हिंदू परंपराएं और उनके फायदे

अधिकतर यह कहा जाता है कि हिंदू जीवनशैली से जुड़ी परंपराएं रुढ़िवाद पर आधारित हैं। इनका कोई तार्किक आधार नहीं है लेकिन हिंदू जीवन शैली से जुड़ी कोई भी परंपरा न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक ढंग से मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न कर जीवन को समृद्ध बनाती है। हमारे जीवन में पुराने समय से बहुत-सी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन आज भी काफी लोग कर रहे हैं। ये परंपराएं धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं लेकिन इनके वैज्ञानिक कारण भी हैं। जो लोग इन परंपराओं को अपने जीवन में उतारते हैं, वे स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियों से बचे रहते हैं। इन परंपराओं का पालन अधिकतर परिवारों में किया जाता है।
 एक ही गोत्र में शादी नहीं करना
कई शोधों में ये बात सामने आई है कि व्यक्ति को जेनेटिक बीमारी न हो इसके लिए एक इलाज है ‘सेपरेशन ऑफ जींस’ यानी अपने नजदीकी रिश्तेदारों में विवाह नहीं करना चाहिए। रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाते हैं और जींस से संबंधित बीमारियां जैसे रंगों का अंधत्व आदि होने की संभावनाएं रहती हैं। संभवत: पुराने समय में ही जींस और डीएनए के बारे खोज कर ली गई थी और इसी कारण एक गोत्र में विवाह न करने की परंपरा बनाई गई।
 कर्ण छेदन 
स्त्री और पुरुषों, दोनों के लिए पुराने समय से ही कान छिदवाने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि आज पुरुष वर्ग में ये परंपरा माननेवालों की संख्या काफी कम हो गई है। इस परंपरा की वैज्ञानिक मान्यता यह है कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है, बोली अच्छी होती है। कानों से होकर दिमाग तक जानेवाली नस का रक्त संचार नियंत्रित और व्यवस्थित रहता है। कान छिदवाने से एक्यूपंक्चर से होनेवाले स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं।
 माथे पर तिलक 
स्त्री और पुरुष माथे पर कुमकुम, चंदन का तिलक लगाते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इसी चक्र स्थान पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर तिलक लगाने से हमारी एकाग्रता बढ़ती है। मन बेकार की बातों में उलझता नहीं है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे का जो दबाव बनता है, उससे माथे तक जानेवाली नसों का रक्त संचार व्यवस्थित होता है। रक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं।
 बैठकर भोजन करना
जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन तंत्र और पेट के लिए बहुत फायदेमंद है। पालथी मारकर बैठना एक योग आसन है। इस अवस्था में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। पालथी मारकर भोजन करते समय दिमाग से एक संकेत पेट तक जाता है कि पेट भोजन ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाए। इस आसन में बैठने से गैस, कब्ज, अपच जैसी समस्याएं दूर रहती हैं।
 शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से
धार्मिक कार्यक्रमों में भोजन की शुरुआत अक्सर मिर्च-मसाले वाले व्यंजन से होती है और भोजन का अंत मिठाई से होता है। इसका वैज्ञानिक तर्क यह है कि तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है, इससे पेट में जलन नहीं होती है।
 हाथ जोड़कर नमस्ते 
हम जब भी किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते या नमस्कार करते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है नमस्ते करते समय सभी उंगलियों के शीर्ष आपस में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दवाब पड़ता है। हाथों की उंगलियों की नसों का संबंध शरीर के सभी प्रमुख अंगों से होता है। इस कारण उंगलियों पर दबाव पड़ता है तो इस एक्यूप्रेशर (दबाव) का सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है।  इस संबंध में एक अन्य तर्क यह है कि जब हम हाथ मिलाकर अभिवादन करते हैं तो सामनेवाले व्यक्ति के कीटाणु हम तक पहुंच सकते हैं जबकि नमस्ते करने पर एक-दूसरे का शारीरिक रूप से संपर्क नहीं हो पाता है और बीमारी पैâलानेवाले वायरस हम तक पहुंच नहीं पाते हैं।
 पीपल की पूजा
आमतौर पर लोगों की मान्यता यह है कि पीपल की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसका एक तर्क यह है कि इसकी पूजा इसलिए की जाती है ताकि हम वृक्षों की सुरक्षा और देखभाल करें और वृक्षों का सम्मान करें, उन्हें काटें नहीं। पीपल एकमात्र ऐसा वृक्ष है, जो रात में भी ऑक्सीजन छोड़ता है इसीलिए अन्य वृक्षों की अपेक्षा इसका महत्व काफी अधिक बताया गया है।
 दक्षिण में सिर करके सोना
दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोने पर बुरे सपने आते हैं इसीलिए उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक तर्क ये है कि जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर प्रवाहित होने लगता है, इससे दिमाग से संबंधित कोई बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर भी असंतुलित हो सकता है। दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से यह परेशानियां नहीं होती हैं।
 सूर्य पूजा 
सुबह सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क ये है कि जल चढ़ाते समय पानी से आनेवाली सूर्य की किरणें, जब हमारी आंखों में पहुंचती हैं तो आंखों की रोशनी अच्छी होती है। साथ ही, सुबह-सुबह की धूप भी हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होती है। कुंडली में सूर्य के अशुभ फल खत्म होते हैं।
 शिखा 
पुराने समय में सभी ऋषि-मुनि सिर पर शिखा यानी चोटी रखते थे। आज भी कई लोग रखते हैं। मान्यता है कि जिस जगह पर चोटी रखी जाती है, उस जगह दिमाग की सारी नसों का केंद्र होता है। यहां चोटी रहती है तो दिमाग स्थिर रहता है। क्रोध नहीं आता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। मानसिक मजबूती मिलती है और एकाग्रता बढ़ती है।
 व्रत 
पूजा-पाठ, त्योहार या एकादशियों पर लोग व्रत रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से पाचनतंत्र को आराम मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से वैंâसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी, मधुमेह आदि रोग होने की संभावनाएं भी कम रहती हैं।
 चरण-स्पर्श 
किसी बड़े व्यक्ति से मिलते समय उसके चरण-स्पर्श करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा के संबंध में मान्यता है कि मस्तिष्क से निकलनेवाली ऊर्जा हमारे हाथों से सामनेवाले पैरों तक पहुंचती है और बड़े व्यक्ति के पैरों से होते हुए उसके हाथों तक पहुंचती है। आशीर्वाद देते समय व्यक्ति चरण छूनेवाले के सिर पर अपना हाथ रखता है, इससे हाथों से वह ऊर्जा पुन: हमारे मस्तिष्क तक पहुंचती है, इससे ऊर्जा का एक चक्र पूरा होता है।
 मांग में सिंदूर 
विवाहित महिलाओं के लिए मांग में सिंदूर लगाना अनिवार्य परंपरा है। इस संबंध में तर्क यह है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और पारा (पारा- तरल धातु) होता है। इन तीनों का मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है, इससे मानसिक तनाव भी कम होता है।
 तुलसी पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसका तर्क यह है कि तुलसी के संपर्क से हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। यदि घर में तुलसी होगी तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे कई बीमारियां दूर रहती हैं।