" /> 251 रूपए की पर्ची ने खोली विकास की पहचान!

251 रूपए की पर्ची ने खोली विकास की पहचान!

-गार्ड से बोला- मैं कानपुर वाला विकास दुबे हूं
-एनकाउंटर से बचने के लिए रचा गिरफ्तारी का ड्रामा 

कुख्यात अपराधी विकास दुबे से जुड़ी हर घटना फिल्मी कहानी जैसे ही है। उसने कानपुर में घटना को अंजाम भी फिल्मी अंदाज़ में दिया और छुपने-छुपाने के तरीके भी कमोबेश वैसे ही रहे। डरा इसलिए नहीं क्योंकि उसके पीछे शुरू से उसके मददगार खाकी-खादी के विभीषण रहे। बुधवार शाम को दिल्ली से सटे फिल्म सिटी में उसके एक न्यूज़ चैनल के जरिए सरेंडर करने की पटकथा लिखी गई। इसी बीच पुलिस को भनक लगी, उन्होंने पूरी फिल्म सिटी को घेर कर छावनी में तब्दील कर दिया। ताकि जैसे ही आए, उसे दबोच लिया जाए। पुलिस डाल-डाल, तो दुबे पात-पात। उसे भी भनक हो गई। डर इस बात का था कहीं पुलिस वाले उसे भी उसके साथियों एनकाउंटर में न मार दें। तभी उसने न्यूज़ चैनल में सरेंडर करने का इरादा बदला और निकल गया मध्यप्रदेश के उज्जैन।

पर्ची कटवाते वक्त बताया नाम

दिल्ली-एनसीआर से रातों रात उज्जैन पहुंचा दुबे सबसे पहले महाकाल के मंदिर में गया। वहां पूजा के लिए उसने 251₹ की पर्ची कटवाई। गार्ड ने नाम पूछा, बोला मैं कानपुर वाला विकास दुबे हूं। गार्ड बोला, मुंह से मास्क हटाओ, जैसे ही दुबे ने अपने मुंह से मास्क हटाया। पर्ची का काउंटर छोड़कर गार्ड ने दुबे को धर दबोचा और पास के थाने महाकाल को सूचित कर दिया। जब तक पुलिस नहीं आई गार्ड तब तक उसका हाथ पड़के रहा। पुलिस आई और उसे अपने साथ ले गई। लेकिन कहानी उसके पीछे उस गुप्त स्क्रिप्ट राइटर की है जिसने यह पूरी पटकथा लिखी या उनसे लिखवाई गई। फिल्म की शूटिंग की तरह चंद मिनटों में कैमरा, मीडिया, पुलिस, तामझाम सभी वहां प्रकट हो गए। गार्ड-दुबे के बीच करीब 12 मिनट की एक्टिविटी को कैमरे में कैद किया गया। ये सब किसने किया। घटना इशारा करती है कि सब कुछ सुनियोजित ढंग से किया गया।

सरेंडर और गिरफ्तारी पर संदेह

छह दिनों से चर्चाओं में रहा कानपुर मुठभेड़ कांड का मुख्य आरोपित विकास दुबे की गिरफ्तारी वाली बात किसी का हजम नहीं हो रही। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब उसके साथियों को देखते ही गोली मारी जा रही है तो उसे क्यों छोड़ा गया। क्या खुद को एनकाउंटर से बचाने के लिए दुबे ने षडयंत्र रचा। उसे लगा ऐसी सुरक्षित जगह से सरेंडर करो, जहां पुलिस चाहकर भी फ़ायरिंग और ख़ूनख़राबा न कर सके। इसके लिए धार्मिक जगह से अच्छी दूसरी जगह उसके लिए नहीं थी। उसने प्लानिंग के साथ उज्जैन के महाकाल मंदिर में सरेंडर का नाटक रचा। पहले से की गई फूल प्रूफ प्लानिंग, मीडिया के कैमरे मौजूद थे, मंदिर में लगे सीसीटीवी कैमरों की भी आँखें खुली थीं। दुबे ने खुद अपनी गिरफ्तारी की स्क्रिप्ट लिखी और अंजाम तक पहुंचा दिया।

चेहरे पर नहीं था डर भाव

विकास दुबे ने अपनी फरारी के सभी छह दिन नए कपड़े पहने, दाढ़ी बनवाई, बाल कटवाए। बाइक, आॅटो, कार आदि वाहनों से चला। नाकेबंदी वाले इलाकों से सकुशल निकलता रहा। किसी ने नहीं पहचाना। मंदिर में जब पकड़ा गया तब भी पुलिस कर्मियों से रौब से बात कर रहा था। कैमरों के सामने तेज आवाज़ में बोलता रहा है। हां मैं ही हूं विकास दुबे कानपुर वाला।