यादों के झरोखों से : भीड़ से अलग

१९६० के दशक में राजकुमार एक ऐसे अभिनेता का नाम था, जो अपने समकालीन सभी अभिनेताओं से बिल्कुल अलग थे। अभिनय की अलग शैली के अलावा राजकुमार का व्यक्तित्व भी पारंपरिक नायकों के विपरीत था। पुलिस विभाग की नौकरी छोड़कर फिल्म जगत में आनेवाले राजकुमार का वास्तविक नाम कुलभूषण शर्मा था। किंतु पुलिस विभाग का उन पर इतना गहरा प्रभाव था कि नौकरी छोड़ने के बावजूद उनका अंदाज और स्वभाव अहंकार भरा लगता था।
६० के दशक की ही एक घटना के कारण राजकुमार का दिलीप कुमार से ऐसा झगड़ा हुआ था कि दोनों ने आजीवन एक-दूसरे के साथ काम न करने का संकल्प कर लिया। अनेक वर्षों तक राजकुमार और दिलीप कुमार ने वास्तव में एक-दूसरे के साथ काम नहीं किया। यह वो दौर था जब दोनों ही स्टार थे और स्वाभिमान से भरे थे। दोनों अभिनय के स्तर पर स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझते और मानते थे। इसी बीच मद्रास (अब चेन्नई) की एक नामचीन निर्माण संस्था ‘जेमिनी’ ने दोनों को लेकर ‘पैगाम’ नामक फिल्म आरंभ की। मिल मजदूरों के जीवन और संघर्ष पर आधारित ‘पैगाम’ में दिलीप कुमार की भूमिका मिल के मालिक की और राजकुमार की भूमिका मिल मजदूर की थी। फिल्म की शूटिंग आरंभ होने के साथ ही दोनों के टकराव एवं अहं की खबरें आने लगी थीं। एक दिन शूटिंग पर नाटकीय दृश्य के बीच ही अभिनय करते हुए दिलीप कुमार ने राजकुमार के मुंह पर इतना जोरदार थप्पड़ मारा कि शूटिंग रुक गई और दोनों के बीच झगड़ा हो गया। ‘जेमिनी’ मद्रास की एक बड़ी निर्माण संस्था थी। संस्था के निर्माताओं ने दोनों को समझाया कि वे उनके सारे दृश्यों को अलग-अलग शूट करेंगे। जिन दृश्यों में दोनों को साथ आना था उनमें उनके डुप्लीकेट्स को लेकर सीन फिल्माया गया। इस प्रकार ‘पैगाम’ को पूरा किया गया और इसके बाद दोनों ने साौगंध खा ली कि कभी-भी एक-दूसरे के साथ काम नहीं करेंगे।
३० वर्षों तक राजकुमार और दिलीप कुमार ने एक-दूसरे के साथ कोई फिल्म नहीं की। इस बीच कई दिग्गज निर्माता-निर्देशकों ने दोनों को लेकर फिल्में बनाने की योजना तो बनाई किंतु वे दोनों को साथ लाने में सफल न हो सके। अंतत: निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने ३२ वर्षों के बाद दोनों को साथ काम करने के लिए तैयार कर लिया और ‘सौदागर’ का निर्माण आरंभ किया। फिल्म के मुहूर्त से ही लोगों ने भविष्यवाणी कर दी कि ‘सौदागर’ कभी पूरी नहीं हो सकेगी और न प्रदर्शित हो पाएगी। मुंबई से ८० किलोमीटर दूर महाबलेश्वर में जब ‘सौदागर’ की आउटडोर शूटिंग आरंभ हुई तो पत्रकारों के एक दल को भी आमंत्रित किया गया जिनमें यह स्तंभ लेखक भी फिल्म पत्रकार के रूप में शामिल था। दो दिनों के प्रवास में मैंने नोट किया कि यूनिट के सदस्य राजकुमार और दिलीप कुमार को ‘चुन्नू-मुन्नू’ कहकर बुलाते थे। दोनों में चुन्नू कौन था और मुन्नू कौन था, ये राज केवल यूनिट के सदस्य ही जानते थे। एक इंटरव्यू के दौरान जब इस पत्रकार ने सुभाष घई से उनके चुन्नू-मुन्नू के संबंध में पूछा तो सुभाष घई हंस पड़े और कहा कि दोनों के बच्चों जैसी जिद करने के कारण यूनिट ने दोनों का यह नाम ‘चुन्नू-मुन्नू’ रख दिया था क्योंकि दोनों के बीच वास्तव में छोटे बच्चों जैसी हरकतें चलती रहती थीं। एक ने अपने खास टेलर से कपड़े सिलवाए हैं तो दूसरे को भी उसी टेलर से अपने कपड़े सिलवाने हैं। एक को आउटडोर में जिस होटल में ठहराया गया है तो दूसरे को भी उसी होटल में कमरा चाहिए। इसी प्रकार की छोटी-छोटी जिदों के बीच चुन्नू-मुन्नू के साथ सुभाष घई ने ‘सौदागर’ बिना किसी व्यवधान के पूरी की और फिल्म जगत को चकित कर दिया।
६० के दशक की ही घटना है जब निर्माता बी.आर. चोपड़ा ने अपनी फिल्म ‘धूल का फूल’ के लिए राजकुमार को अनुबंधित किया था। फिल्म का निर्देशन अपने छोटे भाई यश चोपड़ा को सौंपा था। एक ओर शूटिंग की तैयारियां चल रही थीं, दूसरी ओर कलाकारों की पोशाकें तैयार की जा रही थीं। राजकुमार की पोशाक भी तैयार हो चुकी थी कि एक दिन राजकुमार ने निर्देशक यश चोपड़ा को बुलाया और कहा कि वे फिल्म की कहानी में कुछ बदलाव चाहते हैं। निर्माता बी.आर. चोपड़ा को राजकुमार की यह हरकत बिल्कुल पसंद नहीं आई और उन्होंने राजकुमार को फिल्म से निकालकर राजेंद्र कुमार को ले लिया। ‘धूल का फूल’ प्रदर्शित हुई और सुपरहिट साबित हुई तो राजकुमार को बहुत शर्मिंदा होना पड़ा। वर्षों बाद जब बी.आर. चोपड़ा ने ‘वक्त’ आरंभ की और राजकुमार को लिया तो निर्देशक इस बार भी यश चोपड़ा ही थे। किंतु इस बार राजकुमार ने चूं तक नहीं की और फिल्म की शूटिंग पर भी एक शब्द नहीं बोला। मद्रास के एक नामी निर्माता वासू मेनन ने ‘खानदान’ नाम की फिल्म आरंभ की तो राजकुमार को हीरो लेने का निर्णय किया। कहानी एक अपंग हीरो की थी। राजकुमार ने कहानी सुनने के बाद प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि वे लूलों-लंगड़ों के किरदार नहीं किया करते। तब फिल्म की यह भूमिका सुनील दत्त को दी गई। सुनील दत्त ने अपने अभिनय से उस भूमिका को पर्दे पर इतना जीवंत और प्रभावशाली बना दिया कि हर किसी ने उनके अभिनय की भूरि-भूरि प्रशंसा की।