" /> १०१ नॉटआउट!, लॉकडाउन को करना होगा नॉकडाउन!

१०१ नॉटआउट!, लॉकडाउन को करना होगा नॉकडाउन!

क्रिकेट के मैदान पर जब कभी भी हिंदुस्थानी टीम बल्लेबाजी को उतरती है तो निश्चित तौर पर हमारी तमन्ना यही होती है कि रोहित शर्मा जमकर चौके-छक्के लगाएं, कप्तान कोहली जोरदार शतक बनाएं। इसी तरह जब बच्चा इम्तिहान को जाता है तो उसके अभिभावक भी उम्मीद करते हैं कि वो अपना शत-प्रतिशत देकर आए… कहने का तात्पर्य यही कि हमारे जीवन में १०० का बड़ा महत्व है। सरकार हो या संतान हम सभी से शत-प्रतिशत की अपेक्षा रखते हैं। हर मौके पर हम दूसरों का मूल्यांकन १०० के मानक पर करना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। मसलन, ‘वो अपने काम में १०० फीसद दे, वो परीक्षा में १०० में से १०० अंक लाए, और तो और हमें भी अपने बुजुर्गों से १०० साल जीने का ही आशीर्वाद मिले।’ हमारे लिए अपेक्षाओं का आंकड़ा शत-प्रतिशत ही है। लेकिन कभी हमने सोचा कि हमसे भी किसी की ऐसी ही अपेक्षा हो सकती है। जैसे, किसी काम में हम भी अपना शत-प्रतिशत दें। ये करें, वो न करें। यहां जाएं, वहां न जाएं… वगैरह, वगैरह।
गत कुछ दिनों से हमारी सरकार भी हमसे यही अपेक्षा पाले है। उसे भी हमसे एक छोटी-सी उम्मीद है। कोई भारी-भरकम मेहनत-मशक्कत की उसे लालसा नहीं है, बल्कि आराम से चंद दिनों तक घर में ही रहने की उसकी गुजारिश है। जानलेवा कोरोना की जंग में हमारे जरा से सहयोग की उसे जरूरत है। किसलिए? ताकि वो हमारे लिए ही सुरक्षित माहौल बना सके, कोरोना से नित बिगड़ते हालातों पर काबू पा सके। कुछ आवश्यक पाबंदियों को छोड़ दिया जाए तो लॉकडाउन के दौरान हमें दिक्कत न हो, इसके लिए उसने हमारी हर सुविधा का खयाल रखा है। हमारी हर जरूरत की पूर्ति की है। जीवन सहज बनाने के लिए उसने अपनी पूरी-पूरी जिम्मेदारी निभाई है। ताकि हम शत-प्रतिशत सुरक्षित रह सकें। कभी प्यार से, कभी डांटकर, कभी समझाकर इस मुहिम पर अमल करवाने का उसने हरसंभव प्रयास किया है। बावजूद इसके कितना प्रतिशत सहयोग दिया हमने उसकी इस मुहिम में? कितना सहकार्य किया हमने पुलिस को? कितना योगदान दिया हमने प्रशासन को? कितना सुरक्षित रखा हमने समाज को? ये सवाल आज हमें खुद से पूछने की जरूरत है। खासकर उनसे, जिन्होंने न केवल सरकार के, बल्कि समाज के तमाम प्रयासों पर भी अपनी बेजा जिद में पानी फेर दिया, करोड़ों हिंदुस्थानियों की तपस्या को बर्बाद कर दिया है। आज उन घुमक्कड़ों से सवाल पूछने का वक्त है।

लॉकडाउन के ‘रिकॉर्ड’
