हेल्थ इमजेंसी का मर्म

प्रदूषण को लेकर किसी राज्य में आपातकाल घोषित करना सामूहिक विफलता ही नहीं बल्कि बड़े शर्म की बात है। प्रदूषण जिस खतरनाक स्थिति में आज पहुंच चुका है, उसके हम बराबर के जिम्मेदार हैं। राजधानी का दमघोंटू वायु प्रदूषण लोगों की जान पर बन आया है। तमाम कोशिशों के बाद भी स्थित काबू से बाहर है। नजरें आसमान की तरफ करो, तो सिर्फ काले धुंध के गोले ही दिखाई पड़ते हैं। क्या बुजुर्ग, क्या बच्चे सभी को सांस लेना दूभर हो गया है? हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि सरकार को हेल्थ इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी है। इसके अलावा सभी स्कूलों को अगले कुछ दिनों के लिए बंद भी करना पड़ा। दरअसल, मौजूदा आपात स्थित का कुप्रभाव दिल्ली पर ही नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ रहा है। राजधानी दिल्ली को उच्च शिक्षा का हब भी माना जाता है, कई प्रांतों के छात्र वहां रहकर पढ़ाई करते हैं लेकिन परिजन अपने बच्चों की सेहत को लेकर इस वक्त खासे िंचतित हैं इसलिए परिजन अपने बच्चों को घर बुला रहे हैं।
राजधानी में बाहर से रोजाना सब्जियां और दूध आता है, उसमें भी कमी आई है। फिलहाल गैस चेंबर बनी दिल्ली में कोई भी नहीं घुसना चाहता। पर्यटकों का आवागमन भी कम हुआ है। चहल-पहल वाले इलाके सूने पड़े हैं। सरकार कहती है घरों से बाहर न निकलें? लेकिन ऐसा संभव नहीं है। रोजी-रोटी के लिए मजबूरन निकलना ही पड़ेगा। हुकूमतें और जनसहयोगी कोशिशें भले ही प्रदूषण पर लगाम लगाने के प्रयास करें लेकिन स्थित को मानवीय हिमाकतों ने इस कदर दुर्दांत बना दिया है, जिसे अब कुछ समय की सक्रियता दिखाकर काबू नहीं किया जा सकता। विगत कुछ वर्षों से बड़े महानगरों में दिवाली के समय प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। उसे रोकने के लिए तमाम कागजी कोशिशें होती हैं, पर नतीजा कुछ खास नहीं निकलता। आगे भी स्थिति संभलने के आसार नहीं दिखाई पड़ते।
सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटने जैसी स्थिति सुप्रीम कोर्ट में आज दिखाई देगी। प्रदूषण से बिगड़े हालात पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ पैâसले लिए जाएंगे। प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद कचरा पंâूकने, कर-कारखानों के जहरीले पदार्थों को खुले में फेंकने व नवनिर्माण स्थलों पर धूल की रोकथाम जैसे निर्देश सरकार को दिए जाएंगे। सवाल उठता है, यह सक्रियता तभी क्यों दिखाई जाती है जब स्थित काबू से बाहर हो जाती है? जब पता है अक्टूबर-नंबवर में प्रदूषण स्तर बढ़ जाता है तो उसी वक्त ऐसी बंदिशें लागू कर देनी चाहिए। जब तक कोर्ट का आदेश लागू होगा, तब तक धीरे-धीरे प्रदूषण का स्तर खुद कम हो जाएगा। इस लिहाज से कोर्ट और सरकारों की सक्रियता दिखावा मात्र ही लगती हैं।
दिल्ली के निजी और सरकारी अस्पताल इस वक्त मरीजों से खचाखच भरे हैं। ज्यादातर लोगों को सांस लेने में दिक्कतें हो रही हैं। प्रदूषण बढ़ने पर दिल्ली सरकार के पास रटा-रटाया एक ही तर्क होता है। पराली जलाने का उदाहरण। खैर, उनके इस तर्क में काफी हद तक सच्चाई भी है। दरअसल, प्रदूषण में भारी बढ़ोतरी की बड़ी वजह आस-पास के राज्यों में पराली जलाना भी होता है। बीते दो दिनों के भीतर ही पराली जलाने के करीब पौने चार हजार मामले सामने आए हैं, जो इस बार सबसे ज्यादा बताए गए हैं। पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध है, बावजूद इसके दिल्ली से सटे हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान अपने खेतों में फसलों के अवशेष चोरी-छिपे नष्ट करते हैं।
गौरतलब है दिल्ली सरकार पॉल्यूशन से बचने के लिए कुछ वैकल्पिक उपाय भी खोजने में लगी है, लोगों को प्रâी में मास्क बांट रही है। इसके अलावा आज से ही दिल्ली में ऑड-ईवन भी शुरू किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि पड़ोसी राज्यों से फसल जलाने से जो धुआं राजधानी में पहुंच रहा है, उससे ऑड-ईवन नियंत्रण करेगा। केंद्र सरकार और प्रदूषण बोर्ड भी लगातार आपात बैठकें कर रहे हैं लेकिन अभी तक सफलता किसी भी प्रयासों से नहीं मिली। सरकारी सिस्टम द्वारा वायु प्रदूषण को रोकने में सिर्फ हल्ला मचाया जाता है। ईमानदारी से किया काम धरातल पर नहीं बल्कि कागजों में ही दिखाई पड़ता है। प्रदूषण की विकराल स्थिति आधे-अधूरे प्रयासों का ही नतीजा है। समझ से परे है कि वायु प्रदूषण को लेकर दिल्ली में आपातकाल घोषित करने से क्या हासिल होगा? यह बात कतई पल्ले नहीं पड़ती कि आपात स्थिति की घोषणा वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक वैâसे हो सकती है? कभी ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारों के एजेंडों में पर्यावरण का मुद्दा है ही नहीं? इससे हास्यपद बात दूसरी भला क्या हो सकती है कि जब अरिंवद केजरीवाल पच्चीस फीसदी प्रदूषण कम करने का नुस्खा दूसरे देशों को बताते हैं? तभी उनके शहर में वायु प्रदूषण को लेकर आपातकाल लगाना पड़ता है।
संकीर्ण राजनीतिक वजहें और पॉल्युशन के प्रति पड़ोसी राज्यों की उदासीनता ही वायु प्रदूषण के बढ़ने का मुख्य कारण हैं। इस वक्त चुनौती केंद्र सरकार के समक्ष है, उन्हें आगे आकर तत्काल प्रभाव से आवश्यक कदम उठाने चाहिए। दुख इस बात का भी है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी और उच्च न्यायालय भी प्रदूषण की रोकथाम के लिए सरकारों पर दबाव नहीं डाल सके? कुछ भी हो मौजूदा हालात हमारी सामूहिक विफलता का शर्मनाक सजीव उदाहरण है। हम सबको इस मसले पर गहन मंथन की आवश्यकता है। हमें यह मानकर चलना होगा कि यह विफलता हमारी सेहत के साथ खिलवाड़ तो है ही, साथ ही मुल्क की समूचे संसार में बदनामी करने जैसा भी। निश्चित रूप से इससे िंहदुस्थान की दुनिया में गलत छवि बन रही है। समय रहते इस समस्या पर सामूहिक प्रयासों से ब्रेक लगाना होगा, नहीं तो आनेवाले समय में समस्या और विकराल होगी। सड़कों पर रोजाना बढ़ता वाहनों का बोझ कम करना होगा, प्रकृति दोहन से तौबा करनी होगी।