" /> ४८ साल की परंपरा टूूटी!, ५ दिन के बप्पा की ढाई दिन में विदाई

४८ साल की परंपरा टूूटी!, ५ दिन के बप्पा की ढाई दिन में विदाई

कोरोना महामारी के कारण एक गांव की ४८ साल की परंपरा टूट गई। इस गांव में कुनबी और आदिवासी समुदाय के लोगों का एक मात्र सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल है। यह मंडल हर वर्ष ५ दिन का गणेशोत्सव मनाता था पर इस वर्ष पांच की बजाय ढाई दिनों में ही बप्पा की विदाई कर दी गई।

डहाणू तालुका में कुनबी और आदिवासी समुदायों की तलहटी में सूर्य नदी के तट पर उर्से गांव ने पिछले ४८ वर्षों से ‘एक गांव एक उत्सव’ के माध्यम से लोगों के लिए एक मिसाल कायम की है। उर्से गांव के लोग ४८ वर्षों से सार्वजनिक गणेशोत्सव मना रहे हैं। गांव की जनसंख्या लगभग २,५०० है। हर साल गणेशोत्सव के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलों का आयोजन किया जाता था। यहां सभी आध्यात्मिक परिवार हैं। यह गांव, बाकी के गावों और शहरों के लिए एक आदर्श है। इस गांव में किसी भी घर में गणपति की मूर्ति स्थापित नहीं की जाती है और न ही कोई त्योहार अकेले मनाया जाता है। सभी त्योहार में पूरा गांव एक जगह आता है और सभी त्योहार मिलकर मनाते हैं।

इस वर्ष दुनिया पर मंडरा रहे कोरोना संकट के कारण, ग्रामीणों ने पहली बार इस बार बप्पा को जल्दी विदा किया है। कोरोना के सभी नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए बप्पा का सादगी तरीके से विसर्जन किया गया। खास बात है यह कि गांव के युवा एक साथ सार्वजनिक मंडल की सजावट करते हैं और सजावट भी पर्यावरण को ध्यान रख कर की जाती है। इस वर्ष केवल एक अंतरिक्ष नक्षत्र बनाकर, एक मौली मुखौटा बनाया गया, जो मास्क लगाकर चक्की पर आटा पीसता दिखाया गया था। भगवान गणेश की मूर्ति के बगल में रखा गया था, जो कोरोना वायरस से बचने का संदेश दे रहा था। उर्से गांव में तीन मंडल हैं। कोई भी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए गांव के बाहर से कोई दान स्वीकार नहीं किया जाता है। कार्यक्रम में लगने वाले सभी खर्च गांववासी वहन करते हैं। इस गांव ने बिना किसी दान के अपना भव्य हॉल बनाया है। सभी ग्रामीण अपने सभी त्योहार एक साथ इसी में मनाते हैं। इस गांव की परंपरा यह है कि गणपति और गौरी के विसर्जन के बाद, शेष सभी वस्तुओं की नीलामी की जाती है। ग्रामीण खुशी-खुशी सभी सामान अधिक कीमत पर खरीदते हैं। बाकी पैसा गांव के किसानों को ब्याज पर बांट दिया जाता है। अगले साल वे इन त्योहारों को उसी पैसे से मनाते हैं।