लॉकडाउन के १००वें दिन देश में रिकॉर्ड तकरीब २१ हजार नए मामले दर्ज किए गए। जो लॉकडाउन के पहले दिन उंगलियों पर गिने जा सकते थे। जिनका तब तक कुल आंकड़ा सैकड़े में भी नहीं पहुंचा था। जबकि १०१ दिनों की समाप्ति पर देश में संक्रमितों की कुल संख्या बढ़कर ६,२५,५४४ हो गई। दरम्यानी २४ घंटों में ३७९ मौतें होने से मृतकों की संख्या १८,२१३ पर पहुंच गई। हालांकि इस दौरान २० हजार से अधिक मरीजों को रिकवर करने में भी हम सफल हुए हैं। जिससे कुल ३,७९,८९२ मरीज ठीक हो चुके हैं। १०१ वें दिन देश में कुल एक्टिव केस २,२७,४३९ थे, जिनमें महज ४९२ की वृद्धि हुई थी। जो कुछ राहत की तो बात है, परंतु निश्चिंत होने की तो बिल्कुल नहीं। क्योंकि उसी दौरान देश में लगातार ७ दिनों तक हर दिन कोरोना के १८,००० से अधिक नए मामले सामने आए हैं, जो चिंता का विषय है। मात्र अनलॉक-१ की मासिक अवधि में ही कोविड-१९ के करीब ४ लाख मामले बढ़े हैं। बढ़ते हुए इन मामलों पर जब तक अंकुश नहीं लगता और वे शून्य तक नहीं पहुंच जाते, तब तक चैन की सांस नहीं ली जा सकती। चैन की सांस लेने के लिए हमें कोरोना की चेन को ब्रेक करना ही होगा और उसे ब्रेक करने के लिए हमें हर हाल में घर पर ही रहना होगा। घर से ही काम करना होगा। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। जिंदगी की कीमत पर यह कुर्बानी बौनी है। और यह छोटी-सी कुर्बानी देकर ही हम इन बढ़ते हुए आंकड़ों पर अंकुश लगा पाएंगे और ज्यादा-से-ज्यादा मरीजों को रिकवर कर पाएंगे। माना यह करना उतना आसान नहीं है, जितना कहने में लगता है। तमाम आवश्यकताएं होती हैं, मजबूरियां भी होती हैं, वही इंसान को घर से बाहर जाने को विवश करती हैं। वर्ना सुकून से घर पर कौन नहीं रहना चाहता? सरकार भी जनता की मजबूरियां बखूबी जानती है इसलिए उसने पहले दिन से ही आवश्यक कार्यों के लिए सुरक्षा मानकों के साथ बाहर निकलने की छूट दे रखी है। पर उस छूट का नाजायज फायदा उठानेवालों की भी कमी नहीं। उन्हीं ने इस संक्रमण को रफ्तार देने में मदद की है।

१०० दिनों का हिसाब
राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन १०० दिनों का आंकड़ा पार कर चुका है। शतक लगा चुका है, बल्कि सफलतापूर्वक १०१ नॉटआउट पर है। आज रात तक वो सहजता से १०२ भी पार कर लेगा, फिर १०३, १०४….. और अगर हम नहीं जागे तो इसी तरह वो धड़ल्ले से आगे बढ़ता जाएगा! खैर, उस पर काबू पाने का अपनी ओर से सरकार तो हरसंभव प्रयास करेगी ही, परंतु जब तक घुमक्कड़ों की कथित बुद्धिमान फौज को सदबुद्धि नहीं आएगी, समाज और सरकार के हर प्रयास पर यूं ही पानी फिरता रहेगा, यह तय है। हमने हमेशा सरकार के १०० दिनों के वर्विंâग कामकाज का हिसाब जांचा है। आज हमें खुद अपने १०० दिनों का हिसाब जांचने की जरूरत है। जरूरत है यह जांचने की कि लॉकडाउन के इन १०० दिनों में हमने अपना १०० प्रतिशत दिया या नहीं? समाज की अपेक्षा पर हम खरे उतरे या नहीं? आज इसके ईमानदार मूल्यांकन की जरूरत है। आज जो व्यक्ति खुद को, अपने पूरे परिवार को और अपने समाज को सही-सलामत कर लेगा, वही सबसे बड़ा समझदार कहलाएगा। क्योंकि