" /> हीरो बनना चाहते थे अमरीश पुरी

हीरो बनना चाहते थे अमरीश पुरी

स्व. अमरीश पुरी का जन्म एक ऐसे पारंपरिक पंजाबी परिवार में हुआ था, जो रूढ़ियों में बंधा हुआ था, जहां फिल्में देखना और फिल्मों में काम करना बुरी बात थी। किंतु पुरी परिवार का बड़ा बेटा मदन पुरी मुंबई पहुंच गया और फिल्मों में काम करने लगा। जब मदन ने पत्र लिखकर पिता को फिल्मों में काम करने के बारे में बताया तो उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। किंतु भाग्य की विडंबना देखिए शिक्षा पूरी करने के बाद अमरीश पुरी को भी बड़े भाई मदन पुरी के पास काम की तलाश में मुंबई आना पड़ा, बल्कि फिल्मों में काम पाने के लिए कठोर संघर्ष करना पड़ा।
कॉलेज के दौरान हॉस्टल में रहने के कारण अमरीश को फिल्में देखने का चस्का लग गया। फिल्में देखते-देखते अमरीश पुरी को नाटकों में अभिनय करने का शौक भी लग गया। किंतु भाग्य उन्हें सिनेमा के परदे पर पहुंचा देगा, इसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। शिक्षा पूरी करने के बाद जब भविष्य की कोई राह न मिली तो अमरीश पुरी ने बड़े भाई मदन पुरी से मदद मांगी। मदन पुरी तब फिल्मों में स्थापित हो चुके थे। मदन पुरी ने छोटे भाई को तुरंत मुंबई बुला लिया। मुंबई पहुंचने के बाद एक दिन मदन पुरी ने अमरीश का फोटो सेशन करवाया और कई निर्माताओं के पास फोटो भिजवाए। छह महीने के बाद देवेंद्र गोयल ने अमरीश पुरी को अपनी नई फिल्म में एक छोटी सी भूमिका का ऑफर दिया। अमरीश ने इसके लिए तुरंत हां कर दी लेकिन मदन पुरी ने समझाया कि अगर उसने वो छोटी भूमिका कर ली तो जिंदगी भर वो छोटी भूमिकाएं ही करता रहेगा और कभी फिल्मों का हीरो नहीं बन पाएगा। लिहाजा, अमरीश ने वो भूमिका ठुकरा दी और निणर्‍य लिया कि वे फिल्मों में काम करेंगे तो केवल हीरो की भूमिका ही करेंगे।
१९६२ में पहली बार अमरीश पुरी ने रंगकर्मी सत्यदेव दुबे के प्रसिद्ध नाटक ‘अंधा युग’ में अभिनय किया और अपने सशक्त व प्रभावशाली अभिनय के लिए उन्हें इतनी प्रशंसा मिली कि दुबे ने उन्हें अपने आगामी कई नाटकों के लिए चुन लिया। अमरीश बेचैन थे कि थिएटर का कुशल अभिनेता बन जाने के बावजूद उन्हें फिल्मों में अवसर नहीं मिल पा रहा था। एक दिन थिएटर के मित्र कलाकारों की सलाह पर अमरीश पुरी ने ‘फिल्मालय एक्टिंग स्कूल’ में दाखिला ले लिया और स्कूल के प्रिंसिपल पी.डी. शेनाय से अभिनय के तकनीकी पहलुओं को समझना-सीखना आरंभ किया। किंतु, इन सब कोशिशों के बावजूद दुर्भाग्य अमरीश पुरी का पीछा नहीं छोड़ रहा था। फिल्मालय स्कूल के प्रिंसिपल शेनाय ने १९७० में संजय खान और बबिता को लेकर फिल्म ‘सोने के हाथ’ आरंभ की और अमरीश पुरी को फिल्म के खलनायक की भूमिका का प्रस्ताव दिया। किंतु अमरीश ने कहा- ‘मैं हीरो बनना चाहता हूं। इसलिए खलनायक की यह भूमिका नहीं कर सकूंगा। क्षमा करें’। इस प्रकार अमरीश पुरी ने हीरो बनने के चक्कर में एक और अवसर गंवा दिया। १९७३ में नाट्यकर्मी गिरीश कर्नांड ने फिल्म ‘काडू’ को कन्नड भाषा में बनाने का निर्णय लिया तो एक महत्वपूर्ण भूमिका अमरीश पुरी को दे दी। ‘काडू’ एक प्रकार से कला फिल्म थी और गिरीश ने थिएटर में अमरीश पुरी की अभिनय क्षमता को देखकर ही वह भूमिका दी थी। ‘काडू’ में अमरीश पुरी के अभिनय से प्रभावित होकर श्याम बेनेगल ने अमरीश पुरी को अपनी फिल्म ‘निशांत’ में अवसर दिया। यह एक चैलेंजिंग भूमिका थी किंतु अमरीश पुरी ने अपने सशक्त अभिनय से इस भूमिका को भी स्वाभाविक बना दिया और श्याम बेनेगल ने उन्हें अपनी आगामी फिल्मों ‘मंथन’ व ‘भूमिका’ में भी ले लिया। इन फिल्मों से अमरीश पुरी को फिल्म जगत में पहचान तो मिलने लगी थी किंतु एक ठप्पा भी उन पर लगने लगा था। यह ठप्पा ‘कला’ फिल्मों के अभिनेता का था। इस ठप्पे के कारण उन्हें व्यावसायिक फिल्में नहीं मिल रही थीं। दूसरी ओर अमरीश पुरी ने इस कड़वे सच को स्वीकार कर लिया था कि शायद हीरो बनना उनके भाग्य में नहीं है।
अंतत: निर्माता बोनी कपूर ने निर्देशक बापू के आग्रह पर बड़ी कठिनाई से अमरीश को अपनी नई फिल्म ‘हम पांच’ में लिया। यह एक ऐसी फिल्म थी, जो न कला फिल्म की श्रेणी में आती थी और न व्यावसायिक फिल्म की श्रेणी में। ‘हम पांच’ एक सफल फिल्म साबित हुई और अमरीश पुरी के लिए व्यावसायिक फिल्मों का वह दरवाजा खुल गया, जिसके लिए वे वर्षों से संघर्ष कर रहे थे। ‘हम पांच’ के बाद अमरीश पुरी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके नाम से हिंदी फिल्मों के परदे पर एक ऐसा खलनायक जन्मा, जो नंबर वन के सिंहासन पर ही आरूढ़ नहीं हुआ अपितु भारतीय सिनेमा की सीमाओं को पार कर अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के आकाश तक पहुंचा। किंतु हीरो न बन पाने की कसक अमरीश पुरी के दिल में मृत्यु पर्यंत रही।