20 किमी में समा गई, हमारी मोनो कहां गई?, मलबार हिल और लोखंडवाला के लोगों का सवाल

मुंबईकरों की ‘डार्लिंग’ मोनो रेल को चार चरणों मे शुरू किया जाना था लेकिन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इसको लेकर घोषणाएं तो बड़ी-बड़ी की गर्इं परंतु इसे लेकर तत्कालीन सरकार की नीतियां कभी भी साफ नहीं रहीं। मेट्रो के जमाने में मोनो को बढ़ावा देने की हवा-हवाई बातें कांग्रेस सरकार करती रही, अब जब पूरे मुंबई में मेट्रो का जाल बिछ रहा है, ऐसे में मोनो डार्लिंग महज २० किमी के दायरे में ही समा कर रह गई है। दूसरी ओर कांग्रेस सरकार ने मोनो रेल को जिस-जिस रूट से चार चरणों में चलाने के जो सपने मुंबईकरों को दिखाए थे, वे अब पूछ रहे हैं कि हमारी मोनो कहां गई?
२००७ में एमएमआरडीए ने चार मार्गों पर मोनो रेल प्रस्तावित किया था। इसमें पहले चरण के तहत मलबार हिल से बीकेसी (२५किमी), दूसरा चरण चेंबूर-गोवंडी-चेंबूर (१० किमी), तीसरा चरण लोखंडवाला संकुल-कांजूरमार्ग (१० किमी) सहित चौथे चरण के तहत ठाणे-कल्याण-भिवंडी (२५किमी) मोनो रेल के मार्ग का समावेश था। मोनो रेल का पहला चरण इस घोषणा के अगले २ साल में शुरू किया जाना था लेकिन पहला चरण चेंबूर से वडाला लगभग ५ साल देरी से और दूसरा चरण हाल ही में १० साल बाद जीटीबी नगर से संत गाडगे महाराज चौक तक शुरू हुआ है। फिलहाल चेंबूर से संत गाडगे महाराज चौक तक २० किमी के दायरे में मोनो रेल का परिचालन शुरू है।

 चार चरणों में शुरू होनी थी मोनो रेल
 इसमें ‘मलबार हिल से बीकेसी’ और ‘ठाणे-भिवंडी’ का रूट शामिल
 १० वर्षों में सिर्फ वडाला से संत गाडगे महाराज चौक चल पाई मोनो
 चेंबूर-वडाला का पहला रूट रहा घाटे का सौदा
 तकनीकी खराबी के चलते बार-बार मोनो हुई बंद
 १० साल में सिर्फ २० किमी के रूट का परिचालन ही हो पाया
 बाकी के सारे रूट डाल दिए ठंडे बस्ते में
 मोनो रेल के विस्तार की कोई योजना नहीं

खंभों के ऊपर मस्ती में दौड़नेवाली मोनो रेल कभी पूरी मुंबई के साथ ही ठाणे को भी कवर करनेवाली थी। पर मोनो की यह मस्ती अब सीमित रह जाएगी। तकनीकी अड़चन व लालफीताशाही के कारण अब आगे इसका निर्माण नहीं होगा। इससे जिन इलाकों में पहले इसका रूट प्रस्तावित किया गया था, वहां के निवासियों में निराशा है। फिलहाल चेंबूर से संत गाडगे महाराज चौक तक के २० किमी रास्ते पर मोनो चल रही है। मोनो का पहला चरण बृहन्मुंबई में और दूसरा चरण ठाणे-कल्याण-भिवंडी मार्ग पर शुरू करने की योजना एमएमआरडीए की थी। शुरू में इस योजना की अनुमानित लागत १,५०० करोड़ रुपए थी।
बता दें कि मोनो का शुरुआती चरण ही देरी, तकनीकी खराबी, परिचालन घाटे के अलावा आग लगने की घटनाओं के बाद से हमेशा से ही विवादों में रहा है और जब हाल ही में मोनो डार्लिंग का दूसरा चरण शुरू हुआ तो उसका भी कुछ खास असर नहीं दिख रहा है। लोखंडवाला निवासी समीर शेख का कहना है कि कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी परेशानी यहीं थी कि इनके कार्यकाल में विभिन्न योजनाओं की घोषणाएं तो हो जाती थीं लेकिन उनका क्रियान्वयन लटका रहा। वर्तमान सरकार जिस तरह से मेट्रो का काम युद्धस्तर पर कर रही है, उसी तरह मोनो के सभी चरणों का काम भी कांग्रेस की तत्कालीन सरकार में बैठे मुख्यमंत्री पूरा कर सकते थे। मलबार हिल निवासी आरती वाघेला का कहना है कि कांग्रेस चुनाव से पहले घोषणाएं तो कर देती थी लेकिन उसे अमल में लाने की उनके पास इच्छा शक्ति की कमी रह गई इसलिए मोनो रेल सात रास्ता तक ही सीमित रह गई है।
एमएमआरडीए कमिश्नर आर.ए. राजीव से जब अन्य मोनो रेल परियोजनाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि आगे मोनो रेल का विस्तार करने की कोई योजना नहीं है। फिलहाल मोनो रेल का यही चरण चलेगा यानी यह साफ है कि देश की पहली मोनो रेल चेंबूर से सात रास्ता २० किमी के दायरे में ही सीमित रह जाएगी।