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33 लाख मंत्रों की आहूतियाें के साथ काशी में स्थापित हुए देव विग्रह

कहते है काशी के कण कण में शिव का वास होता है,शायद यही वजह है कि यहां 33 कोटि के देवी देवता अपनी उपस्थिति दर्ज कराते है। मंदिरों के शहर काशी में एक और दिव्य मंदिर स्थापित किया गया है। धर्म सम्राट की उपाधि से विभूषित स्वामी करपात्री जी के कर्म स्थली दुर्गाकुंड स्थित धर्मसंघ शिक्षा मण्डल के प्रांगण में बने भव्य मणि मन्दिर में देव विग्रहों का वैदिक विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा किया गया। धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रम्हचारी जी महाराज ने वेद मंत्रों से अभिसिंचित पुष्प एवं अक्षत द्वारा विग्रहों के अंग न्यास में चैतन्यता प्रवेश कराया। जिसके बाद मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए सदैव के लिए खोल दिया गया।

प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर मणि मंदिर में प्रातःकाल ही वैदिक अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड प्रारम्भ हो गये थे। सबसे पहले मुख्य आचार्य पं. लक्ष्मीकान्त दीक्षित के आचार्यत्व में भूदेवों ने मन्दिर में बने मण्डप में पंचांग पूजन किया, जिसमें सभी आह्वाहन किये गये देवी – देवताओं का पूजन किया गया। सर्वप्रथम दूध, दही, घी, शर्करा, मधु, पंचामृत, फलोदक, रत्नोदक, पुष्पोदक, स्वर्णोदक तथा विविध प्रकार के औषधियों से उनका स्नान कराया गया। तत्पश्चात चन्दन, अक्षत, सुगन्धित पुष्पों से उनका श्रृंगार किया गया। उसके बाद भोग लगाकर आरती उतारी गयी। इसके उपरान्त यज्ञाचार्य समस्त यजमानों संग मणि मन्दिर में प्रवेश किये। यहाॅ शैय्याधिवास से देवताओं को श्रद्धालुओं द्वारा घण्टा, घड़ियाल की मंगल ध्वनि से जागृत किया गया। उसके बाद स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रम्हचारी जी महाराज द्वारा विधिवत शुक्ल यर्जुर्वेद के संहिता के मंत्रों द्वारा न्यास ध्यान कर विग्रहों में प्राण प्रतिष्ठा की विधि पूर्ण की गयी। इसके बाद उन्होंने समस्त विग्रहों का षोडशोपचार विधि से पूजन अर्चन कर आरती उतारी। इस अवसर पर पं. जगजीतन पाण्डेय ने भी कर्मकाण्ड की विधियां सम्पन्न कराई। इस अवसर पर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्रतिनिधि स्वरूप स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, दीन दयालु जी महाराज, जगद्गुरू वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर जी महाराज आदि सन्त उपस्थित रहे।

प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर चल रहे पांच दिवसीय अतिरूद्र महायज्ञ में यजमानों द्वारा पूर्णाहूति दी गयी। यज्ञ में शुक्ल यर्जुवेद के रूद्र सूक्त के रूद्राअष्टाध्यायी के कुल 33 लाख मंत्रों की आहूतियाॅ दी गयी। उसके उपरान्त आचार्याे द्वारा कलश से यज्ञ यजमानों का स्नान कराया गया। उसके बाद नवग्रह हवन के साथ आरती की गयी। यजमान पं. गिरीश चन्द्र तिवारी, सुदीप मिश्रा, राजेश चैहान, सत्यपाल सिंहला, जयनारायण अग्रवाल, श्याम सुन्दर अग्रवाल, ओमप्रकाश श्रीवास्तव, राम कुमार गर्ग, अरूण श्रीवास्तव आदि ने आचार्यो का समादर कर विदाई दी। आचार्य में पं. जयकृष्ण दीक्षित, अरूण दीक्षित, दयाशंकर तिवारी, शिवपूजन पाण्डेय आदि शामिल रहे। इस अवसर पर धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रम्हचारी जी महाराज द्वारा गौदान एवं स्वर्णदान की प्रक्रिया भी सम्पन्न करायी गयी।

इस अवसर पर सम्पूर्ण मन्दिर परिसर एवं आस पास के क्षेत्र में फूल – मालाओं एवं विद्युत झालरों से भव्य सजावट की गयी थी। देव विग्रहों का भी विभिन्न स्वर्णाभूषणों एवं फूलों से श्रृंगार किया गया था।
मणि मन्दिर में श्रीराम दरबार, स्फटिक के द्वादश ज्योर्तिलिंग, दो पारदेश्वर शिवलिंग, माॅ अन्नपूर्णा, अर्धनारीश्वर, गणेश, राधा-कृष्ण, मां दूर्गा, भगवान सूर्य, महात्रिपुर सुन्दरी की स्वर्ण प्रतिमा सहित 151 नर्वदेश्वर महादेव शिवलिंग, दस महाविद्या, काल भैरव, परशुराम, स्वामी करपात्री जी महाराज एवं स्वामी लक्ष्मण चैतन्य जी महाराज के विग्रह स्थापित किये गये है।