हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल

उत्तर प्रदेश का बुलंदशहर इन दिनों चर्चा में है। गोकशी के आरोप, फिर भीड़ का आंदोलन और उसके बाद एक पुलिस अधिकारी की मौत से वहां का माहौल और भी गर्म है लेकिन जिस एक खबर को महत्व मिलना चाहिए था, वह नकारात्मक खबरों में दब कर रह गई। ऐसे वक्त में जब कुछ ताकतें दो संप्रदायों में नफरत पैदा करने की कोशिशों में जुटी हैं। बुलंदशहर जिले के जैनपुर में ग्रामीणों ने सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल कायम कर दी। बुलंदशहर के दरियापुर में आयोजित इज्तेमा में जा रहे मुस्लिम समाज के लोग जब ट्रैफिक जाम में फंस गए तब स्थानीय ग्रामीणों ने प्राचीन शिव मंदिर परिसर में जोहर की नमाज अदा कराने की व्यवस्था कराकर हिंदू-मुस्लिम एकता की नई मिसाल कायम कर आपसी सौहार्द का संदेश दिया। नमाज के दौरान कोई परेशानी न हो, इसके लिए उनका पूरा ख्याल रखा गया। नमाज के बाद सभी को जलपान कराकर उन्हें इज्तमा के लिए खुशी-खुशी रवाना किया गया।
बता दें कि बुलंदशहर के दरियापुर में तीन दिवसीय आलमी तब्लीगी इज्तेमा चल रहा था। प्रदेश के विभिन्न जिलों से इज्तमा में लोग पहुंच रहे थे। इसके अलावा आस-पास के गांवों के लोग भी ट्रैक्टर और ट्रॉलियों के साथ ही अपने-अपने वाहनों से इज्तमा में शरीक होने के लिए पहुंच रहे थे। बुलंदशहर कोतवाली देहात क्षेत्र के गांव जैनपुर के पास ट्रैफिक जाम में काफी लोग फंसे हुए थे और उसी दौरान जोहर की नमाज का वक्त हो गया। बताया गया कि कुछ लोगों ने सड़क स्थित शिव मंदिर के बाहर नमाज पढ़नी शुरू कर दी थी। जैनपुर के ग्रामीणों ने जब लोगों को सड़क पर नमाज अदा करते देखा तो उन्हें प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में नमाज पढ़ने के लिए कहा। स्थानीय हमवतन हिंदू भाइयों का सहयोग मिलने के बाद करीब १५० मुसलमानों ने परंपरागत वुजू करके मंदिर प्रांगण में जोहर की नमाज अदा की। नमाजियों को कोई परेशानी न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए काफी हिंदू भाई मंदिर प्रांगण के बाहर ही खड़े रहे और शांतिपूर्वक नमाज अदा कराने में सहयोग किया।
जब प्राचीन शिव मंदिर परिसर में मुस्लिम भाई जोहर की नमाज अदा कर रहे थे तब शायद सभी लोगों की जुबां पर यही बात रही होगी कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।’ इस एक वाकये की बुनियाद पर कहा जा सकता है कि समझदारी और भाईचारगी से बड़े से बड़े मसले का हल ढूंढ़ा जा सकता है। इससे पहले इसी तरह की खबरों ने तब आकर्षित किया था, जब यह पता चला था कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा पर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से केवल हिंदू नहीं बल्कि बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग भी गए थे। इसमें कुछ श्रद्धालु पहले भी यात्रा का हिस्सा बनकर बर्फानी बाबा की छवि देख चुके थे। ऐसा ही एक उदहारण है अजीमाबाद के मुंशी खां की अनूठी इबादत का। रोजाना पांच वक्त की नमाज पढ़ने और शाम को बजरंगबली का स्मरण करनेवाले मुंशी खान की दूर-दूर तक ख्याति है। पेशे से दिहाड़ी मजदूर मुंशी बताते हैं कि एक रोज नमाज पढ़कर लौटे तो आंख लग गई। स्वप्न में हनुमान जी आए तो मुंशी जी ने पूछा कि ‘मैं मुसलमान हूं, तुम मेरे पास क्यों आए हो?’ इसके बाद सपने में हनुमान जी बोले कि मैंने तो सबको इंसान बनाया है, बांटने का काम तो तुम लोगों ने खुद किया। उसके बाद मुंशी शहर से बजरंगबली की मूर्ति लेकर आए और अपने घर के पास मूर्ति स्थापना करा दी। तब से उनकी हर सांझ मूर्ति के समक्ष दीया जलाने के साथ ही रौशन होती है। वे बजरंगबली को समय-समय पर चोला भी चढ़ाते हैं।