नौकरी-कारोबार का घाटा तो पट सकता है पर अगर परिवार का कोई नुकसान हो गया तो वो घाटा जिंदगी भर नहीं पटेगा। लिहाजा, हर दृष्टि से इस माहौल में घर पर ही रहना फायदे का सौदा है। सरकार और साइंटिस्ट दोनों ही पहले दिन से यही समझा रहे हैं और जिन्होंने यह बात नहीं समझी वे खतरे का कारण ही बने हैं। कोरोना संक्रमण महज एक मरीज के मूवमेंटस से खेल बिगाड़ सकता है। दक्षिण कोरिया का ही उदाहरण ले लिजिए। जो बताता है कि कोरोना पर विजय पाना मुश्किल नहीं है पर इसमें कुछ नासमझों की वजह से ही मुश्किल खड़ी होती है। उनकी एक नादानी से सरकार और समाज के सारे किए धरे पर पानी फिर सकता है। कोविड-१९ के शुरुआती दौर में रोकथाम के मामले में दुनिया में सबसे कामयाब दक्षिण कोरिया ही था। वहां संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने के लिए कांटैक्ट ट्रेसर टीम बनाई गई थी। जो उनका पता लगाकर उन्हें सेल्फ आइसोलेशन में भेज देती थी। नतीजे में इसके बेहद अच्छे परिणाम मिले और जनवरी-फरवरी में देश लगभग संक्रमण मुक्त हो गया।

सुपर स्प्रेडर बिगाड़ सकते हैं खेल
महज कुछ ही दिनों बाद अचानक फरवरी के अंत तक दक्षिण कोरिया में हजारों नए मामले सामने आ गए। खासकर, डायेगो शहर में। दरअसल, वहां मरीज नंबर-३१ के नाम से कुख्यात एक मरीज ने सुपर स्प्रेडर का काम किया था। कोविड टेस्ट से १० दिन पहले तक वो लक्षणों के बाद भी शहर में धड़ल्ले से घूमती रही, हजारों के संपर्क में आई। इस दरम्यान एक कार एक्सीडेंट की वजह से अस्पताल में भर्ती हुई और वहां भी कम-से-कम १२८ लोगों के संपर्क में आई। इसी बीच घर से सामान लाने के बहाने वो एक बार ढाई घंटों तक घूमकर लौटी। वो कई बार अलग-अलग कारण बताकर अस्पताल से बाहर निकली, दोस्त के साथ लंच किया और न जाने कितनों के संपर्क में आई। उसने यह तक नहीं बताया कि वो एक चर्च की सदस्य है, जहां वो इस दौरान दो बार गई और दो-दो घंटे के आयोजन में एक हजार से ज्यादा लोगों के संपर्क में आई। उस एक अकेली महिला ने मात्र १० दिनों में हजारों को संक्रमित कर तमाम सरकारी प्रयासों पर पानी फेर दिया। आखिरकार, चर्च के ९००० सदस्यों की सूची बनाई गई और उन सबको फोन करके कोरोना के लक्षणों का पता किया गया। जिनमें १२०० में लक्षण पाए गए। इनमें भी कई लोगों ने टेस्ट कराने और सेल्फ क्वॉरंटीन में जाने से इनकार कर दिया। क्योंकि वहां के सैकड़ों लोग उस विवादित चर्च के साथ अपने संबंधों को जाहिर नहीं करना चाहते थे। अंत में सरकार ने एक कार्यकारी आदेश पारित किया कि चर्च के सभी सदस्यों को सेल्फ-आइसोलेशन में रहना होगा। इसके बाद संक्रमण के हर नए मामले की सघन जांच और बड़े पैमाने पर टेस्टिंग के चलते शहर में वायरस संक्रमण पर अंकुश लग पाया और फिर एक बार अप्रैल के अंत में जाकर डायेगो शहर में कोविड-१९ के नए मामलों की