हुकूमत हकीकत जानती है…

किसी राष्ट्र के विकास में सबसे अहम कारक उसकी प्राथमिकताएं होती हैं और प्राथमिकताओं का ईमानदारी से चयन करना सरकार का जिम्मा है। उन्हें नजरअंदाज करके, सियासी इच्छाओं को लादकर अधूरी तैयारियों से जल्दबाजी के काम कभी अंजाम तक नहीं पहुंचते। बात देश में हाईस्पीड रेल नेटवर्क की हो, बुलेट ट्रेन परियोजना की हो या उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक) की, सभी का हश्र यही गवाही दे रहा है। केंद्र सरकार हमेशा विकास के मानक पर इन्हीं परियोजनाओं को भुनाने की कोशिश करती रही है। परंतु हकीकत में न देश में हाई-स्पीड रेलवे चली, न बुलेट ट्रेन की जमीं बनी और न ही ‘उड़ान’ को आसमान मिला। हाल के कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में इन परियोजनाओं के नाकाम होने की दास्तां छिपी है। जो सरकार के अनियोजित विकास के दावों को परत-दर-परत उधेड़ने के लिए काफी हैं।
रेल नेटवर्क को सक्षम बनाए बिना, रेल तंत्र को मजबूत किए बिना रफ्तार के सपने देखना बेमाने हैं। जानकार यही जानकारी रेलवे आलाकमान को अर्से से दे रहे हैं, पर रेलवे ने उस पर कभी गौर ही नहीं किया। लिहाजा, ट्रेनें रेंगने लगीं। आंकड़े बताते हैं कि १६०० मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में से प्रतिदिन ५२५ देरी से अपने गंतव्य पर पहुंचती हैं, मात्र ६५ प्रतिशत ट्रेनें ही समय पर होती हैं। ताजा-ताजा खबर है कि अब भारतीय रेलवे की ट्रेनें ‘लेट’ ही नहीं होंगी, बल्कि तकनीकी तौर पर वे लेट नहीं कहलाएंगी। रेलवे ने लंबी दूरी की लेटलतीफ ट्रेनों का रनिंग टाइम ही बढ़ा दिया है। ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।’ ट्रेनों की समयावधि ही जब बढ़ जाएगी तो उनके लेट होने का प्रश्न ही कहां उठता है? दूसरे शब्दों में कहें तो पहले चरण में ऐसी ९३ ट्रेनों को अब ‘लो-स्पीड का अधिकृत दर्जा’ मिल रहा है वो भी कल से। ये उपलब्धि उस सरकार की है, जो पिछले चार वर्षों से ट्रेनों को हाई-स्पीड बनाने का प्रयोजन कर रही थी। कभी स्पेन की टेल्गो, तो कभी देशी गतिमान के ट्रायल ले रही थी। परंतु ऐसा करते वक्त उसने हमेशा जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया। तभी तो अब तक गतिमान को भी गति का मान नहीं मिल सका। समंदर लांघकर टेल्गो आई भी, पर अंत में उसे टाटा ही करना पड़ा। टेल्गो पूरे देश में दौड़ लगाकर-लगाकर लौट गई पर भारतीय रेलवे की रफ्तार नहीं लौटी, वो हाई-स्पीड नहीं हो सकी। नई संकल्पना, नए प्रयोग असफल होते चले गए। दुर्घटनाएं बढ़ीं और ट्रेनें लेट-लतीफ ही रहीं। अब एक बार फिर नए रेल मंत्री को पुराने रेल तंत्र की याद आई है। एक हाई लेवल मीटिंग में लालू यादव के जमाने का ‘जीरो बेस टाइम टेबल’ लागू करने पर विचार होने जा रहा है। हो सकता है इससे हालात में कुछ सुधार आए।
अब बात देश की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना की करते हैं। देश के लिए गैर जरूरी बुलेट ट्रेन के मामले में भी हालात यही हैं। १.१० लाख करोड़ रुपए की इस परियोजना पर जनवरी २०१९ से काम शुरू होना है और ५०८ किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर के लिए साल के अंत तक जमीन अधिग्रहण की डेडलाइन तय है, जिससे ७ हजार किसान अपनी भूमि से वंचित होंगे, १५ हजार परिवार व ६० लाख लोग विस्थापित होंगे वो अलग से। इस परियोजना का अधिकतर हिस्सा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा फिर भी इसका कोई खासा लाभ आम इंसान को नहीं हो सकेगा। इसीलिए आदिवासी-किसानों के बाद अब बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए गोदरेज