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कभी-कभी : समपर्ण

अपनी एक फिल्म की सफलता के बाद जहां कलाकरों के पैर जमीन पर नहीं पड़ते और उनके सामने न जाने कितने ही बैनर्स से अनगिनत फिल्मों के
ऑफर्स का अंबार लग जाता है। वहीं बीते जमाने में एक ऐसी भी नायिका रही हैं जिन्होंने अपनी पहली फिल्म हिट होने के बाद दूसरे बैनर तो दूर निर्माता-निर्देशक महबूब खान के ऑफर तक को ठुकरा दिया था, जबकि महबूब खान ने उन्हें बतौर अभिनेत्री अपनी फिल्म के लिए अच्छी-खासी रकम देने की पेशकश की थी। महबूब खान के ऑफर को ठुकरानेवाली इस अभिनेत्री ने अपने अभिनय की शुरुआत और करियर का अंत वी. शांताराम की फिल्मों से किया। अपना पूरा जीवन और करियर वी. शांताराम और उनके बैनर ‘राजकमल’ को समर्पित करनेवाली इस अभिनेत्री का नाम है संध्या।
बात १९५१ की है वी. शांताराम अपनी फिल्म ‘अमर भूपाली’ के लिए हीरोइन की तलाश कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने बाकायदा इश्तिहार भी छपवाया। उसी दौरान मन में अधिक काम पाने की चाह लिए रंगमंच कलाकार विजया देशमुख ने अपनी किस्मत आजमाने के लिए अपनी बहन वत्सला देशमुख के साथ मुंबई का रुख किया। इश्तिहार देखकर वत्सला ने विजया को ऑडिशन के लिए भेज दिया। विजया का ऑडिशन हुआ। परंतु वी. शांताराम विजया से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि विजया का हाव-भाव तो ठीक था लेकिन चेहरा हीरोइन लायक नहीं था। परंतु विजया की आवाज ने उन्हें प्रभावित कर दिया। अंतत: उन्होंने हीरोइन के रोल के लिए विजया को फाइनल कर लिया और साथ ही विजया का नाम बदलकर संध्या कर दिया। फिल्म ‘अमर भूपाली’ सुपरहिट हो गई और ‘कांस फिल्म फेस्टिवल’ के लिए मनोनीत हुई। संध्या की दूसरी फिल्म थी ‘परछाइयां’, जिसमें शांताराम की दूसरी पत्नी जयश्री हीरोइन थीं। इसी फिल्म के दौरान दोनों के बीच प्यार के चर्चे उड़े और अंतत: उन्होंने १९५६ में शादी कर ली। शादी के बाद संध्या वी. शांताराम की तीसरी पत्नी बन गर्इं।
वी. शांताराम की फिल्मों में संध्या सफलता के पायदान चढ़ रहीं थीं तभी फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ के दौरान हुए हादसे में वी. शांताराम की आंखें चोटिल हो गर्इं। आंखों का ऑपरेशन करवाना पड़ा। ऐसा लग रहा था कि उनकी आंखों की रोशनी चली जाएगी। लोगों ने सलाह दी कि उनकी देखभाल के लिए एक नर्स रख ली जाए। लेकिन संध्या ने कहा कि नर्स की कोई जरूरत नहीं। मैं खुद ही उनकी देखभाल करूंगी और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। जब शांताराम के आंखों की पट्टी खुलनेवाली थी तो संध्या ने कमरे को विविध रंगों के फूलों और सुंदर रंगोली से सजा दिया था। जब शांताराम की आंखों की पट्टी खुली तो फूलों और रंगोली को देखकर उनके मुंह से बरबस ही निकल पड़ा ये तो नवरंग है और यहीं से फिल्म ‘नवरंग’ का शीर्षक भी उन्हें मिल गया। ‘नवरंग’ का होली गीत ‘अरे जा रे हट नटखट…’ आज भी दर्शकों को याद है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में वी. शांताराम वैजयंतीमाला को हीरोइन लेना चाहते थे। लेकिन छोटे बजट की फिल्म में वैजयंतीमाला द्वारा काम करने से इंकार करने के बाद उन्होंने संध्या की ओर रुख किया। संध्या प्रोफेशनल डांसर नहीं थीं। लेकिन उन्होंने कहा, ‘मैं नृत्य की ट्रेनिंग लूंगी।’ तब उन्होंने उस जमाने के मशहूर कोरियोग्राफर गोपीकृष्ण से प्रशिक्षण लिया। तकरीबन १८-१८ घंटे वे कत्थक का रियाज करतीं। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और ‘झनक झनक पायल बाजे’ सुपरहिट साबित हुई। ‘तीन बत्ती चार रास्ता’, ‘स्त्री’, ‘सेहरा’, ‘लड़की सह्याद्री की’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का परचम लहरानेवाली संध्या की अंतिम फिल्म ‘पिंजरा’ थी, जो मराठी भाषा में बनी थी। ८१ बसंत देख चुकी संध्या ने भले ही कम फिल्मों में काम किया लेकिन जितना भी काम किया वो आज के कलाकारों के लिए मील का पत्थर है। वी. शांताराम के प्रति उनका प्रेम, अपने काम के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण उन्हें कलाकारों में श्रेष्ठ नहीं, सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

– यू.एस. मिश्रा