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हिंदी दिवस पर यह कैसा चलन?

इस बार १४ सितंबर हिंदी दिवस से पहले लोकप्रिय कादम्बिनी एवं नंदन पत्रिकाओं का बंद होना बेहद दुखद है। मैं कादम्बिनी को सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका मानता हूं। पर अब यह बंद हो चुकी है, इसे मेरा मन मानने को तैयार ही नहीं है। यह सब बाजार की महिमा का प्रकोप है और यह बाजार उपयोगिता एवं विपणन के सिद्धांत पर कार्य करता है। पत्रिकाओं का बंद होना हिंदी के लिए दुर्भाग्य है। एक तरफ तो हम हिंदी, जो कि देश की राजभाषा है, उसका उपयोग बढ़ाने पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च करते हैं, दूसरी तरफ हम लोकप्रिय पत्रिकाओं को ही बंद होने से नहीं बचा पाते। नंदन, चंपक, पराग, बाल भारती, चंदा मामा का अपना एक अलग इतिहास है। इस श्रेणी में सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्थान जैसी पत्रिकाएं भी हैं। कादम्बिनी, नंदन के पाठक आज भी हैं, कल भी रहेंगे परंतु बाजार उन पाठकों तक पहुंचना ही नहीं चाहता। हिंदी से जुड़े पत्रकारों एवं बाजार को यह समझना होगा कि उन्हें अपने लक्ष्य को पुन: निर्धारित करने की जरूरत है।
-डॉ. शिवम तिवारी, विशाखापत्तनम