हत्याकांड से उपजे सवाल

कानून-व्यवस्था को लेकर चौतरफा विपक्ष के हमले झेल रही योगी सरकार के लिए हिंदू महासभा नेता कमलेश तिवारी की हत्या कोढ़ में खाज साबित हो रही है।
बीते १५ दिनों में भाजपा और हिंदू संगठनों से जुड़े पांच लोगों की हत्या ने योगी सरकार से विपक्ष ही नहीं अपनों को भी आंदोलित कर दिया है। पश्चिम यूपी में सभासद धारा सिंह, कमलेश तिवारी, बस्ती में युवा नेता कबीर तिवारी, मेरठ में वकील मनोज सिंह सहित ताबड़तोड़ कई हत्याओं के बाद योगी सरकार का इकबाल खतरे में है। तमाम दावों के बाद राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री के दावे खरे नहीं उतर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यूपी में जंगलराज होने की टिप्पणी कर योगी महाराज को मानो नीचा दिखाने का ही काम किया है।
हिंदू समाज पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदू महासभा के वर्विंâग ग्रुप के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की शुक्रवार को हुई दिन-दहाड़े हत्या का राज पुलिस ने खोल दिया है। गुजरात में सूरत से तीन तथाकथित हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया है जिनमें एक मौलाना भी है। हत्याकांड को सुलझाने का दावा गुजरात पुलिस ने किया है और उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसकी हां में हां मिलाई है। हालांकि हत्याकांड के खुलासे और अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद भी योगी सरकार पर उंगलियां उठ रही हैं। हत्या में शामिल दो लोगों का सुराग लखनऊ में उस होटल से भी मिला है जहां वो ठहरे थे। हत्या की गुत्थी सुलझाने को लेकर लगातार गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है।
मृतक हिंदू नेता कमलेश तिवारी के घरवाले प्रदेश सरकार पर पर्याप्त सुरक्षा न देने का आरोप जड़ रहे हैं। उनका कहना है कि कई बार हत्या की आशंका जताने के बाद भी कमलेश की सुरक्षा को पुख्ता नहीं किया गया। मृतक की मां ने चीख-चीखकर कहा कि अखिलेश सरकार में उनके बेटे की मौत का फतवा जारी हुआ पर बाल भी बांका नहीं हुआ और अब योगी सरकार में उसका बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। शुक्रवार को कमलेश के घरवालों ने भाजपा के एक स्थानीय बड़े नेता को भी हत्या के लिए कटघरे में खड़ा कर दिया था। सीधे-सीधे इस नेता शिव कुमार गुप्ता का नाम लेते हुए कमलेश की मां ने कहा कि उनके परिवार की जबरिया मुख्यमंत्री से पुलिस ने मुलाकात करवाई जबकि शोक के १३ दिनों में यह नहीं किया जाता है।
महज २४ घंटे में ही आपसी रंजिश की बात से पलटकर गुजरात पुलिस की साजिश पर यकीन कर लेनेवाली यूपी पुलिस और सरकार को कमलेश समर्थकों का सड़क पर व सोशल मीडिया पर गुस्सा झेलना पड़ रहा है। प्रदेश में कमलेश के लिए कई जिलों में प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्ष के साथ ही खुद सरकार पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने भले ही कमलेश तिवारी हत्याकांड की गुत्थी सुलझाते हुए हत्यारों को गिरफ्तार करने का एलान कर दिया हो पर इस पूरे मामले में घरवालों, समर्थकों और एक अकेला चश्मदीद जो वहां मौजूद था। उनके अलग-अलग दावे तमाम सवाल खड़ा करते हैं। कमलेश की हत्या के बाद पत्नी ने जो एफआईआर दर्ज कराई है। उसमें पश्चिमी यूपी के उसी मौलाना अनवारुल हक का नाम है जिसने कुछ समय पहले उसकी मौत का फतवा जारी किया था। कमलेश की हत्या करनेवाले को बिजनौर के मौलाना अनवारुल ने ५१ लाख का ईनाम देने का एलान किया था।
