर्द बन गए। मुशायरों में मजरूही खूब वाह-वाही लूटते। एक बार दक्षिण मुंबई के साबू सिद्दीकी स्कूल में उनका मुशायरा रखा गया। वहां फिल्मी दुनिया के कई लोग तशरीफ लाए थे। फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार ने जब उनकी शायरी सुनी तो उन्होंने जिगर मुरादाबादी से कहा कि इस शायर से कहो कि हमारी फिल्म के लिए भी कुछ लिखे। जब जिगर मुरादाबादी ने मजरूह से फिल्मी गीत लिखने को कहा तो उन्होंने इंकार करते हुए कहा कि मैं अपना मुशायरा नहीं छोड़ सकता। काफी मान-मनौव्वल के बाद वे तैयार हुए और उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाया गया। उस समय नौशाद फिल्म ‘शाहजहां’ के लिए काम करते थे। नौशाद ने उन्हें एक धुन सुनाई और उनसे कहा कि इसी मीटर पर कुछ लिखकर दो। मजरूह ने लिखा- ‘जब उसने गेसू बिखराए बादल झूम के आए…’ नौशाद को ये गीत बेहद पसंद आया और उन्होंने उस फिल्म के लिए कारदार से कहकर उन्हें अनुबंधित कर लिया। उस फिल्म में गायक एवं अभिनेता के.एल. सहगल थे। उस जमाने में हीरो-हीरोइन अपना गीत खुद ही गाते थे। नौशाद ने जब उनसे प्रेम में घायल प्रेमी पर कुछ लिखने को कहा तो उन्होंने लिखा- ‘जब दिल ही टूट गया हम जी के क्या करेंगे…’। ये गीत उस समय इतना पॉप्यूलर हुआ कि सहगल की मृत्यु के बाद उनकी इच्छा को पूर्ण करने के लिए ये गीत बजाया गया। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से लेकर रंगीन फिल्मों तक मजरूह साहब ने ‘लेके पहला पहला प्यार…’, ‘सिर पर टोपी लाल हाथ में रेशम का रूमाल…’, ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां…’, ‘ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी…’, ‘छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा…’, ‘हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक…’ जैसे अनगिनत गीत लिखे। अपने उसूल के पक्के मजरूह सुल्तानपुरी को एक बार जेल भी जाना पड़ा। लोगों ने उनसे कहा कि वे माफी मांग लें तो छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन उन्होंने माफी नहीं मांगी बल्कि अपनी पूरी सजा जेल में रहकर काटी। १९९३ में उन्हें ‘दादासाहेब फालके’ अवॉर्ड से नवाजा गया। २४ मई, २००० को निमोनिया से जूझते हुए उन्होंने इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।