हुजूर नमाज छोड़िए, वाह ताज बोलिए!

कई साल पहले एक विज्ञापन आता था जिसमें तबला नवाज उस्ताद जाकिर हुसैन तबला बजाते हुए ‘वाह उस्ताद वाह’ कहते हैं तो जवाब में नन्हा उस्ताद कहता है, ‘वाह उस्ताद नहीं, वाह ताज बोलिए।’ अब कुछ इसी तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने कल आदेश दिया है ताज परिसर में नमाज पढ़नेवाले नमाजियों को। इसके बाद लखनवी नफासती अंदाज में कहा जा सकता है कि हुजूर नमाज छोड़िए, वाह ताज बोलिए। सुप्रीम कोर्ट ने ताज परिसर में नमाज पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके बाद वहां नमाज नहीं पढ़ी जा सकेगी। जबकि अभी तक ताज परिसर में मुख्य इमारत के पश्चिम में एक इमारत को मस्जिद मानकर वहां नमाज पढ़ी जाती रही है।
शिव मंदिर है ताज
सुप्रीम कोर्ट द्वारा ताजमहल परिसर में नमाज पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के बाद इस बात को बल मिला है कि ताजमहल पूर्व में एक शिवमंदिर था जिसे बाद में एक मकबरे में तब्दील किया गया है। इतिहासकार पी.एन. ओक की पुस्तक ‘ताजमहल इज ए हिंदू टेंपल पैलेस’ और ‘ताजमहल द ट्रू स्टोरी’ में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।
अपनी किताब में ओक ने करीब १०० उदाहरण दिए हैं कि किस तरह ताजमहल एक शिव मंदिर ‘तेजोमहालय’ है। ओक ने जिक्र किया है कि ताज में बहुत सी आकृतियां व नक्काशी हैं जो शिव मंदिर की ओर इशारा करती हैं। ताज के बहुत से कमरे बरसों से बंद पड़े हैं। कहा जाता है कि इन्हें जानबूझकर बंद रखा गया है क्योंकि अगर इन्हें आम जनता के लिए खोल दिया गया तो तेजोमहालय का सच पूरी दुनिया के सामने आ जाएगा। ताजमहल को इस तरह बनाया गया है कि उसके दाएं और बाएं हिस्से में एक जैसी चीजें नजर आती हैं। ताज के भीतर गुंबद के नीचे एक कब्र है और उसके बगल में दूसरी। जबकि अगर वास्तव में इन कब्रों के लिए अगर ताजमहल का निर्माण किया गया होता तो दोनों कब्रों के लिए दाएं-बाएं बराबर की जगह निर्धारित की गई होती। ओक की किताब में जो सबसे प्रमुख प्रमाण है वो मुमताज की कब्र पर बूंद-बूंद टपकते पानी का है। दुनिया में कहीं भी कब्र पर इस तरह से बूंद-बूंद पानी नहीं टपकता है। जबकि शिव मंदिर में शिवलिंग पर बूंद-बूंद पानी टपकता है। ओक के अनुसार ताजमहल प्राचीन काल का शिव मंदिर है जिसे बाद में मुमताज का मकबरा बनाकर उसका नाम ताजमहल रख दिया गया।