" /> हादसों को पुकारती इमारतें

हादसों को पुकारती इमारतें

कमाठीपुरा की लेन-६ इमारत में रहनेवाले सत्यानंद गजेली की रातें इसी सोच-विचार में बीतती हैं कि कहीं ये इमारत गिर न जाए और कोई बड़ा हादसा उनके परिवार की खुशियां न छीन ले। सत्यानंद का कहना है कि म्हाडा की जिस इमारत में वे रहते हैं वो लगभग ७५ साल पुरानी है और वर्तमान समय में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। सत्यानंद का कहना है कि वे इस इमारत को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर जाना चाहते हैं, ताकि इमारत का री-डेवलपमेंट हो सके लेकिन डेवलपर्स के पास इसके लिए बिल्कुल भी पैसा नहीं है। ऐसे में सत्यानंद और इस इमारत में रहनेवाले लोगों को ये उम्मीद है कि म्हाडा इस इमारत के री-डेवलपमेंट का काम क्लस्टर एप्रोच के जरिए अपने हाथों में ले लेगी।
सत्यानंद की तरह ही इस इमारत में रहनेवाले २८ परिवार खौफ के साए में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जब वे डोंगरी हादसे जैसी घटनाएं सुनते हैं, तो उनकी रूह अंदर तक कांप जाती है, परंतु री-डेवलपमेंट न हो पाने के कारण इन लोगों के पास अन्य दूसरा कोई विकल्प नहीं है। कमाठीपुरा में ऐसी कई अन्य इमारतें हैं, जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं और उन्हें री-डेवलपमेंट की अत्यंत आवश्यकता है। इमारत के डेवलपर्स के पास पर्याप्त पैसा न होने के कारण इसका कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है। मुंबई में लगभग ५०,००० ऐसे परिवार हैं, जो इसी तरह अपना जीवन खतरे में रहकर बिताने को मजबूर हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा ये बात स्वीकारी गई है कि मुंबई में १४,२०७ ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो कि रहने के लिए सुरक्षित नहीं हैं। इन इमारतों के री-डेवलपमेंट का कार्य फंड में कमी, अर्थव्यवस्था में गिरावट जैसे कारणों की वजह से हो रहा है। इस वजह से लोग कहीं और शिफ्ट नहीं हो पा रहे हैं और इन्हीं इमारतों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। बारिश के समय में अधिकांश इमारतों की छतों से पानी टपकता रहता है। इसके अलावा इमारतों के कुछ हिस्से भी टूटकर समय-समय नीचे गिरते हुए देखे गए हैं। ऐसे में लोगों की मांग है कि इन इमारतों के री-डेवलपमेंट का कार्य शुरू कर उन्हें कहीं और शिफ्ट कर दिया जाना चाहिए।

मैं जिस इमारत में रहता हूं वो ७५ वर्षों से भी ज्यादा पुरानी है। ये इमारत काफी ज्यादा टूट-फूट गई है, जिसके कारण यहां पर कभी भी कोई हादसा हो सकता है। ऐस में मेरी रातें इसी सोच-विचार में बीतती हैं कि कभी कोई बड़ा हादसा घटित न हो जाए।
– सत्यानंद गजेली (निवासी)

मैं जिस इमारत में रहती हूं, वहां ऊपर की मंजिल से समय-समय पर चूना-पत्थर उतरता रहता है। बारिश के समय तो हालत खराब हो जाती है और छत से भी पानी टपकता रहता है।
– विनीता अग्रवाल (निवासी)