हस्त नक्षत्र में पूजन से होती है धन की वर्षा

सोमवार-धनतेरस-
धनतेरस को त्रयोदशी तिथि एवं श्रवण नक्षत्र का दुर्लभ योग है। धनतेरस के दिन ही भगवान धनवंतरि का जन्मोत्सव मनाया जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान धनवंतरि का प्राकट्य माना जाता है। देव-दानव द्वारा क्षीरसागर का मंथन करते समय भगवान धनवंतरि संसार की समस्त रोगों की औषधियों को कलश में भरकर प्रकट हुए थे। उस दिन त्रयोदशी तिथि थी इसलिए उक्त तिथि में संपूर्ण भारत वर्ष सहित अन्य देशों में (जहां हिंदुओं का निवास स्थान है) भगवान धनवंतरि की जयंती महोत्सव के रूप में मनाई जाती है। विशेषकर आयुर्वेद के विद्वान तथा वैद्यसमाज की ओर से सर्वत्र भगवान धनवंतरि की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है तथा उनका पूजन श्रद्धा-भक्तिपूर्वक किया जाता है एवं प्रसाद वितरण करके लोगों के दीर्घायु तथा आरोग्य लाभ के लिए मंगलकामना भी की जाती है। दूसरे दिन शाम के समय जलाशयों में प्रतिमाओं का विसर्जन, भजन-कीर्तन करते हुए किया जाता है। भगवान धनवंतरि प्राणियों को रोग मुक्त करने के लिए भव-भेषजावतार के रूप में प्रकट हुए थे। आज से अर्थात कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी से अमावस्या तिथि तक शाम को घर के देहली अर्थात द्वार पर दीपदान भी किया जाता है। इससे घर में अकाल मृत्यु नहीं होती है। आज के दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि स्वर्ण या चांदी का पात्र खरीदने से वर्षपर्यंत लक्ष्मी का आगमन घर में बना रहता है। कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि रविवार को रात्रि १२:५१ से प्रारंभ होकर सोमवार को रात्रि ११:१७ तक रहेगी। आज सूर्यास्त से लेकर रात में ११:१७ तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। हस्त नक्षत्र आज रात्रि ९:०२ तक रहेगा। हस्त नक्षत्र रविवार रात्रि ९:५६ से प्रारंभ होकर सोमवार को रात्रि ९:०२ तक रहेगा। २७ नक्षत्रों में हस्त नक्षत्र भी सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हस्त नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा होता है। चंद्रमा सुख-समृद्धि एवं धन का प्रमुख कारक ग्रह माना गया है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में उल्लिखित है कि हस्त नक्षत्र में धन विषयक संबंधित यदि पूजन पाठ किया जाए तो सर्वश्रेष्ठ धन का आगमन होता है। अत: जो लोग धन प्राप्ति के निमित्त पूजन करना चाहते हैं, वे आज के दिन सूर्यास्त से लेकर रात्रि ९.०२ बजे के अंदर पूजन करें तो सर्वश्रेष्ठ लाभ मिलेगा। इस काल में नए पात्र में भगवान को मिष्ठान्न भोजन अर्पित करें तो सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा वर्ष पर्यंत कुबेर जी का आशीर्वाद बना रहेगा।
बुधवार-दीपावली पर्व- 
प्रदोष काल से रात्रि ९.१९ बजे तक अमावस्या तिथि में करना सर्वोत्तम रहेगा। उदया तिथि अमावस्या के अनुसार सिंह लग्न में रात्रि १२.३१ बजे से २.४५ बजे तक महालक्ष्मी प्राप्ति के निमित्त पूजन करना भी सर्वोत्तम रहेगा। अमावस्या एवं दीपावली का महात्म बुधवार ७ नवंबर को ही मान्य होगा क्योंकि प्रदोष तिथिमत महाकाली पूजा का मान बुधवार को ही मान्य होगा। मंगलवार को रात्रि १०:०६ से अमावस्या तिथि लग जाएगी इसलिए बंगाल में निशीथ काल के मतानुसार महाकाली पूजा मंगलवार को ही की जाएगी।
पूजन विधि- कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवती श्रीमहालक्ष्मी एवं भगवान गणेशजी की नूतन प्रतिमाओं का प्रतिष्ठापूर्वक विशेष पूजन किया जाता है। पूजन के लिए किसी चौकी अथवा कपड़े की पवित्र आसन पर गणेश जी के दाहिने भाग में माता महालक्ष्मी को स्थापित करना चाहिए। पूजन के दिन घर को स्वच्छ कर पूजा स्थान को भी पवित्र कर लेना चाहिए एवं स्वयं भी पवित्र होकर श्रद्धा भक्तिपूर्वक सांयकाल इनका पूजन करना चाहिए। श्रीमहालक्ष्मी जी के पास ही किसी पवित्र पात्र में केसरयुक्त चंदन से अष्टदल कमल बनाकर उस पर द्रव्य लक्ष्मी (रुपयों) को भी स्थापित करके एक साथ ही दोनों की पूजा करनी चाहिए।