संख्या शून्य हो पाई। आज दक्षिण कोरिया में स्थिति नियंत्रण में है। वहां अब तक पाए गए तकरीबन १३ हजार मामलों में से करीब १२ हजार ठीक हो चुके हैं। दक्षिण कोरिया बिना लॉकडाउन के भी इन नादानियों पर काबू पा सकता है पर हिंदुस्थान में इन्हें रोकने के लिए लॉकडाउन ही बेहद जरूरी है। क्योंकि यहां कुछ लोग समस्या को तब तक गंभीरता से नहीं लेते, जब तक उनकी खुद की जान पर न बन आए। और जब वे जागते हैं तब तक काफी देर हो चुकी होती है। तब उसका खामियाजा निजी तौर पर उन्हें, उनके परिवार को और पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।

यहां मरीज-३१ की नादानी महंगी पड़ेगी
दक्षिण कोरिया की तुलना में हिंदुस्थान की आबादी २५ से २६ गुना अधिक है। इसलिए यहां चुनौतियां भी उसी अनुपात में बड़ी हैं। लिहाजा, यहां किसी मरीज-३१ की एक नादानी काफी महंगी साबित हो सकती है। ऐसा हुआ भी है। इसलिए ऐसे लोगों को अब संभलने की जरूरत है, थोड़ा समझने की जरूरत है। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन में सामाजिक योगदान के वादे की जरूरत है। अगर उन्होंने पहले ही सरकार को अपेक्षित साथ दिया होता तो शायद आज शासन-प्रशासन कोरोना पर काबू पाने में सफल हो गया होता। यदि अपना १०० प्रतिशत दिया होता तो शायद आज कोरोना का कहर कब का खत्म हो चुका होता। हमें दक्षिण कोरिया की तरह कोरोना को कंट्रोल करना सीखना होगा। हमें अपने देश का ‘मरीज नंबर-३१’ बनने से बचना होगा। आज हमारी व्यक्तिगत अरुचि से लॉकडाउन शतक लगा चुका है, १०० दिन पार कर चुका है पर यह किसी हाल में २०० दिन पार न कर सके, यह हमारा संकल्प होना चाहिए। २०० दिनों के भीतर ही हमें उसे मात देनी है। अगर जीना है और आनेवाली पीढ़ी के लिए जीने का मकसद रखना है तो हमें यह करना ही होगा। भले ही पहले १०० दिनों में हमसे यह हो न सका पर आने वाले १०० दिनों का हमारा यही संकल्प होना चाहिए। हमें हर हाल में प्रशासन के हाथ मजबूत करने होंगे। सत्ता हो या विपक्ष, गरीब हो या अमीर, ग्रामीण हो या शहरी, उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भाषी, पूर्वी हो या पश्चिमी सभी को यह संकल्प लेना ही होगा कि इस १०१ नॉटआउट लॉकडाउन को हम नॉकडाउन करके ही रहेंगे।
अंत में एक जुमला जरूरी है। आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि जिंदगी ‘बड़ी बेबस-सी हो गई है।’ बेबस यानी बस में नहीं, विवश, लाचार। उन्हें जान लेना चाहिए कि बेशक, हालात हमेशा यूं ही बेबस नहीं रहेंगे। जिंदगी इतनी बे-मजा भी न होगी। बंदीशें कल को बेरहम न होंगी, बशर्ते जमाना आज बेसब्र न हो। उस पर बाहर निकलने की बेताबी हावी न हो। आज बीमारी बेहद बेशर्म है, बेहया है पर उससे लड़ने वाले भी हम बेमिसाल कम नहीं। इसलिए बेफिक्र रहें, बेखौफ जिएं। बस थोड़ी-सी बंदिशें जरूरी हैं।