पंचाग – मार्च २०१८ चैत्र मास शक- १९३९/१९४० विक्रम संवत-२०७४/२०७५

सोमवार १२ मार्च- चैत्र मास कृष्ण पक्ष,
दशमी तिथि दिन में १०.५८ तक,
भद्रा दिन में १० बज कर ५८ मिनट तक
मंगलवार १३ मार्च- चैत्र मास कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि दिन में १.०३ तक, पापमोचनी एकादशी, बुढ़वा मंगल
बुधवार १४ मार्च- द्वादशी तिथि दिन में २.५२ तक, प्रदोष व्रत
गुरुवार १५ मार्च- चैत्र मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि, दिन में ४.२० तक, भद्रा दिन में ४.२४ से रात्रि ४.५९ मिनट तक
शुक्रवार १६ मार्च- चैत्र मास कृष्ण पक्ष, चतुर्दशी तिथि सायंकाल ५.३० तक
शनिवार १७ मार्च- चैत्र मास कृष्ण पक्ष, अमावस्या तिथि रात्रि ६.३० तक
रविवार १८ मार्च- चैत्र मास शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा तिथि शाम ६.०८ तक, नव संवत्सर एवं वासंतिक नवरात्र प्रारंभ

मंगलवार- पापमोचनी एकादशी व्रत
पापमोचनी एकादशी व्रत का अपना विशेष महत्व है। शास्त्रसम्मत है कि पापमोचनी एकादशी का व्रत किया जाए तो सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है। पुराणों का स्पष्ट मत है कि शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चंद्रमा की एकादश कलाओं का प्रभाव जीव पर पड़ता है तथा कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि को सूर्य मंडल द्वारा ग्यारह कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। चंद्रमा का प्रभाव शरीर, मन सभी पर रहने से इस स्थिति में शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता स्वाभाविक रूप से बढ़ सकती है। इसी कारण उपवास द्वारा शरीर को संभालना एवं पूजन द्वारा मन को संभालना एकादशी व्रत विधान का मुख्य रहस्य है। ब्रह्मचारी, सात्विक किसी को भी एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए।

रविवार- नव संवत्सर एवं वासंतिक नवरात्रि प्रारंभ
नव-संवत्सर २०७५ प्रारंभ हो रहा है। नव संवत्सर का नाम ‘विरोधकृत’ है। किसी भी प्रकार की पूजा में यही नाम भी लगाया जाएगा। इसी नाम से ही संकल्प इत्यादि लिया जाएगा। नव संवत्सर के राजा सूर्य हैं जबकि मंत्री शनि होंगे। नव संवत्सर के प्रारंभ में समस्त पुरुषार्थ सिद्धि के लिए दुर्गा पूजन का क्रम आता है। उसके पश्चात ही रामनवमी को श्री रामचंद्र जी के जन्म का प्रसंग उपस्थित होता है। चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से नव संवत्सर का आरंभ होता है यह अत्यंत पवित्र तिथि है उल्लेखनीय है कि इसी दिन पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण प्रारंभ किया था। युगों में प्रथम सत्युग का प्रारंभ भी इस तिथि को हुआ था। इसी दिन सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने शक पर विजय प्राप्त की थी एवं उसे चिरस्थाई बनाने के लिए विक्रम संवत् प्रारंभ किया था।
आज के दिन प्रात: नित्य कर्म से निवृत्त होकर तिल का उबटन लगाकर स्नान आदि से शुद्ध एवं पवित्र होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प एवं जल लेकर देश काल के उच्चारण के साथ संकल्प करना चाहिए। इसके बाद नए चौरस चौकी या बालू की वेदी पर स्वच्छ श्वेत वस्त्र बिछाकर उस पर हल्दी या केसर रंग से अष्टदल कमल बनाकर उस पर ब्रह्मा जी की स्वर्णिम मूर्ति स्थापित करें। गणेश-अंबिका पूजन के पश्चात ब्रह्मा जी का आवाहन आदि षोडशोपचार पूजन करें। पूजन के अनंतर विघ्नों के नाश और वर्ष की कल्याण कारक तथा शुभ होने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की जाती है।
इस दिन पंचांग श्रवण किया जाता है। नवीन पंचांग से उस वर्ष के राजा, मंत्री, सेनाध्यक्ष, आज का तथा वर्ष का फल श्रवण करना भी चाहिए। सामथ्र्य के अनुसार पंचांग दान करना चाहिए तथा प्याऊ की स्थापना करनी चाहिए। आज के दिन नया वस्त्र धारण करना चाहिए तथा घर को ध्वज, पताका, बंदनवार आदि से सजाया जाना चाहिए। आज के दिन नींबू के कोमल पत्तों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च नमक, हींग, जीरा और अजवाइन डालकर खाना चाहिए इससे आरोग्य की प्राप्ति होती है। इस दिन नवरात्र के लिए घट स्थापना और तिलक व्रत भी किया जाता है।
चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक के नव दिन नवरात्र कहलाते हैं। इस प्रकार एक संवत्सर में चार नवरात्र होते हैं। इनमें चैत्र का नवरात्र वासंतिक नवरात्र और आश्विन का नवरात्र शारदीय नवरात्र कहलाता है। इसमें अदिशक्ति भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है। सुमुखि प्रतिपदा शुभ होती है। अमावस्या युक्त प्रतिपदा में पूजन नहीं करना चाहिए। स्वयं स्नान आदि से पवित्र हो गोमय से पूजा स्थान का लेपन कर उसे पवित्र कर लेना चाहिए। उसके बाद घट स्थापना करने की विधि है। घट स्थापना प्रात: काल करनी चाहिए परंतु चित्रा या वैधृति योग हो तो वैधृति योग में घटस्थापना न कर मध्यान्ह में अभिजीत आदि शुभ मुहूर्त में घट स्थापना करनी चाहिए। यह नवरात्र व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं। यदि स्वयं न कर सके तो पति-पत्नी, पुत्र या ब्राह्मण को प्रतिनिधि बनाकर व्रत पूर्ण कराया जा सकता है। व्रत में उपवास, अयाचित भोजन, जो बन सके यथा सामथ्र्य कर सकते हैं। यदि नवरात्रों में घट स्थापना के बाद सूतक अथवा अशौच हो जाए तो कोई दोष नहीं लगता परंतु पहले हो जाए तो पूजन आदि स्वयं न करें। स्पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन, द्वादशांश पाठ करना चाहिए। कुमारी पूजन नवरात्र व्रत का अनिवार्य अंग है। कुमारी कन्याएं जगत जननी जगदंबा की प्रत्यक्ष विग्रह हैं। सामथ्र्य हो तो ९ दिन तक ९, ७, ५, ३ या एक कन्या को भोजन कराना चाहिए।