समूह ने भी अपनी जमीन देने से इंकार कर दिया है। सभी कह रहे हैं कि बुलेट ट्रेन बाद में चलाना, पहले जो चल रही है उसे तो दुरुस्त कर लो। देश के ख्यातिप्राप्त अनुभवी विशेषज्ञ तक जब इस आवाज में आवाज मिलाएं, तब इस पर सरकार को पुनर्विचार करना जरूरी हो जाता है। भारत सरकार के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण और जापान के राष्ट्रीय सम्मान ‘आर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ से नवाजे गए भारतीय इंजीनियरिंग सेवा (आईईएस) से सेवानिवृत्त अधिकारी ई. श्रीधरन को देश में कौन नहीं जानता। १९९५ से २०१२ तक दिल्ली मेट्रो के प्रबंध निदेशक के तौर पर उनकी बेहतरीन सेवा के बूते वे मेट्रोमैन कहलाए। हाल ही में मोदी सरकार ने उन्हें देश में मेट्रो रेलतंत्र के मानदंड निर्धारित करने के लिए गठित होने वाली समिति का अध्यक्ष बनाने का फैसला किया है। ८६ वर्ष की उम्र में सरकार की ओर से इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती नजर आने के बावजूद अगर श्री श्रीधरन बुलेट ट्रेन परियोजना पर सार्वजनिक तौर पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं तो उसमें निहित तथ्य पर सवाल नहीं खड़ा हो सकता। श्रीधरन बेहद दृढ़ता से कहते हैं कि भारत को आधुनिक साफ-सुरक्षित और तेज रेलवे सिस्टम चाहिए, बुलेट ट्रेन नहीं। उनका सीधा तर्क है कि देश की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए, इसका विचार न करते हुए नेता मनचाहे तरीके से ऐसी योजनाएं बनाते हैं, जो सिर्फ समाज के अभिजात्य वर्ग पर केंद्रित होती हैं। जिसका आम जनता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। हजारों करोड़ लागत से बुलेट ट्रेन बन भी गई तो उसका इस्तेमाल कितने लोग करेंगे? यही सवाल अर्से से यह देश पूछ रहा है। जिस तरह मोदी जी ने कभी कहा था कि उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर कोई शक नहीं किया जाना चाहिए, उसी तरह श्रीधरन की रचनात्मक सोच पर भी शक करने का कोई कारण नहीं है और उनकीr सोच कहती है कि बुलेट ट्रेन सिर्फ एलीट क्लास के लिए है। यह काफी महंगी है और यह सामान्य जनता की पहुंच से बेहद दूर है।
आज दुनिया के सभी देशों में रेलवे की प्राथमिकताएं उनके मौजूदा रेल नेटवर्क सुधार की हैं। हर ओर रेलवे को सुरक्षित, हाई स्पीड, आरामदायक अधिक स्पेस वाले हल्के और मजबूत कोच इस्तेमाल तथा पैसेंजर प्रâेंडली, बेहतर तकनीक वाला किफायती सिस्टम बनाने पर जोर है। हमारे देश में आज दशकों बाद भी उन्नत एलएचबी कोच राजधानी और शताब्दी जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनों के दायरे से आगे बढ़कर सभी ट्रेनों में नहीं लग सके हैं। हमारी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें आज भी परंपरागत पुराने कोचों के सहारे रेंग रही हैं। दम तोड़ चुके इंजन उन्हें खींच रहे हैं। ऐसी ट्रेनों में यात्री सुविधाएं अब भी दिखावा मात्र हैं। श्रीधरन का इशारा रेलवे के इसी सुधार की ओर है। मेट्रोमैन का आकलन है कि विकसित देशों की तुलना में भारतीय रेल प्रणाली अभी भी तीन दशक पिछड़ी हुई है इसलिए सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए कि वो पहले उसे सुधारे। श्रीधरन का मानना है कि समयबद्धता के मामले में भारतीय रेलवे का प्रदर्शन सबसे खराब है। बल्कि हकीकत तो यह है कि कई महत्वपूर्ण ट्रेनों की गति कम हो चुकी है और आंकड़े भी वही बताते हैं।