उधर कमलेश की मां ने हत्या के कारणों में स्थानीय भाजपा के एक बड़े नेता से आपसी रंजिश बताया है और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। कमलेश के अन्य घरवाले जिनमें एक चाचा भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों की साजिश पर पुलिस को ध्यान देने को कहा है। वहीं हत्या के पहले वहां मौजूद कमलेश का कार्यालय सहायक सौराष्ट्रजीत सिंह का कहना है कि हत्यारे जान-पहचानवाले थे और उन्होंने भैया कहकर पैर छुए थे व माफी मांगी थी। सौराष्ट्र का कहना है कि हत्यारे किसी मुस्लिम लड़की की हिंदू लड़के से शादी करवाने में मदद की बात कर रहे थे। उसने बताया कि कुछ देर बैठने के बाद उसे सिगरेट-गुटखा लाने के लिए भेज दिया गया और इसी बीच हत्या हो गई। सौराष्ट्र का तो यहां तक कहना है कि कमलेश और हत्यारों में इस कदर घनिष्ठता थी कि सिगरेट का पैसा देने की दोनों में होड़ लगी। तब कमलेश ने हत्यारों में से एक को रोकते हुए कहा कि एक ही बात है मैं पैसा दे रहा हूं। गुजरात पुलिस का दावा है कि कमलेश की हत्या मुस्लिम अतिवादी संगठनों की शह पर सूरत में रची गई और हत्यारे भी यहीं से गए। हत्यास्थल पर सूरत में खरीदी गई मिठाई का डिब्बा उसके इस दावे की पुष्टि भी करता है। हालांकि यूपी पुलिस कल तक हत्या को आपसी रंजिश व अन्य विवादों की परिणिति बता रही थी पर अब उसने इस मामले में चुप्पी साधते हुए गुजरात पुलिस के खुलासे को पत्रकारों के सामने पढ़ते हुए उसे मान लिया है। गुजरात पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाते हुए लखनऊ में हत्या के कुछ ही घंटे बाद संदिग्धों को पकड़ लिया था। न तो यूपी और न ही गुजरात पुलिस ने यह साफ किया कि हत्यारे लखनऊ में काम को अंजाम देने के बाद कितनी जल्दी सूरत पहुंच गए। यह भी हैरतअंगेज है कि घटनास्थल पर सूरत में खरीदी मिठाई का डिब्बा छोड़ने के बाद हत्यारे फिर वहीं आराम से क्यों पहुंच गए जबकि हत्या को पेशेवर और खूंखार गिरोह का कारनामा माना जा रहा है।
अयोध्या पर पैâसले का इंतजार
पिछले कई सालों से न्याय के इंतजार में शांत पड़ी अयोध्या में इन दिनों फिर से हलचल है। साधु-संतों के चेहरों पर सुकून है तो अयोध्या के बाशिंदे बेसब्री से इंतजार में है। शताब्दियों से चल रहे इस विवाद के हल होने का आस देश के अन्य लोगों से कहीं ज्यादा अयोध्या के लोगों को है जो इस पौराणिक शहर की दुर्दशा का एक बड़ा कारण इसे भी मानते हैं। अयोध्या के लोगों का कहना है हिंदुओं के इस महानतम तीर्थस्थान को वह भव्यता नहीं मिल सकी जो मिलनी चाहिए और उसके पीछे इस विवाद के चलते रही अशांति है। अयोध्या के इस पैâसले को देश की आजादी के बाद का सबसे अहम और अनसुलझा सियासी मसला बताया जा रहा है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने बीते साल इसी महीने में इस मुद्दे को आखिरकार सुलझाने की ठानी और वहीं से १३४ साल पुराने इस मसले के पटरी पर आने की राह खुली। सात पक्षों की अलग-अलग दलीलों को सुनना, लाखों पन्नों के दस्तावेजों का अध्ययन के साथ ही ४० दिन की लगातार सुनवाई। सचमुच सुप्रीम कोर्ट ने जबरदस्त काम किया। लंबे समय से चल रहे इस मुकदमें की तारीखों, अनिर्णय और सरकारों की उदासीनता ने जनता में निराशा भर दी थी। अब जबकि पैâसले का दिन आ गया है तो अयोध्या सुकून से भरी नजर आ रही है और लोग खुश। उम्मीद है कि ये सुकून और अमन पैâसले के बाद भी कायम रहेगा।