हमें सोचना होगा, आचरण में कहां कमी रह गई है?

‘अंकल……’ आवाज सुनते ही मैं अपनी स्कूटी की रफ्तार धीमी कर देता हूं। एक किनारे स्कूटी रोक कर पीछे देखता हूं तो तकरीबन आठ-नौ साल का एक बच्चा मेरी तरफ तेज कदमों से आता हुआ नजर आता है। मेरे निकट पहुंचते ही वह बेझिझक कहता है, ‘अंकल मुझे बामन दाया पाड़ा छोड़ो न?’ इस बाल सुलभ निवेदन पर मैं भी मुस्कुरा देता हूं और इशारे से उसे बैठने को कहता हूं। मैं स्कूटी स्टार्ट कर आगे बढ़ता हूं और उससे पूछता हूं, ‘क्या तुम मुझे जानते हो?’ वह साफ कहता है, ‘नहीं’। मैं उससे सवाल करता हूं, ‘फिर किसी अनजान से इस तरह लिफ्ट मांगना क्या अच्छी बात है?’ वह कहता है, ‘आप भी उसी तरफ जा रहे थे जिस तरफ मेरा घर है इसलिए मैंने आप को आवाज दी।’ मैंने पूछा, ‘यहां कहां से आ रहे हो?’ उसने जवाब दिया, ‘यहां ट्यूशन पढ़ता हूं।’ मैंने पूछा, ‘कोई छोड़ने-लाने आता नहीं?’ उसने संक्षिप्त उत्तर दिया, ‘नहीं मैं अकेला आता-जाता हूं।’
बच्चे की मासूमियत और उसका अंदाज-ए-गुफ्तगू मुझे रोचक लगा। मैंने पूछा, ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने बताया, ‘गणेश, लेकिन मेरे दोस्त मुझे गण्या कहकर बुलाते हैं।’ तुरंत उसने पूछा, ‘अंकल, आपका क्या नाम है?’ मैंने कहा ‘अंकल’। उसने हंसते हुए कहा, ‘अंकल भी कोई नाम होता है क्या?’ मैंने कहा, ‘क्यों नहीं, जब तुमने अंकल बुलाया तो मेरा नाम अंकल ही होगा।’ वह हंस देता है। अचानक सामने से मेरे परिचित तबरेज खान आते हुए दिखे। वह बाइक पर थे। हम दोनों ने दूर से एक-दूसरे को देखकर अपने-अपने वाहन की रफ्तार धीमी कर दी। खान साहब के मेरे पास आते-आते मैंने तेज आवाज में सलाम किया। उन्होंने जवाब दिया, ‘वालैकुम अस्सलाम।’ बच्चे को देखकर उन्होंने पूछा, ‘यह कौन है?’ मैंने बताया, पड़ोस का बच्चा है लिफ्ट ली है। हम रस्मन सलाम-दुआ कर अपनी-अपनी मंजिल की ओर बढ़ गए। न जाने अचानक बच्चे को क्या सूझा और उसने पूछा? ‘अंकल, आप मुसलमान हैं?’ मैं चौंक पड़ा। आखिर एक मासूम बच्चे के मुंह से यह वैâसा सवाल हुआ? मैंने जवाब में पलटकर उससे ही सवाल किया, ‘तुम्हें क्या लगता है?’ उसके जवाब ने मुझे और चौंकाया। उसने कहा, ‘आपने मुसलमान लोगों का नमस्ते किया न इसलिए पूछा।’ उसकी बुद्धिमत्ता पर मैंने स्वीकार किया, ‘हां, बेटा मैं मुसलमान हूं। ‘फिर उसका सवाल कि ‘फिर आपका नाम क्या है?’ मैंने कहा, ‘सलमान।’ वह खिलखिलाया। कहने लगा, ‘आप झूठ बोलते हैं, क्या आप सलमान खान हैं?’ उसके भोलेपन पर मैंने जवाब दिया,‘नहीं बेटा मेरा नाम सलमान ही है।’ बच्चा शांत हुआ। मैंने स्कूटी की रफ्तार जानबूझकर धीमी कर दी थी। न जाने क्यों मैं इस बच्चे से बात करते रहना चाह रहा था? मैंने कहा, ‘बेटा यह हिंदू-मुसलमान तुम्हें किसने सिखाया?’ उसने कहा, ‘मेरे दोस्त लोग कहते हैं मुसलमान अच्छे नहीं होते।’ मैंने उसे समझाते हुए कहा, ‘बेटा, मुसलमान या हिंदू बुरे नहीं होते। बुरा कोई भी इंसान हो सकता है चाहे वह किसी भी धर्म का हो। क्या मैं तुम्हें बुरा लगता हूं?’ उसने फौरन जवाब दिया, ‘नहीं अंकल, आप तो बहुत अच्छे हैं।’ मैंने फिर पूछा, ‘मैं अच्छा वैâसे हुआ, मैं भी तो मुसलमान हूं।’ उसने कहा, ‘नहीं अंकल, आपने तो मुझे लिफ्ट भी दी है।’ मैंने कहा, ‘क्या तुम किसी मुसलमान से नहीं मिले?’ उसने फौरन जवाब दिया, ‘नहीं मेरे मुसलमान दोस्त हैं। मैं तो फरहान के साथ खेलता भी हूं। वह मेरे बाजू में रहता है। वह भी अच्छा है। मैंने कहा, ‘फिर तुम किन दोस्तों की बात कर रहे हो?’ उसने उदास होते हुए कहा, ‘हैं कुछ दोस्त।’ मैंने कहा, ‘बेटा ऐसे दोस्तों को भी समझाओ, हिंदू-मुसलमान जैसा कुछ नहीं होता। हम सब इंसान हैं और एक देश के वासी है। एक दूसरे के हमदर्द, एक दूसरे के पड़ोसी। एक दूसरे के सुख-दुख के साथी।’ कहते-कहते मैं बामन दाया पाड़ा के मुंहाने पर पहुंच गया था। उसने कहा, ‘अंकल यहीं रोक दो।’ मैं स्कूटी खड़ी कर उसके चेहरे को गौर से देखना चाहता था। मैं उसके भाव पढ़ना चाहता था। मैं उसके साथ हुए अपने वार्तालाप के बाद की स्थिति को समझना चाहता था। मैंने देखा बच्चा मुस्कुरा रहा है। ऐसा लगा जैसे वह मेरा साथ नहीं छोड़ना चाहता। मैंने फिर उससे पूछा, ‘क्या तुम्हारे घर तक स्कूटी जा सकती है?’ उसने कहा, ‘नहीं बहुत पतली गली है, मैं चला जाऊंगा।’ मैंने उसे छेड़ा, ‘चाय पिलाओगे?’ उसने उछलकर कहा, हां, घर चलो पिलाता हूं।’ मैंने हंसकर उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘बेटा फिर कभी।’ वह मुस्कुराया। सड़क पार करने के लिए वह खड़ा था। मैं उसे देख रहा था। सामने से बस आ रही थी। रोड क्रॉस करने से पहले वह फिर मेरे पास आया। उसने कहा, ‘अंकल आप तो बहुत अच्छे हैं। मैं मेरे दोस्तों से कहूंगा, मुझे मेरे एक मुसलमान अंकल ने लिफ्ट दी थी।’ मैंने कहा, ‘बेटा मैंने तुम्हें लिफ्ट नहीं दी। यह स्कूटी तुम्हारी ही तो है। हम दोनों आज से दोस्त हैं।’ उसने पूछा, ‘आप यहां से रोज आते हैं?’ मैंने कहा, ‘कभी-कभी लेकिन जब कभी आऊंगा तो तुम मुझे पहचान लेना या जहां देखना मेरे पास आ जाना।’ मैंने उसे इशारा किया, रास्ता पार कर लो वरना गाड़ी आ जाएगी। वह भोली मुस्कान के साथ हाथ हिलाता हुआ रोड क्रॉस करता चला गया। धीरे-धीरे वह एक गली की तरफ मुड़ा। गली के छोर से उसने फिर मुझे हाथ दिखाया और फिर उस गली में कहीं खो गया।
