" /> ‘हर इंसान अपनी किस्मत खुद बनाता है!’-बाॅबी देओल

‘हर इंसान अपनी किस्मत खुद बनाता है!’-बाॅबी देओल

पिछले चार-पांच सालों से फिल्मों में सक्रिय न रहनेवाले बॉबी देओल लॉकडाउन के दौरान बेहद व्यस्त हो गए हैं। आजकल वे एमएक्स प्लेयर पर प्रकाश झा निर्देशित वेब सीरीज ‘आश्रम’ तो दूसरी ओर नेटफ्लिक्स पर अतुल सबरवाल निर्देशित फिल्म ‘क्लास ऑफ ८३’ से सुर्खियों में हैं, जिसमें बॉबी ने पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाया है। इसके साथ ही बॉबी देओल ने अपने फिल्मी करियर के २५ वर्ष पूरे कर लिए हैं। पेश है सौम्य और शालीन बॉबी देओल से हुई पूजा सामंत की बातचीत के प्रमुख अंश-

 कैसा रहा आपके लिए लॉकडाउन का ये दौर?
हर शख्स की तरह घर पर बैठ-बैठकर मैं भी उकता गया था। मेरे लिए ये बात बहुत अच्छी थी कि हम सभी एक बड़े जॉइंट फैमिली में रहते हैं, जिसमें सनी भैया का परिवार, मेरा परिवार और मम्मी-पापा हम सभी साथ रहते हैं। घर में इतने सारे सदस्य होने के कारण दिनभर चहल-पहल लगी रहती है और खालीपन नहीं लगता। इस दौरान हमने वो पुरानी फिल्में देखी, जिसे पहले नहीं देखा था।

लॉकडाउन ने क्या पाठ पढ़ाया?
संयम रखना, सहनशील होना और हर स्थिति में शांत रहना, ये सब मैंने इस दौरान सीखा। पहले जैसे मौका मिलता था हम बाहर निकल पड़ते थे, अपने मनमुताबिक जिंदगी जीते थे। अब कोरोना के दौर में समझ आया कि जीवन में घर रहने के कितने फायदे हैं। ऐसी कई अनगिनत खुशियां उसने हमें दीं, जिन पर हमने कभी ध्यान नहीं दिया। सिर पर मां का हाथ फेरना क्या होता है, अब जाकर महसूस हुआ।

फिल्म इंडस्ट्री के २५ वर्ष आपके लिए कैसे रहे?
फिल्म ‘बरसात’ से मेरा करियर शुरू हुआ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने उतार-चढ़ाव के बावजूद मैं इस इंडस्ट्री में टिक पाऊंगा। इन २५ वर्षों में मैंने मेहनत की है, तो गलतियां भी बहुत की हैं। लेकिन वो दौर भी आया जब मैंने अपनी गलतियों से सीखा। पहले मैं समर्पित नहीं था लेकिन अब पूरी तरह से मैं अपने काम के प्रति समर्पित हूं।

एक दौर ऐसा भी था जब आपके पास काम नहीं था?
हां, मेरे पास अच्छे ऑफर्स नहीं थे, जिससे मुझे बेहद निराशा हुई। मैंने सुना कि मेरे बच्चे कह रहे हैं, आजकल पापा शूटिंग पर नहीं जाते और घर पर ही रहते हैं। ये सुनकर मुझे बुरा लगा लेकिन इन्हीं शब्दों ने मुझे झिंझोड़कर रख दिया। मैंने खुद को सीरियसली लिया और खुद को फोकस करते हुए निराशा के दौर से बाहर निकला। शायद भगवान ही ये समय लाया है, ताकि मैं संभल जाऊं।

‘आश्रम’ और ‘क्लास ऑफ ८३’ के लिए आपने कैसी तैयारी की?
एक लंबे अर्से बाद मेरे दो प्रोजेक्ट्स एक साथ आए। ‘आश्रम’ के निर्देशक प्रकाश झा हैं, जिनको मैं जीनियस के सिवाय कुछ और कह नहीं सकता। उन्होंने मुझमें
कॉन्फिडेंस भर दिया ये अलग तरह का किरदार सौंपकर। रही बात सुनीता जी की तो उन्होंने मुझे शुद्ध हिंदी के पाठ पढ़ाए। ‘क्लास ऑफ ८३’ के लिए कई वर्कशॉप्स हुए, वॉइस मॉडुलेशन काफी किया। इन दोनों प्रोजेक्ट्स में मेरे साथ कई नए एक्टर्स थे, जिनका एनर्जी लेवल देखकर मैं अचंभित हुआ।

क्या अपने व्यक्तिगत जीवन में आप स्प्रिचुअल गुरु आदि को मानते हैं?
हमारे कल्चर का हिस्सा हैं ये साधु-संत, गुरु-सद्गुरु और महात्मा। बरसों से फिल्मों में भी दिखाया जाता रहा है कि बुजुर्ग होने पर माता-पिता तीर्थयात्रा के लिए निकल जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। हां, श्रद्धा अच्छी है लेकिन अंधश्रद्धा बुरी। हम भाई-बहनों के लिए हमारे माता-पिता ही हमारे गुरु और भगवान हैं। जब मेरा करियर ठीक नहीं चल रहा था तब मां ने एक स्टोन दिया था मुझे पहनने के लिए। तब मैंने उनसे कहा कि ये पत्थर पहनकर मैं मेहनत न करूं तो मेरा करियर कैसे सफल होगा और वो मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दीं।

इस मामले में पापा धर्मेंद्र ने आपको कभी कोई मशविरा नहीं दिया?
नहीं, पापा नहीं मानते इन बातों को। पापा कहते हैं बच्चों अपना हाथ कभी किसी ज्योतिष के सामने मत रखना। हर इंसान अपनी किस्मत खुद बनाता है। बस, बुद्धि, मेहनत और अच्छी नीयत साथ होनी चाहिए।