" /> हॉकरों को सरंक्षण देनेवाले कानून : छह साल बाद भी लागू नहीं कर सके कई राज्य

हॉकरों को सरंक्षण देनेवाले कानून : छह साल बाद भी लागू नहीं कर सके कई राज्य

स्थानीय संस्थाओं के चुनाव से लेकर लोकसभा, विधान सभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों द्वारा हॉकरों को तरह-तरह के आश्वासन दिए जाते हैं। इतना ही नहीं कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के दौर में परेशान श्रमिकों के हितैषी बनकर नेताओं ने खूब राजनीति की लेकिन इन मजदूरों में से स्ट्रीट वेंडर यानी हॉकर के तौर पर रोजी-रोटी कमानेवालों को संरक्षण देने के लिए 6 साल पहले बने स्ट्रीट हॉकर्स एक्ट को लागू करने में अधिकांश राज्य नाकाम रहे हैं। गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने इस सिलसिले में एक अध्ययन किया तो चौंकानेवाले तथ्य सामने आए। कानून को लागू करने में अनेक राज्यों का प्रदर्शन बहुत खराब है। आंध्र प्रदेश ने सबसे अच्छा काम किया जबकि उत्तराखंड और हरियाणा सबसे पीछे हैं। सीसीएस के प्रशांत नारंग और जयना बेदी ने केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करके राज्यों के प्रदर्शन की तस्वीर पेश की है।
कानून लागू करने के मानकों के आधार पर तैयार किए गए इंडेक्स में असम (24.44), उत्तराखंड (25.23), हरियाणा (32.48) और मध्य प्रदेश (35.60) सबसे खराब प्रदर्शन करनेवाले राज्य हैं। सूचकांक में आंध्र प्रदेश सबसे ऊपर रहा है। उसने 100 में से 78.93 अंक हासिल किए। उत्तरी राज्यों की बात करें तो चंडीगढ़ (75) दूसरे, पंजाब (63.5) पांचवें, राजस्थान (61.82) सातवें, झारखंड (60.26) आठवें और उत्तर प्रदेश (59.79 फीसदी) नौवें स्थान पर रहे।
केंद्रीय कानून के छह साल बाद भी दो राज्यों तेलंगाना और उत्तराखंड ने नियमों की अधिसूचना ही जारी नहीं की है। छह राज्यों असम, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी और उत्तराखंड ने स्कीम की अधिसूचना जारी नहीं की है। संसद से पारित कानून के प्रकाश में राज्यों को स्कीम और उसके नियम बनाने हैं। हॉकरों की गणना के लिए सर्वे, सर्टिफिकेट देने के लिए पात्रता शर्तें और हॉकिंग जोन का निर्धारण किया जाना है। इसमें स्थानीय निकायों की भी बेरुखी दिखाई देती है। इसके लिए राज्य सरकारें ही उत्तरदायी हैं। सिर्फ 47 फीसदी शहरी स्थानीय निकायों ने अपने यहां हॉकर कमेटी में चुने गए हॉकर्स को प्रतिनिधित्व दिया है। पुडुचेरी, तेलंगाना, त्रिपुरा आदि राज्यों में किसी भी हॉकर कमेटी में हॉकरों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। सीसीएस की इस साल की प्रोग्रेस रिपोर्ट के अनुसार स्ट्रीट हैकर्स न सिर्फ असंगठित क्षेत्र के कामगारों में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी बड़ा योगदान करते हैं। रोजमर्रा के जीवन में किफायती कीमत पर वस्तुएं खरीदने के लिए हम इन्हीं हॉकर्स के पास जाते हैं फिर भी इनके प्रति सरकारों और स्थानीय निकायों का नजरिया आमतौर पर नकारात्मक ही रहा है। शहरों में सड़कों पर ट्रैफिक जाम, भीड़-भाड़ और गंदगी के लिए इन हॉकरों को जिम्मेदार मानकर उन्हें बड़ी आसानी से हटा दिया जाता है। कोई कानूनी संरक्षण न होने के कारण वे पुलिसिया उत्पीड़न, उगाही और रिश्वतखोरी के भी शिकार होते हैं। अनेक अदालती केसों के बाद आखिर 2014 में स्ट्रीट हॉकर एक्ट संसद से पारित हुआ। इसके बावजूद उन्हें संरक्षण और आजीविका चलाने का गरिमापूर्ण माहौल अभी तक नहीं मिल पाया है क्योंकि राज्य और स्थानीय निकायों ने इसके लिए अपने स्तर की जिम्मेदारियां नहीं निभाईं। इतना ही नहीं हॉकरों की सही गणना नहीं की गई है।