" /> होलिका दहन तो एक वैदिक यज्ञ है!

होलिका दहन तो एक वैदिक यज्ञ है!

सोमवार होलिकादाह-
हास-परिहास, व्यंग्य, विनोद, मौज-मस्ती और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक लोकप्रिय पर्व होली अथवा होलिका वास्तव में एक वैदिक यज्ञ है, जिसका मूलस्वरूप आज विस्मृत हो गया है। होली के आयोजन के समय समाज में प्रचलित हंसी-ठिठोली, गायन, वादन और कबीर इत्यादि के उद्भव और विकास को समझने के लिए हमें उस वैदिक सोम के स्वरूप को समझना पड़ेगा, जिसका मिष्ठान इस महापर्व के मूल में निहित है। वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वोपरि है। वैदिक काल में प्रचुरता से उपलब्ध सोमलता का रस निचोड़कर उससे जो यज्ञ संपन्न किए जाते थे, वे सोमयज्ञ कहे गए हैं। यह सोमलता कालांतर में लुप्त हो गई। ब्राह्मणग्रंथों में इसके अनेक विकल्प दिए गए हैं, जिनमें अर्जुन वृक्ष मुख्य है। अर्जुन वृक्ष को हृदय के लिए अत्यंत शक्ति पद माना गया है। आयुर्वेद में इसके छाल को रोगों के निवारण के संदर्भ में विशेष प्रशंसा की गई है। सोमरस इतना शक्तिवर्धक और उत्साहकारक होता था कि उसका पान कर वैदिक ऋषियों को अमरता जैसी आनंद की अनुभूति होती थी।
होलिकोत्सव इसी महाव्रत की परंपरा का प्रतीक है। होली में जलाई जानेवाली आग यज्ञवेदी में निहित अग्नि का प्रतीक है। वैदिक युग में इस यज्ञ विधि के समीप एक गूलर की टहनी गाड़ी जाती थी क्योंकि गूलर का फल मीठा होता है। होली में लकड़ियों को चुनने से लगभग दो सप्ताह पूर्व गाड़ी जानेवाली इरेंड वृक्ष की टहनी इसी गूलर का ही प्रतीक है। यह एक ऐसा वृक्ष है, जो सर्वत्र सुलभ माना गया है। कल्पसूत्र में महाभारत के समय बजाई जानेवाली कुछ अन्य वीणा के नाम भी मिलते हैं। होली के आयोजन में महाव्रत की इस विधि-विधान का प्रभाव निरंतर परिलक्षित होता है। दोनों के अनुष्ठान का दिन भी एक ही है। फाल्गुनी पूर्णिमा मानव जीवन में अर्थ, धर्म और मोक्ष के साथ काम भी एक पुरुषार्थ के रूप में प्रतिष्ठित है। नित्य, संगीत, समस्त कलाएं, हास-परिहास, व्यंग्य, विनोद तथा आनंद और उल्लास इसी पुरुषार्थ के नाना विद अंग हैं। होलिकोत्सव के रूप में हिंदू समाज ने मनोरंजन को जीवन में स्थान देने के लिए पुरुषार्थ के स्वस्थ और लोकोपयोगी स्वरूप प्रदान किया है। मंगलवार रंगों का त्यौहार होली-बसंत पंचमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन छोटे होते हैं, जाड़ा कम होने लगता है। पतझड़ शुरू हो जाता है। माघ की पूर्णिमा पर होली का डंडा रोप दिया जाता है। वृक्षों में कहीं-कहीं नवीन पत्तों के दर्शन होने लगते हैं। होली जहां एक ओर सामाजिक एवं धार्मिक त्यौहार है, वही यह रंगों का त्यौहार भी है। नर-नारी सभी इससे बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह एक देशव्यापी त्यौहार भी है। इसमें जाति-भेद को कोई स्थान नहीं है। इसमें जहां उत्साह-उमंग की लहरें हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ बुराइयां भी आ गई हैं। कुछ लोग इस अवसर पर अबीर-गुलाल के स्थान पर कीचड़, गोबर, मिट्टी आदि भी फेंकते हैं। ऐसा करने से मित्रता के स्थान पर शत्रुता का जन्म होता है। अश्लील एवं गंदे हंसी-मजाक एक-दूसरे को चोट पहुंचाते हैं। अत: इन सबका त्याग करना चाहिए। होली मित्रता का पर्व है। इस दिन सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलना चाहिए। एकता सद्भावना का परिचय देना चाहिए, यही इस पर्व का मूल उद्देश्य एवं संदेश है।

पंचांग

फरवरी २०२०, फाल्गुन शुक्ल पक्ष / चैत्र कृष्ण पक्ष
शक संवत – १९४१, विक्रम संवत – २०७६
सोमवार ९ मार्च – फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि रात्रि ११:२६ तक होलिकादाह (सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में) होलिकादाह, श्री चैतन्य महाप्रभु जयंती, भद्रा दिन में १२:३२ तक स्नान-दान-व्रत की पूर्णिमा तिथि
मंगलवार १० मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि रात्रि ९:०५ तक होली वसंतोत्सव, रति काम महोत्सव
बुधवार ११ मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि शाम ६:४० तक, भद्रा रात्रि ५:३० से प्रारंभ
बृहस्पतिवार १२ मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि दिन में ४:१८ तक, संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत, चंद्रोदय रात्रि ९:०४ पर, भद्रा दिन में ४:१८ तक
शुक्रवार १३ मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि दिन में २:०५ तक
शनिवार १४ मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि दिन में १२:०२ तक, रंग पंचमी, विजय गोविंद हलंकर दिवस
रविवार १५ मार्च – चैत्र मास कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि दिन में १०:१४ तक, भद्रा दिन में १०:१४ से रात्रि ९:३२ तक