उधर दूसरी ओर, सरकार की ‘उड़ान’ योजना उड़ान भरते ही जमीन पर आ गई है। अकेले महाराष्ट्र में ‘उड़ान’ के अंतर्गत १० हवाई अड्डे बनाने की मंजूरी मिली थी। इनमें नांदेड, नासिक, कोल्हापुर और जलगांव में सेवा शुरू हुई जबकि रत्नागिरी, गोंदिया, अमरावती और सातारा हवाई अड्डे का काम अभी जारी है। अप्रैल में गाजे-बाजे के साथ शुरू हुई कोल्हापुर-मुंबई हवाई सेवा ठप है। इसके अलावा नासिक-पुणे, नासिक-मुंबई, मुंबई-जलगांव, मुंबई-बेलगाम हवाई सेवाएं भी तकनीकी कारण बताकर बंद कर दी गई हैं। कोल्हापुर-बंगलुरु, कोल्हापुर-हैदराबाद और कोल्हापुर-तिरुपति हवाई सेवाओं पर भी प्रश्नचिह्न है। कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा है, सुविधाओं का अभाव है, हालात ‘उड़ान’ के अनुकूल नही बन पाए हैं। जो सरकार सरकारी विमान के लिए एक पायलट का इंतजाम नहीं कर सकती और उसकी अनुपस्थिति में सालाना १३ करोड़ रुपए से अधिक की राशि निजी सेवा पर खर्च कर देती है, वो भला ‘उड़ान’ के लिए सकारात्मक माहौल कैसे बना पाएगी? यह भी तब विचारणीय हो जाता है। बात महाराष्ट्र सरकार की है। मई २०१७ में मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर की दुर्घटना और पायलट की कमी के चलते मुख्यमंत्री की विमान यात्रा पर सालाना १३.२४ करोड़ का खर्च हुआ है। ६.१३ करोड़ हेलीकॉप्टर सेवा के लिए खर्च किए गए हैं। एक विमान पायलट के नौकरी छोड़कर जाने से ठेके के पायलट और किराए के विमान पर सरकार को निर्भर होना पड़ता है। भारत में विमान हादसे और बढ़ती आपात लैंडिंग न केवल देश में बल्कि दुनिया में चिंता का विषय है अमेरिका की एफएफए हिंदुस्तान की डीजीसीए के साथ मिलकर एटीसी लाइसेंस प्रणाली को सख्त करने पर विचार कर रही है। राज्य में पिछले डेढ़ साल में तीन हवाई हादसे हो चुके हैं। परंतु उनकी रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है उस पर मुंबई में चार्टर्ड विमान हादसे में ५ की मौत बहुत कुछ कहती है। मेंटेनेंस इंजीनियर सुरभि गुप्ता को जो अंदेशा था वो जब तकनीकी तंत्र को नहीं होता तब यात्री उड़ानों पर संकट के बादल मंडराने से स्थिति चिंताजनक हो जाती है। हिंदुस्थान में उड्डयन नियमों में ढील को लेकर सीबीआई को भ्रष्टाचार की बू आ रही है। राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति की फाइलें जब्त की गई हैं। पूछताछ जारी है। उस पर सस्ती दरों का हवाई सपना समय से पहले ही जमींदोज हो रहा है।
प्रधानमंत्री भले ही उनकी सरकार की प्राथमिकता सुविधाजनक, आरामदायक और किफायती शहरी परिवहन व्यवस्था निर्माण को बताएं पर उनका सारा जोर जब बुलेट पर होता है तो उनकी ये बातें बेमानी लगती हैं। चार साल बीतते-बीतते सरकार को विकास के इन मोर्चों पर जबर्दस्त निराशा हाथ लगी है। उसके अविकसित नीतिगत पंखों के सहारे सियासी उड़ान भरने के मंसूबे जमींदोज हो रहे हैं।
बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछताय,
काम बिगारै आपनो, जग में होत हसाय!
दो पंक्तियों की इस एक चौपाई में आज दिल्ली का समग्र दर्द दबा है। अब केंद्र सरकार की स्थिति ‘सोचा था क्या, क्या हो गया’वाली हो गई है। उसके सपने तो हाई स्पीड रेलवे के थे, नौबत ट्रेनों को ‘लो’ स्पीड करने की आ पड़ी। वादे हवाई चप्पलवालों की हवाई यात्रा के थे, पर ‘उड़ान’ ही जमीं पर आ गई। चार वर्षों तक सियासी सपनों में खोई सरकार को इसकी सुध ही नहीं थी वो अब जाकर चेती है, जब दस महीनों बाद उसका इम्तिहान है, जब जनता के सामने उसे रिपोर्ट कार्ड पेश करना है। तब उसे एहसास हुआ है कि उसकी प्राथमिकताओं में विकास के मूलभूत सुधारों का शुमार होना चाहिए था। पहले विकास की जमीन मजबूत की जानी चाहिए थी, तब उसे सपनों की उड़ान भरनी थी। बिना ढांचागत सुधार के न तो जमीनी रफ्तार संभव है, न ही आसमानी ‘उड़ान’। हुकूमत ये हकीकत जानती है।