हिंदू कांग्रेस

सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू धर्म के बारे में अमेरिका में जाकर प्रवचन दिया है। उनका यह प्रवचन शिकागो में हुआ। स्वामी विवेकानंद के शिकागो में दिए गए ऐतिहासिक भाषण को १२५ वर्ष पूरे हो गए और उसी अवसर पर वैश्विक हिंदू कांग्रेस का आयोजन किया गया था। इधर हिंदुस्थान में प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेसमुक्त भारत का निर्माण कर रहे हैं। कांग्रेस जैसे गाली हो, इस तरह का विचार प्रचारित किया जा रहा है। मगर हिंदुओं का जो वैश्विक सम्मेलन हुआ, उसे भी ‘हिंदू कांग्रेस’ संबोधित किया गया। उस कांग्रेस के मंच से मोहनराव भागवत ने कुछ विचार रखे हैं। हिंदुओं में वर्चस्व बनाने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं, आक्रामकता नहीं। एक समाज के रूप में हिंदुओं को एकत्र आना चाहिए और मानव जाति के कल्याण के लिए कोशिश की जानी चाहिए, ऐसा मोहन भागवत ने हिंदू कांग्रेस में कहा। यह हिंदुओं पर लगाया गया आरोप है। हिंदू आक्रामक हों, मतलब क्या करें तथा आक्रामक हुए हिंदुओं को उनके ही राज में कानूनी टैंक तले कुचला जा रहा होगा तो उसके लिए संघ की झोली में कौन-सा चूर्ण है? हिंदुओं पर वर्चस्व बनाने की महत्वाकांक्षा थी इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की और बाजीराव पेशवा ने हिंदुत्व की पताका अफगानिस्तान, पाकिस्तान से भी आगे लहराई थी। तात्या टोपे और मंगल पांडे से लेकर वीर सावरकर तक कई लोगों ने हिंदू वर्चस्व के लिए ही ब्रिटिशों से संघर्ष किया था। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे आक्रामक हिंदुत्व के पक्षधर थे और सावरकर की तरह हिंदू शस्त्र से लैस हों, ऐसा संदेश उन्होंने दिया। हिंदू आक्रामक नहीं होता तो अयोध्या का बाबरी का कलंक पोंछा नहीं गया होता और ये सब-कुछ करने के पीछे शिवसेना का आक्रामक हिंदुत्व ही था। १९९२-९३ के मुंबई दंगे के समय शिवसेना का आक्रामक हिंदुत्व नहीं होता तो वैâसी भयंकर स्थिति यहां के समस्त हिंदुओं की हो गई होती? उस समय ये सब वैश्विक हिंदू कांग्रेसवाले कहां छिपे थे? शिवसेनाप्रमुख द्वारा मुंबई में ‘दहाड़ते’ ही वैष्णव देवी तथा अमरनाथ यात्रा निर्विघ्न संपन्न हुई और आतंकियों की हरी लुंगियां पीली हो गर्इं लेकिन हिंदू के रूप में जो सत्ता में आए, उन्होंने क्या किया? हिंदू आक्रामक और एकजुट था इसीलिए मोदी प्रधानमंत्री बने। उस एकजुटता और आक्रामकता का क्या फल मिला? शिवसेना से युति तोड़कर हिंदुत्व की पीठ में खंजर भोंककर देखा और जो-जो आक्रामक हिंदुत्व का, राष्ट्रहित का हुंकार भर रहे थे, उसे भाजपा दुश्मन ठहराने लगी। हिंदुत्व की सीढ़ी के सहारे सत्ता में आना और काम होते ही सीढ़ी फेंक देना, ऐसा हिंदुत्व इन दिनों जारी है। अब सत्ता में बैठे दिखावटी हिंदुत्ववादियों की महत्वाकांक्षा हिंदुत्व की आक्रामकता की आवाज को बंद करना है, हिंदुओं को उनके ही हिंदुस्थान में आतंकवादी ठहराकर खत्म करने की है। शिकागो के हिंदू कांग्रेस में भागवत ने इन विषयों पर कुछ कहा होता तो और अच्छा होता। शिकागो में हिंदुओं की जो वैश्विक कांग्रेस आयोजित की गई थी, वे निश्चित तौर पर कौन थे? उस कांग्रेस में दो-चार हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे, उनका आगा-पीछा क्या? शिवसेना जैसा दल चुराकर अथवा छिपाकर नहीं बल्कि खुलेआम हिंदुत्व की आक्रामक हुंकार भरता रहा है। हिंदुत्व ही हमारा पंचप्राण है। तुम्हारे वैश्विक हिंदू कांग्रेस में शिवसेना को स्थान क्यों नहीं? शिवसेना जैसे अन्य छोटे-बड़े संगठन भी हो सकते हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार वे लोग भी हिंदुत्व का काम कर रहे होंगे। उनके भी प्रतिनिधियों को तुम्हारे हिंदू कांग्रेस में स्थान देने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी। तुम्हारे हिंदू को एक होना है न, फिर यह अस्पृश्यता किसलिए? हिंदू समाज आज निराश हो चुका है। कांग्रेस ने जिस तरह मुसलमानों का इस्तेमाल किया, उसी तरह भाजपा हिंदुओं का इस्तेमाल कर रही है, ऐसी भावना बढ़ने लगी है। नेपाल से हिंदुत्व खत्म किया गया और हिंदुस्थान के प्रधानमंत्री मोदी उस पर मौन हैं। नेपाल, चीन और पाकिस्तान का अड्डा बन गया है। कश्मीर में हिंदू के रूप में आक्रामक होना तो दूर बल्कि हिंदू विरोधी और पाक प्रेमी महबूबा के प्रेम में हिंदू राष्ट्रवाले पड़ गए और कश्मीरी पंडितों को दगा दिया। ये सब-कुछ जब हो रहा था तब सरसंघचालक से आक्रामक प्रतिक्रिया की उम्मीद थी। हिंदुओं को दिया गया एक भी वचन भाजपा सरकार पूरा नहीं कर सकी है। फिर वो चाहे राम मंदिर हो अन्यथा समान नागरिक कानून हो। यह सब आक्रामक हिंदुत्व का ही एजेंडा था लेकिन सत्ता में आने से पहले का आक्रामक हिंदुत्व बाद में टांय-टांय फिस्स क्यों हो गया? इस पर ‘वैश्विक हिंदू कांग्रेस’ में चर्चा करने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी। भाजपा कांग्रेस जैसी हो गई है। कांग्रेस ने इतने वर्षों तक मुसलमानों की खुशामद तो की। मौजूदा ‘हिंदुत्ववादी’ शासन में हिंदुओं की खुशामद तो छोड़िए उन्हें ‘सेक्युलर’ बनाया जा रहा है। कांग्रेस से कांग्रेस की ओर, देश की ऐसी यात्रा शुरू हो चुकी है।