कुछ यही हाल है ब्रज क्षेत्र के गांव राधानगरी का है, जहां सांप्रदायिक सौहार्द की गाथा गर्व से बताई जाती है। मुस्लिम बहुल इस गांव में होली का त्योहार सभी मिलकर मनाते हैं। गांव की गलियों में चौपाई गाते हैं, एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं और फिर गुझिया की मिठास से भाईचारे की मोहब्बत भरी इबारत लिखी जाती है। गांव के मुसलमान भाई इस बात पर गर्व महसूस करते हैं कि जहां एक ओर देश-विदेश के लोग राधा-कृष्ण के नाम के पीछे ब्रजभूमि आते हैं, उस नाम के गांव में उनका जन्म सौभाग्य की बात है। इसी तरह एक वक्त था जब मुज्जफरनगर भले ही दंगे की आग में सुलग रहा था लेकिन तब श्रीराम, लक्ष्मण, जानकी, हनुमान, कुंभकरण, मेघनाद और रावण के पुतलों के निर्माण में जुटे मेरठ के हिंदू और मुस्लिम कारीगर देश में भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रहे थे। दंगे का दंश झेल चुके उसी मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक सौहार्द की एक और नायाब मिसाल पेश की गई। इंसानियत और मोहब्बत का पैगाम देने के लिए दंगों के बाद एक ही मंडप में हिंदू और मुस्लिम बेटियों का विवाह कराया गया।
ऐसे ही एक सज्जन हैं हकीम नूर मोहम्मद, जो हैं तो धर्म से मुस्लिम फिर भी हिंदू धर्म के प्रति मन में अगाध श्रद्धा है। वे मंदिर नहीं जाते लेकिन हिंदू देवी-देवताओं के प्रति उनकी श्रद्धा और भक्ति किसी भी हिंदू से कम नहीं है। यही कारण है कि वे देखते ही देखते पानी में देवी-देवताओं की हू-ब-हू प्रतिकृति बना देते हैं। पानी में रंगोली के जरिए देवी-देवताओं और देश की प्रतिकृति बनाने के इस जुनून ने उन्हें देश भर में एक अलग पहचान दिलाई है। देश में एक ऐसी मस्जिद भी है, जहां सांप्रदायिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल देखने को मिलती है। असम के काचर जिले में स्थित जामा मस्जिद के दूसरे मंजिले पर एक दर्जन अलमारियां हैं। इसमें हिंदू, ईसाई और इस्‍लाम धर्म पर लगभग ३०० किताबें हैं। ये सभी पुस्‍तकें बांग्‍ला भाषा में हैं। मस्जिद के भीतर पढ़ने के लिए कमरा और लाइब्रेरी का होना बहुत दुर्लभ है लेकिन यहां ये दोनों ही चीजें उपलब्‍ध हैं। इस लाइब्रेरी में कुरआन, इस्‍लाम धर्म पर आधारित अन्‍य पुस्‍तकों के अलावा ईसाई दर्शन, वेद, उपनिषद, रामकृष्‍ण परमहंस तथा विवेकानंद का जीवन परिचय और रविंद्रनाथ टैगोर तथा शरद चंद्र चट्टोपाध्‍याय के उपन्‍यास मौजूद हैं।
एक और उदहारण भी बताते चलें जब धर्म की दीवारें बिखेर दी गर्इं। इसी वर्ष ईद-उल-फितर के एक दिन पहले नोएडा के जेपी हॉस्पिटल में दोस्ती और भाईचारे की एक अनूठी मिसाल सामने आई, जहां के डॉक्टरों ने एक हिंदू और एक मुस्लिम मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट कर उन दोनों को नई जिंदगी दी। हिंदू मरीज की पत्नी का ब्लड ग्रुप मुस्लिम मरीज के साथ और मुस्लिम मरीज की पत्नी का ब्लड ग्रुप हिंदू मरीज के साथ मैच हो रहा था, ऐसे में डॉक्टरों ने इन्हें एक दूसरे को किडनी देने का सुझाव देकर एक बेहतर भाईचारे की मिसाल पेश की।
देश के कई इलाकों से सांप्रदायिक हिंसा की खबरें अक्‍सर आती रहती हैं। इस तरह की हिंसा में जहां सामाजिक ताना-बाना बिगड़ता है, वहीं जानमाल का भी काफी नुकसान होता है। दरअसल, ये उदाहरण बताते हैं कि हमारा देश एक ऐसा प्राचीन देश है, जहां अलग-अलग धर्म के लोग एक-दूसरे के धर्मों का सम्मान करते हैं। ऐसे अनेकों किस्से और वाकयात स्थानीय अखबारों के आतंरिक पन्नों में खो जाते हैं। मुस्लिम समाज को चाहिए कि ऐसे नायाब उदाहरणों को उर्दू अखबारों के जरिए भी आम मुसलमानों तक पहुंचाएं। सोशल मीडिया को सिर्फ नफरत भरे मैसेज भेजने का अड्डा बनाने के बजाय ऐसे प्रेरक प्रसंग भेजने का साधन बनाएं। देश बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है। सब्र और हमवतन भाइयों का विश्वास ही वो ताकत है, जिसके बल पर मुस्लिम समाज शान से खड़ा रह सकता है। नफरत पैâलानेवाली ताकतों के बहकावे में आना मुस्लिम समाज के लिए ही घातक होगा। क्या मुस्लिम रहनुमा इस हिकमतअमली पर गौर करेंगे? या अपनी सियासी दुकान चमकाने के लिए मुसलमानों को बलि का बकरा बनाते रहेंगे? इसी बात को आम मुसलामानों को भी सोचना होगा कि क्या वे राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होना चाहेंगे या वोटबैंक बनकर जिल्लत की जिंदगी जीते रहेंगे?