अंत:व्यापार ही अध्यात्म है

निद्रा रहस्यपूर्ण है। निद्रा और जागरण के संसार भी भिन्न है। हम जागते हुए इसी दुनिया में होते हैं, इसी विश्व का लोकव्यवहार करते हैं। हम जागे हुए भोजन करते हैं और निद्रा में स्वप्न की दशा में भी भोजन करते हैं लेकिन दोनों के भोजन भिन्न हैं। हम जागते हुए लड़ाई-झगड़ा करते हैं और स्वप्न में भी। दोनों के झगड़े भी भिन्न हैं। स्वप्न प्राचीन काल से ही हिंदुस्थानी जिज्ञासा के महत्वपूर्ण प्रश्न रहे हैं। निद्रा और स्वप्न पर वैदिक साहित्य में तमाम सामग्री हैं। प्रश्नोपनिषद् (४.१) में ऋषि पिप्पलाद से गाग्र्य ने निद्रा और स्वप्न से जुड़े प्रश्न पूछे ‘निद्रा में मनुष्य शरीर में रहनेवाले कौन देवता सोते हैं। कौन जागते रहते हैं? कौन देवता स्वप्न की घटनाओं को देखता है? निद्रा में सुख का अनुभव किसे होता है? ये सब देवता किसके आश्रित हैं?’ प्रश्नों में देवता शब्द मनुष्य के अंदरूनी अंगों के लिए आया है। यहां देखने, सुनने, छूने, स्वाद लेने आदि की इंद्रियां देवता कही गई हैं। गाढ़ी निद्रा के बाद सुख प्राप्त करनेवाले देव अंग की जिज्ञासा भी मजेदार है। स्वप्न और निद्रा प्रत्यक्ष भौतिकवाद के ही प्रश्न हैं। निद्रा बेशक जीवन की जैविक कार्रवाई है लेकिन इसके आने, न आने और प्रगाढ़ रूप में आने के मुख्य सूत्र आधुनिक विज्ञान की भी कार्यकारण शृंखला से बाहर हैं। यहां प्रश्नकर्ता की जिज्ञासा मनोरम है और शरीर विज्ञान की कार्य प्रणाली से ही जुड़ी हुई है।
प्रश्नगर्भ की सुंदरता में ही उत्तर शिशु का जन्म संभव है। पिप्पलाद ने उत्तर में कहा, ‘सूर्य अस्त के बाद सारी किरणें लौटकर उसी तेजपुंज में समा जाती हैं। सूर्योदय होने पर वे फिर से सब ओर फैल जाती हैं। इसी प्रकार निद्रा के समय सारी इंद्रियां या देवता श्रेष्ठ देव मन में विलीन हो जाते हैं। इस कारण यह जीवात्मा न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है न बोलता है, न शारीरिक सुख लेता है और वह चलता भी नहीं है। लोग कहते हैं कि वह सो रहा है। (वही ४.२) यहां सारी इंद्रियां मन में विलीन बताई गई हैं। तब क्या मन शेष बचता है? पतंजलि ने योगसूत्र (१.१०) में निद्रा को चित्त की वृत्ति कहा है।’ पतंजलि और पिप्पलाद के बोध का तल एक है। दोनों के अनुसार मन का विलय नहीं होता। यहां थोड़ी जटिलता है। मन प्रश्न करता है कि मन का कार्यव्यापार चालू रहते हुए गाढ़ी निद्रा का सुख कैसे मिल सकता है? आगे (प्रश्नोपनिषद् ४.३) निद्रा को यज्ञ प्रतीक बनाकर समझाते हैं ‘मनुष्य शरीर नगर है। यहां पंच प्राण अग्नियां जागती रहती हैं। शरीर में प्राण की अपानवृत्ति ग्रार्हपत्य अग्नि है। व्यान दक्षिणग्नि और मुख्य प्राण आहवनीय।’ यज्ञ में आहवनीय अग्नि गाहपत्य से उठकर लाई जाती है।’ सारा प्रपंच प्राण का है। प्राण अपने पांचों रूपों में सोते समय भी जागता रहता है और शरीर का अंत:व्यापार या यज्ञ चला करता है। शरीर का अंत:व्यापार ही अध्यात्म है लेकिन हम सब इस आध्यात्मिक गतिविधि पर ध्यान नहीं देते।
