हम लड़कियां टॉपर हैं

बॉलीवुड में `बंदूकबाज’ से डेब्यू कर चर्चा में आई अभिनेत्री बिदिता बाग अब किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। आनेवाली फिल्म `मोक्ष टू माया’ में बिदिता बाग ने एक बार फिर से सशक्त महिला का किरदार निभाकर फिल्मी गलियारे में हलचल पैदा कर दी है। प्रस्तुत है बिदिता बाग से सोमप्रकाश `शिवम’ की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
 फिल्म `मोक्ष टू माया’ में अपने किरदार के बारे में बताइए?
मैं इस फिल्म में माया नाम के किरदार से रूबरू हो रही हूं। मैं उत्तर प्रदेश के मथुरा की रहनेवाली हूं। मेरी शादी राजस्थान सीमा से सटे एक गांव में एक अधेड़ से करा दी जाती है, जो बहुत ही अत्याचारी है। गांव में अचानक एक मौत होती है, जिसका शक माया पर जाता है। फिल्म एक सस्पेंस थ्रिलर है।
 क्या आप एक बोल्ड किरदार के ट्रेंड में बंंधती जा रही हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। मैं अपनी पहली फिल्म में वाकई काफी बोल्ड दिखी हूं लेकिन इस फिल्म में कुछ बेड सीन हैं, जिन्हें आप ज्यादा बोल्ड नहीं कह सकते।
 आप चेहरे से तो बहुत ही सरल दिखती हैं। बोल्ड दृश्य देने में कितनी दिक्कतें आती हैं?
वाकई मुझे कुदरत ने बहुत सरल बनाया है। मैं अपने आप को ज्यादा बोल्ड या खूबसूरत तो नहीं मानती लेकिन मेरा फेस फिर भी इस तरह का है, जो मैं हर किरदार में खुद को सहज ही ढाल लेती हूं। मुझे बोल्ड दृश्य देते वक्त कुछ भी असहज महसूस नहीं होता।
 बोल्ड सीन करने के लिए आपको घर से कितना सपोर्ट है?
करियर की शुरुआत में मुझे यह सब करने में कठिनाई हुई थी। उस समय घर से भी सपोर्ट न के बराबर था लेकिन अब घरवालों को भी समझ में आ चुका है। जब मैंने अपना करियर फिल्मों में चुना है तो यह सब तो करना ही होगा और जब करना ही है तो फिर हिचकिचाहट क्यों? अब तो खुलकर करना ही पसंद करती हूं।
 इस फिल्म में काफी स्मोकिंग के दृश्य भी आपको करने पड़े हैं। कितना मुश्किल था इन दृश्यों को फिल्माना?
मैं नॉन स्मोकर हूं। तो वाकई मुझे इन दृश्यों को फिल्माने में बहुत तकलीफों का सामना करना पड़ा। स्मोक करने के बाद आधा-आधा घंटे तक खांसी आती रहती थी लेकिन क्या करती किरदार इतना स्ट्रांग था कि उसके लिए मुझे यह सब करना ही पड़ा। सच कहूं तो यह स्मोकिंग भी बोल्डनेस का ही एक हिस्सा है।
 आपके किरदार से किस तरह का संदेश देने की कोशिश की गई है?
यही कि पहले हम महिलाओं को घर से बाहर आने पर मनाही थी तो अब समय के अनुसार परिवर्तन आया है। अभी भी देश के तमाम पिछड़े हिस्सों में महिलाएं चहारदीवारी में कैद रहती हैं। पुरुषों को चाहिए कि उन्हें बाहर आने दें और उन्हें उनकी प्रतिभा के मुताबिक अवसर मिलना चाहिए। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि देश में हर क्षेत्र में हम लड़कियां आज भी टॉपर हैं फिर बंदिशें क्यों?