मैंने स्कूटी स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ गया। मेरे मन में एक झंझावात चल रहा था। आखिर हम किस मुकाम पर पहुंच गए हैं? आठ-नौ साल का बच्चा किस तरह की बातें कर रहा है? कहां से सीखते हैं यह बच्चे? वैâसे हिंदू-मुसलमान के भेद में पड़ गए हैं जबकि उसका अपना दोस्त भी मुसलमान है। मेरे अखलाक से प्रभावित होकर उसने कह तो दिया कि आप अच्छे हैं लेकिन क्या वह मासूम बच्चा आगे भी यही धारणा कायम रख पाएगा? आखिर क्यों एक बच्चे के मन में उसी के हम उम्र बच्चों की यह बात घर कर गई है कि मुसलमान अच्छे नहीं होते? यह तालीम उसे किसी स्कूल से तो नहीं मिली होगी। उसके अभिभावकों ने तो कत्तई नहीं सिखाई होगी। जिस मासूम बच्चे ने मेरे मित्र के साथ हुए सलाम दुआ के अल्फाजों को पकड़कर बड़ी मासूमियत से ‘सलाम’ को मुसलमानों का ‘नमस्ते’ बताया उससे यह आभास भी हुआ कि उसका मन साफ है। बच्चों का मन साफ होता भी है। जिन बच्चों ने उसे समझाया होगा कि मुसलमान अच्छे नहीं होते वह बच्चे भी साफ दिल होंगे लेकिन गलत संगत का असर उनके सिर चढ़कर बोल रहा होगा। या फिर चंद मुसलमानों ने कुछ ऐसे गैर अखलाकी कार्य किए होंगे, जिससे इन बच्चों के मन में यह भाव आया होगा। क्या पता अपने से बड़ों की बातें सुनकर वह इस बात को मन में बैठा चुके हो? आखिर यह वैâसी तालीम है? यह वैâसी शिक्षा है जो बच्चों के भीतर जहर भर रही है? मेरे साथ हुई इस घटना पर मैं अब तक बेचैन हूं। अपने आचरण से मैं एक मासूम बच्चे के मन से उसका भ्रम कुछ हद तक दूर कर सका या नहीं यह तो नहीं जानता लेकिन मुझे सुकून है कि वह बच्चा जितनी देर भी मेरे साथ रहा मुस्कुराता रहा। मुझसे बिछड़ते वक्त भी मुस्कुराता रहा और फिर मिलने का वादा भी तो किया है उसने।
अखलाक, आचरण, स्वभाव किसी इंसान की सबसे बड़ी पहचान होती है। वह इंसान अगर अपने धर्म का पाबंद है और उसका आचरण अच्छा है तो लोग उसका सम्मान करते हैं। कोई इंसान बेहद धार्मिक है लेकिन उसका आचरण अच्छा नहीं है तो लोग उसे पसंद नहीं करते। पैगंबर मोहम्मद साहब का स्वभाव ऐसा था कि लोग उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। क्या आम मुसलमानों ने अपने नबी की इस तालीम को अपनाया है? क्या वे लोगों के साथ मोहब्बत के साथ पेश आते हैं? यह देश नानक, गौतम और चिश्ती जैसे सूफी-संतों का है जिन्होंने अपने अखलाक और अपने बेहतरीन आचरण से लोगों को अपना बनाया। एक मासूम बच्चे के मन में अगर मुसलमानों के लिए बचपन से ही शंका के बीज पनपने लगे हैं तो मुसलमानों को सोचना होगा कि उनके आचरण में कहां कमी रह गई है? केवल दूसरों को दोष देकर खुद को बेहतर नहीं बताया जा सकता। खुद अपना और अपनी कौम का जायजा लेना जरूरी है ताकि गलतफहमियों को दूर किया जा सके। यह काम जितनी जल्दी शुरू हो उतना अच्छा।