हुआ तो हुआ

देखो भाई साहब! बात तो यह है कि कभी-कभी हो जाता है। आप लाख कोशिश करें, कितना भी प्रिकॉशन लें, तमाम तरह के इलाज करें फिर भी जब होना होगा तब हो कर रहेगा। जब हुआ तो हुआ! उसके लिए इतना बवाल मचाने की, छाती पीटने की और सिर के बाल नोचने की क्या जरूरत है? हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी बताया गया है और गीता ने भी अनेक बार समझाया है कि जो होना होता है वह होकर ही रहता है इसे कोई नहीं बदल सकता। यह सब प्रकृति के खेल हैं। जब भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण होनी को नहीं रोक सके तो हम और आप क्या कर सकते हैं? हम माने क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा! इसीलिए भलाई इसी में है कि चुपचाप जो हो रहा है उसे होने दें और जो हो चुका है उस पर बवाल न खड़ा करें। हुआ सो हुआ! कुछ लोग इतने छिद्रान्वेषी होते हैं और बाल की खाल निकालनेवाले होते हैं कि जो हो चुका है उस पर सियारों की तरह एकजुट होकर हुआं-हुआं करने लगते हैं। क्या हुआ? वैâसे हुआ? कब हुआ? रुका क्यों नहीं? कहकर चिल्लाने लगते हैं। यह सब बवाल करने की क्या जरूरत है? भाई हुआ तो हुआ! कभी-कभार उचित खान-पान न होने से जैसे कोई गड़बड़ हो जाती है और व्यक्ति को जुलाब हो जाता है तो आदमी क्या करता है? क्या जाकर अपने आप को जलती भट्ठी में झोंक देता है? अरे भाई हुआ तो हुआ! बड़े-बड़ों को हो जाता है। इस दुनिया में कौन ऐसा है, जिसको कभी न हुआ हो? होना तो प्राकृतिक नियम है इसे कोई नहीं रोक सकता। होने पर रोने का कोई मतलब नहीं। हुआ तो हुआ!