हाथ क्या झटकते हो!

र्इंधन मूल्यवृद्धि के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा किए गए ‘भारत बंद’ को मिला-जुला प्रतिसाद मिला। ‘बंद’ सौ प्रतिशत सफल हुआ, जनता ने बढ़-चढ़कर उसमें हिस्सा लिया, एक प्रथा के तहत ‘बंद’ की शाम को ऐसा कहा जाता है। कांग्रेस ने इस तरह के आशय का निवेदन किया है। महाराष्ट्र के बारे में कहा जाए तो एक-दो अपवादों को छोड़कर सब-कुछ शांत था। राज्य में बंद को अच्छा प्रतिसाद मिलता तो हमें खुशी ही होती क्योंकि बंद महंगाई के खिलाफ था और जनता को झुलसते हुए हम देख रहे हैं। इसलिए लोग सड़क पर उतरेंगे और सारा व्यवहार ठप कर देंगे, ऐसी उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लोगों ने गणेशोत्सव की तैयारी में समय बिताया। महंगाई की आंच झेलते हुए गणेशोत्सव की खरीददारी की। बंद वालों ने लोगों को रोका नहीं लेकिन कहीं पांच-दस मिनट के लिए ‘सड़क रोको’ तो कहीं गाड़ियों पर पत्थर फेंके। विरोधियों ने बंद की तैयारी ठीक तरह से नहीं की थी या बंद को सफल करनेवाली मशीनरी उनके हाथ में नहीं थी। लोगों का मन बदल नहीं सके इसलिए फ्लॉप बंद का ठीकरा उन्होंने शिवसेना पर फोड़ा और अपने हाथ ऊपर कर लिए। ‘बंद’ के बारे में शिवसेना की नीति दोहरी होने की ताली कांग्रेस के अशोक चव्हाण ने बजाई। चव्हाण इस विषय पर न बोलें तो ही अच्छा। उन्हें बंद को सफल करने के लिए शिवसेना चाहिए लेकिन पालघर के उपचुनाव में भाजपा विरोधी एकता से उन्हें परहेज है। कांग्रेस या वामपंथियों ने वहां उम्मीदवार खड़ा नहीं किया होता तो भंडारा, गोंदिया की तरह पालघर का भी नतीजा कुछ अलग होता। हालांकि हम वहां अपनी ताकत पर लड़े और भाजपा को छकाया। कांग्रेस या वामपंथियों ने समर्थन नहीं दिया इसलिए पराभव का ठीकरा दूसरों पर नहीं फोड़ा। इसे ही शेर का दिल और मर्द की लड़ाई कहते हैं। र्इंधन मूल्यवृद्धि से लेकर कई मुद्दों से जनता त्रस्त है। हम लोगों के साथ ही हैं और उसके लिए कांग्रेस जैसे दल से प्रमाण-पत्र लेने की जरूरत नहीं। हमें आश्चर्य इस बात का होता है कि इधर जब ‘बंद’ की कोशिश जारी थी, सरकार ने दोबारा चेताते हुए कहा कि र्इंधन का मूल्य बढ़ता ही रहेगा। उस पर नियंत्रण रखना हमारे हाथ में नहीं। सरकार का कहना ऐसा था कि पेट्रोल-डीजल का मूल्य अंतर्राष्ट्रीय बाजार की घटनाओं और उतार-चढ़ाव पर निर्भर होता है और इन अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर नियंत्रण रखना सरकार के बूते से बाहर है। इन दिनों तेल के वैश्विक बाजार में र्इंधन का मूल्य बढ़ रहा है इसलिए हमारे देश में भी पेट्रोल-डीजल का भाव आसमान छू रहा है। संक्षेप में पेट्रोल-डीजल का मूल्य कम होगा ऐसी उम्मीद जनता सरकार से न करे, ऐसा सत्ताधारियों का कहना है। जनता सरकार से नहीं तो और किससे उम्मीद करेगी? जनता की उम्मीद, आशा-आकांक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी सत्ताधारियों की ही होती है। उसी के लिए जनता ने आपको पूर्ण बहुमत दिया है। इसलिए वैश्विक घटनाओं का हवाला देते हुए र्इंधन मूल्यवृद्धि कम करने की जिम्मेदारी से सत्ताधारी भाग नहीं सकते। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में र्इंधन के बढ़ते मूल्य का तुनतुना बजाना अब सरकार रोके और महंगाई के दावानल से आम जनता को राहत वैâसे दी जा सकती है, इस पर विचार करे। र्इंधन का मूल्य बढ़ गया इसलिए अंतर्राष्ट्रीय भाषा और अन्य मौकों पर ‘मन की बात’ उचित नहीं। प्रधानमंत्री मोदी का अंतर्राष्ट्रीय संचार बड़ा है इसलिए तेल की अंतर्राष्ट्रीय अर्थनीति को वे देखें। हमें जनता के चेहरे पर खुशी देखनी है। सरकार को उसके लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा करनी पड़ेगी। सरकार समय न गंवाए। उचित निर्णय ले। महंगाई की आंच वैâसे बुझेगी? र्इंधन का मूल्य वैâसे कम होगा? इसे देखे। ये सब करने की बजाय उससे हाथ क्या झटकते हो? लोगों ने सत्ता इन सवालों पर हाथ झटकने के लिए नहीं दी है!