ब्रह्माण्ड रहस्यपूर्ण है। हिंदुस्थानी चिंतन में पिंड और ब्रह्मांड एक जैसे बताए गए हैं – यथा पिंडे तथा ब्रह्ममांडे। ऋग्वेद में सृष्टि कार्य को यज्ञ बताया गया है। मनुष्य प्रकृति का भाग है। शरीर के भीतर भी यज्ञ जैसा कार्य व्यापार चलता दिखाई पड़ रहा है। पिप्पलाद बताते हैं, ‘श्वास का निकलना और भीतर जाना यज्ञ आहुतियां हैं। श्वास ऊर्जा या प्राण का पूरे शरीर में समभाव से पहुंचाना ‘समान’ कहा जाता है। यज्ञ प्रतीक में यही ‘होता’ या हवन करनेवाला ऋत्विक है। मन यजमान है। इच्छित फल ही उदान है। यह उदान प्राण ही इस मन या यजमान को निद्रा के समय हृदय क्षेत्र की आध्यात्मिक गहराइयों या ब्रह्मलोक में ले जाता है।’ (वही ४.४) इस मंत्र में सोते समय मन की स्थिति का सुस्पष्ट वर्णन किया गया है। निद्रा के समय अन्य इंद्रियां मन में विलीन होती हैं। प्राण उदान मन को हृदय प्रदेश में ले जाता है। इसका अर्थ साफ है कि तब मन भी हृदय के अंत: प्रदेश में होने के कारण अपनी मूल चंचल प्रवृत्ति से मुक्त रहता है। पतंजलि के योग सूत्रों में निद्रा एक चित्तवृत्ति है। यह वृत्ति निद्रा के समय भी है। पिप्पलाद की अनुभूति में निद्रा के समय मन हृदय प्रदेश में होता है। यहां पतंजलि का अतिक्रमण दिखाई पड़ता है। लेकिन ऐसा है नहीं। पतंजलि योग के माध्यम से जिस सुख की बात करते हैं, उसमें चित्तवृत्ति निरोध का लक्ष्य है। चित्तवृत्ति निरोध में भी निद्रा जैसा सुख मिलता है।
पिप्पलाद ने गाढ़ी निद्रा के सुख की सही विवेचना की है। अब जिज्ञासा स्वप्न की। पिप्पलाद ने बताया है ‘स्वप्न में जीवात्मा अपनी महिमा का अनुभव करता है। वह देखे हुए या न देखे हुए को देखता है। वह सुने हुए या न सुने हुए को बार-बार सुनता है। वह देश और दिशाओं के अनुभवों को बार-बार अनुभव करता है। वह विद्यमान और अविद्यमान को भी देखता है। स्वयं ही सब कुछ बनकर भी देखता है। लेकिन जब यह मन उदानवायु के प्रभाव में हो जाता है तब उदानवायु मन को हृदय प्रदेश में ले जाता है तब जीवात्मा स्वप्न नहीं देखता। उस समय निद्रा में जीवात्मा को सुख का अनुभव होता है।’ (वही ४.५ व ६) स्वप्न के उद्भव में मन का हिस्सा है। जैसे यह मन हृदय प्रदेश से जुड़ा वैसे ही स्वप्न तिरोहित। स्वप्न सोते समय ही नहीं देखे जाते। जागते हुए स्वप्न देखनेवाले भी होते हैं। उस समय भी मन ऐसे स्वप्न रचता है। जागृत दशा में बुद्धि की सक्रियता के बावजूद स्वप्न देखने का काम चलता है। मन संकल्प शिव हों तो जागते समय भी स्वप्न नहीं आते। मनसंकल्प शिव तत्व परिपूर्ण हो तो सोते समय भी स्वप्न नहीं आते। लेकिन पिप्पलाद ने प्राणों का यथार्थवादी मनोविज्ञान ही समझाया है।
