" /> हैंड सेनीटाइजर के साइड इफेक्ट!

हैंड सेनीटाइजर के साइड इफेक्ट!

-इसका ज्यादा प्रयोग स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं

*अल्कोहल एक तरह का केमिकल होता है
*ज्यादा इस्तेमाल से त्वचा रोग का खतरा

डेंजरस कोरोना वायरस के वैश्विक प्रसार ने अचानक हैंड सैनिटाइजर को न सिर्फ प्रासंगिक बल्कि लोकप्रिय भी बना दिया है। हालत यह है कि यह आज आम आदमी की दैनिक जरूरतों में शामिल हो गया है। दुकानों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर हैंड सैनिटाइजर की छोटी बोतल रखी मिल जाएगी। कई लोग तो अपनी पॉकेट में हैंड सैनिटाइजर की छोटी शीशी रख रहे और बार-बार हाथों से सैनिटाइजर लगाए जा रहे हैं। कुछ लोग तो दिन में जब भी मौका मिले 8 से 10 बार सैनिटाइजर लगा ले रहे हैं। नई-नई कंपनियों के नए-नए ब्रांड वाले सैनिटाइजर बाजार में बिक रहे हैं। असली- नकली का फर्क भी सिमट गया है। मगर क्या आप जानते हैं कि हैंड सेनीटाइजर का ज्यादा प्रयोग खतरनाक हो सकता है। क्योंकि सैनिटाइजर में अल्कोहल होता है और यह अल्कोहल प्राकृतिक नहीं बल्कि एक केमिकल होता है। इस के ज्यादा इस्तेमाल से हाथों में त्वचा रोग हो सकता है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है अगर हाथों में धूल व मिट्टी या कोई केमिकल लगा हो तो हैंड सैनिटाइजर बेअसर रहता है और वह हाथों के विषाणु नहीं मारता।
मेडिकल क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि कोरोना वायरस के संक्रमण के पहले हैंड सेनीटाइजर अधिकांशतः अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन से पहले डॉक्टरों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। ऑपरेशन से पहले डॉक्टर साबुन से अपने हाथों को साफ करते हैं, इसके बाद हाथों को सैनिटाइज करके तब ऑपरेशन करते हैं ताकि जिस मरीज का वह ऑपरेशन करें उसे हाथों का कोई इंफेक्शन ना लगे। पर आज जब आम आदमी के बीच हैंड सेनीटाइजर पहुंच चुका है तो वहां छोटी-मोटी चीजों का कोई ध्यान रखा नहीं जा रहा है। एडलबर्ट हेल्थ केयर के सीईओ नवीन कुमार कहते हैं कि बार-बार हाथों को सैनिटाइजर से साफ करना हाथों की सेहत के लिए अच्छी बात नहीं है। इसके ज्यादा इस्तेमाल से त्वचा सूख जाती है और डर्मेटाइटिस रोग का खतरा बढ़ जाता है। आगे चलकर त्वचा में जलन, खुजली आदि होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर किसी को त्वचा की एलर्जी है तो उसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। सैनिटाइजर में केमिकल होते हैं और एलर्जी वाले हाथों में त्वचा का रंग लाल हो जा सकता है। नवीन कुमार कहते हैं कि इस समय बाजार में बहुत किस्म के सैनिटाइजर मिल रहे हैं, जिनमें उचित मानकों का पालन भी नहीं किया जा रहा। आम आदमी को इन चीजों का पता नहीं होता और उसका स्वास्थ्य खतरे में पड़ जा सकता है। सैनिटाइजर में सबसे जरूरी है अल्कोहल और पानी की उचित मात्रा। एक जनरल कॉन्सेप्ट बन गया है कि ज्यादा अल्कोहल रहेगा तो वायरस पर ज्यादा इफेक्टिव होगा। जबकि ऐसा नहीं है। नीना ए गोल्ड और उषा अव्वा की पुस्तक अल्कोहल सैनिटाइजर में इस बात का उल्लेख है कि सैनिटाइजर में पानी की मात्रा अगर कम है तो वह वायरस के प्रोटीन को नष्ट करने में कामयाब नहीं होता। 80 या 90 फीसदी अल्कोहल वाले सैनिटाइजर अच्छे नहीं होते क्योंकि इनमें पानी की मात्रा कम होती है। 60-70 फीसदी अल्कोहल वाले सैनिटाइजर सबसे अच्छे माने जाते हैं। एडलबर्ट हेल्थ केयर के सीईओ नवीन कुमार बताते हैं कि दुनिया के अलग-अलग रिसर्च इंस्टिट्यूट में हुए शोध बताते हैं कि हाथ को अगर अच्छी तरह साफ करना है तो उसके लिए फोम यानी झाग का होना आवश्यक है और इसके लिए सबसे अच्छा साबुन है।

सैनिटाइजर का केमिकल लोचा
सैनिटाइजर में ट्राइक्लोसान नाम का एक केमिकल होता है, जिसे हाथ की त्वचा सोख लेती है। इसके ज्यादा इस्तेमाल से यह केमिकल त्वचा से हुए खून में मिल जाता है। खून में मिलने के बाद यह मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाता है। इसी तरह इसमें विषैले तत्व और बेंजाल्कोनियम क्लोराइड होता है, जो बैक्टीरिया को हाथों से बाहार निकाल देता है, लेकिन यह हमारी त्वचा के लिए अच्छा नहीं होता है। इससे त्वचा में जलन और खुजली जैसी समस्याएं हो सकती हैं।