हाथ-पैर बंधा, पहलवान कुश्ती कैसे लड़ेगा?

अंग्रेजी में कहावत है ‘मेनी कुक स्पॉइल द सूप’। कुछ ऐसा ही हाल मुंबई शहर का भी है। जब भी मुंबई पर कोई आपदा आती है तो मुंबई महानगरपालिका को दोषी ठहराया जाता है। लेकिन महानगरपालिका को कोसनेवाले क्या यह जानते हैं कि मुंबई का हाल भी दिल्ली जैसा ही है। जिस तरह दिल्ली सरकार कोई पैâसला करती है और उसे एल. जी. पलट देते हैं, ठीक उसी तरह मुंबई में मुंबई महानगरपालिका को भी पूरी तरह से काम करने का अधिकार नहीं है। जी हां, यह एक कटु सत्य है।
क्या आप जानते हैं कि सड़क के नीचे से भूमिगत कितनी सुविधाएं लोगों तक पहुंचती हैं? क्या आप जानते हैं कि मुंबई शहर की अलग-अलग सड़कें, अलग-अलग अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र में आती हैं? क्या आप यह जानते हैं कि मुंबई को जलापूर्ति करनेवाले तालाब मुंबई महानगरपालिका के हद में नहीं हैं और उसके इर्द-गिर्द का इलाका या तो राज्य सरकार या फिर केंद्र सरकार के मातहत आता है? क्या आप यह जानते हैं कि मुंबई के भीतर काम करने के लिए मुंबई महानगरपालिका को कितने विभागों से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ लेना पड़ता है? मुंबई महानगरपालिका को भी शहर में कहीं अपना काम शुरू करने से पहले इजाजत लेनी होती है। वह भी अलग-अलग अथॉरिटीज की। अब यह उन अथॉरिटी की मर्जी है कि वह मुंबई महानगरपालिका को इजाजत दे या लटकाए रखें।
मॉनसून में अमूमन यह देखने कोे मिलता है कि रेलवे स्टेशनों के इर्द-गिर्द पानी भर जाता है। यहां मनपाकर्मी पानी निकालने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन कई बार विफलता ही हाथ लगती है। ऐसे वक्त में यदि आपको कोसना हो तो मुंबई महानगरपालिका को नहीं बल्कि रेलवे अथॉरिटीज को कोसो। मुंबई का भूगोल कुछ अलग है। समुद्र से सटा भूभाग है ये। पानी अपने प्राकृतिक रास्ते से समुद्र की ओर आगे बढ़ने की कोशिश करता है लेकिन रेलवे स्टेशन के पास आकर थम जाता है। दरअसल रेलवे प्रशासन मुंबई महानगरपालिका को रेल परिसर के भीतर नाले और कलवर्ट की सफाई करने की इजाजत नहीं देता। बल्कि वह मनपा को साफ-सफाई के लिए करोड़ों रुपए का बिल थमा देता है और शर्त भी रखता है कि भुगतान होने पर ही टेंडर निकाल कर साफ-सफाई करवाई जाएगी। यहीं पर मामला अटक जाता है। बारिश का पानी रेलवे ट्रैक के ऊपर भर जाता है। पूरब से पश्चिम की ओर पानी नहीं जा पाता। कुछ ऐसा ही हाल वेस्टर्न एक्सप्रेस और ईस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे पर देखने को मिलता है। लोगों को इस बात का पता नहीं है कि ये दोनों ही हाई-वे मुंबई महानगरपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। एमएमआरडीए नामक सरकारी संस्था इन सड़कों के रख-रखाव के लिए जिम्मेदार है। मुंबई में सड़कों और गटरों से होकर कुल १७ प्रकार की यूटिलिटी सप्लाई होती है। मनपा चमचमाती नई सड़क बना देती है लेकिन महानगर टेलिफोन, इलेक्ट्रिक सप्लाई करनेवाली वंâपनियां, गैस की लाइन समेत निजी वंâपनियों के पाइप व केबलों के लिए उन्हें खोद दिया जाता है। कहीं समस्या आई तो सीधे सड़क खोदना शुरू हो जाता है और लोग बिना सोचे-समझे मुंबई महानगरपालिका को कोसना शुरू कर देते हैं। मुंबई को पानी की आपूर्ति करनेवाले तालाब वन क्षेत्र के अधीन हैं। ये केंद्र सरकार के अधीन हैं। यदि पालिका को पानी की अतिरिक्त आपूर्ति करने के लिए एक पंपिंग स्टेशन भी बनाना हो तो उसके लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, वेंâद्रीय वन मंत्रालय आदि विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। यह काम पूरा होने में कई साल लग जाते हैं। मंजूरी लेने का काम इतना जटिल है कि मनपा जैसी संस्था को भी निजी लाइजनिंग वंâपनियों की सेवाएं लेनी पड़ती हैं ताकि काम तेजी से हो। मुंबई शहर ४२५ वर्ग किलोमीटर का है। इसमें से ११० वर्ग किलोमीटर जंगल है। ९० वर्ग किलोमीटर कोस्टल जोन में है। बचे हुए २२५ वर्ग किलोमीटर में भारतीय रेलवे, रक्षा विभाग, वन विभाग, केंद्र सरकार और राज्य सरकार इन तमाम अथॉरिटी के भूखंड हैं। उस पर डेढ़ करोड़ की आबादी का भार अलग से। ऐसे में मनपा के लिए पेचीदगियां अनेक हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि पहले के जमाने में मुंबई में पानी नहीं भरता था। इसका जवाब एक लाइन में यह है कि उस जमाने में मुंबई का पुलिस डिपार्टमेंट भी मुंबई महानगरपालिका के अधिकार क्षेत्र में था। जी हां, मुंबई महानगरपालिका के पास उस समय इतने व्यापक अधिकार थे कि वह मुंबई के भीतर मनचाहा काम कर सकती थी, जिसके लिए उसे किसी की इजाजत की जरूरत नहीं थी। समय के साथ एक के बाद एक सारे विभाग स्वतंत्र कर दिए गए। हर विभाग को एक ही काम सौंपा गया लेकिन मुंबई महानगरपालिका को तमाम काम अकेले ही करने की जिम्मेदारी मिली। इतना ही नहीं, उसका अधिकार क्षेत्र भी कम कर दिया गया।
चंद दिन पहले पश्चिमी उपनगर के अंधेरी इलाके में एक ब्रिज रेलवे ट्रैक पर गिर गया। इस पर भी लोग मुंबई महानगरपालिका को कोसते रहे। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि क्या मुंबई महानगरपालिका को रेलवे ओवरब्रिज का स्ट्रक्चरल ऑडिट करने के लिए रेलवे परिसर में आने की छूट है? लोगों को इस वास्तविकता का पता होना चाहिए कि एक पहलवान के हाथ-पांव यदि बांध दिए जाएं तो वह कुश्ती नहीं लड़ सकता। मुंबई शहर की जितनी उपलब्धियां हैं, उतनी ही परेशानियां भी। यदि हम इस शहर को वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय शहर के रूप में देखना चाहते हैं तो सरकार को मुंबई महानगरपालिका को ज्यादा अधिकार देने होंगे। अब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए एल.जी. के हाथ बांध दिए पर मुंबई महानगरपालिका के मामले में ऐसा कब होगा? यह एक बहुत बड़ा सवाल है।