देवता अनुभूति हैं। हिंदुस्थानी अनुभूति में सूर्य, चंद्र और पृथ्वी आदि देवता हैं। ये सब साकार हैं। मन, इंद्रिय, वायु, तेज आदि देवताओं का आकार या आयतन नहीं है। प्रश्नोपनिषद् में इंद्रिय, मन, प्राण, तेज आदि देवता कहे गए हैं। गाग्र्य ने इन्हीं देवों पर प्रश्न पूछे थे। एक प्रश्न था कि ये सब किसमें प्रतिष्ठित हैं? पिप्पलाद ने बताया कि पक्षी दिनभर घूमने के बाद वृक्ष पर बसेरा करते हैं, आराम से रहते हैं। वैसे ही पृथ्वी, आदि देवता आत्मा में रहते हैं, पृथ्वी के साथ उसकी तंमात्रा गंध, जल और जल के साथ तंमात्रा रस, वायु के साथ वायु की तंमात्रा स्पर्श और आकाश के साथ आकाश की तंमात्रा शब्द भी आत्म तत्व में रहते हैं।’ (वही ४.७ व ८) यहां तंमात्रा पदार्थ का अतिसूक्ष्म गुण है जैसे पृथ्वी की तंमात्रा गंध, जल की तन्मात्रा रस और वायु की तन्मात्रा स्पर्श। आंख और देखने की शक्ति, सुनने और सुनी गई ध्वनि, रस और रसना के विषय, बुद्धि और बुद्धि के साथ ज्ञेय, मन और मनन शक्ति, प्राण और प्राण द्वारा धारण किए जानेवाले विषय भी आत्मा में रहते हैं।’ (वही ८) आगे सुंदर मंत्र में कहते हैं ‘एष हि द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता, बोधा, कत्र्ता विज्ञानात्मा पुरुष, परे अक्षर आत्मनि तिष्ठति – देखने, सुनने सूंघने, रस लेने, मनन करने, बोध पाने, काम करनेवाले विज्ञान पुरुष आत्मा में रहते हैं।’ (वही ९)
आत्मा और परमात्मा एक जैसे शब्द हैं। परमात्मा में ‘परम’ सर्वोच्च विशेषण है। यहां व्यक्तित्व की सारी शक्तियां या देवता आत्मा में रहते बताए गए हैं। पहले अलग-अलग शक्तियों का विवेचन फिर सबकी सामूहिकता का तत्व दर्शन। वस्तुत: वे अलग-अलग हैं नहीं। विवेचन में खंडश: विचार की सुंदर परंपरा है। मनुष्य के वाह्य शरीर में दो हाथ, दो पैर, कटि, उदर आदि अनेक अंगों को अलग से जांचना विश्लेषण की एक पद्धति मात्र है। वस्तुत: ये एक ही शरीर में एकात्म और अविभाज्य हैं। आगे कहते हैं ‘जिसमें समस्त प्राण, ५ महाभूत पृथ्वी जल, अग्नि, वायु और आकाश आदि देवता रहते हैं, उस ‘अक्षर’ (कभी नष्ट न होनेवाले) को जाननेवाले सर्वज्ञ हो जाते हैं और ‘सर्वरूप’ में प्रवेश पाते हैं।’ (वही ४.११) गीता प्रेस के अनुवाद व व्याख्या के अनुसार ‘वे सर्वज्ञ सर्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाते हैं। लेकिन मूल मंत्र में परमेश्वर या परमात्मा नहीं हैं। मूल मंत्र है- स सर्वज्ञ: सर्वमेवा विवेशेति। यहां सर्वमेवा वस्तुत: सर्वम् ऐवा है। इसका अर्थ हुआ यह सब। प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष संपूर्णता। व्यक्ति या शरीर संपूर्णता का भाग है लेकिन इसके भीतर संपूर्णता है। बोध न हो तो इकाई हैं हम सब। बोध हो तो इकाई का अर्थ द्वार संपूर्णता में खुलता है। छांदोग्य उपनिषद् का ऋषि गा चुका है- यो वै भूमा तत् सुखम्। जहां संपूर्णता वहां सुख। परमसुख।