" /> सभी सरहदें अशांत!, बाहुबली राजनीति की हवा निकल गई!

सभी सरहदें अशांत!, बाहुबली राजनीति की हवा निकल गई!

 

हिंदुस्थान की सभी सरहदें अशांत हैं। हमारे ज्यादातर पड़ोसी राष्ट्र चीन की टोली में शामिल हैं। उस चीन ने भी अब हम पर आक्रमण किया है। गलत विदेश एवं रक्षा नीति का ये परिणाम है। अमेरिका के ट्रंप भी कल चुनाव हार जाएंगे। मोदी के पक्ष में अब कौन खड़ा रहेगा? चीन के हमले से बाहुबली राजनीति की हवा निकल गई।

हिंदुस्थान जैसे देश में बीच-बीच में किसी-न-किसी तरह की मुसीबत आती ही रहती है। कोरोना की लहर के जोर में रहने के दौरान ही देश में चीन विरोधी संताप उफान मारने लगा है लेकिन कुछ संताप सिर्फ बनावटी होता है। ऐसा बनावटी संताप चीन के संदर्भ में कई बार पैदा हो चुका है। मार्च, २०१६ में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा जब क्यूबा की धरती पर उतरे थे, तब दुनिया हैरान रह गई थी। ५० सालों तक क्यूबा और अमेरिका के बीच में संपर्क नहीं था। ५० वर्षों में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति क्यूबा की धरती पर अवतरित हुए थे। क्यूबा के क्रांतिकारी राष्ट्रप्रमुख फिडेल वैâस्ट्रो अमेरिका को कट्टर दुश्मन मानते थे। अमेरिका ने इन ५० वर्षों में वैâस्ट्रो को मारने के लिए ६३४ बार प्रयास किया। इस दौरान अमेरिका में कई राष्ट्रपति आए और गए लेकिन वैâस्ट्रो क्यूबा के सत्ताधीश के पद पर बने रहे। उम्र बढ़ने के कारण वैâस्ट्रो आधिकारिक पद से हट गए। राउल वैâस्ट्रो नए राष्ट्रप्रमुख बन गए। उनके दौर में ओबामा ने क्यूबा का दौरा किया। ओबामा क्यूबा के बारे में भावुक होकर बोले। सभी विवाद खत्म करने की बात कही, तब क्रांतिकारी फिडेल वैâस्ट्रो ने अपने बंद कमरे से एक पंक्ति का संदेश प्रसारित किया कि ‘क्यूबा के प्रति अमेरिका के मन में उठी स्नेह की इस लहर को देखकर क्यूबावासियों को हार्टअटैक आ जाएगा।’ वैâस्ट्रो ने सटीक व्यंग्य कसा। ओबामा तिलमिला उठे। इस प्रसंग का संदर्भ देने का कारण इतना ही है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो साल पहले मोदी के खास मेहमान के रूप में अमदाबाद आए थे। सभी विवाद खत्म हो जाएंगे, ऐसा उन्होंने कहा था। लेकिन तभी मेरे मन में यही विचार आया था, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के बारे में फिडेल वैâस्ट्रो के मन में उठा था। इन लोगों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। चार दिन पहले लद्दाख की सीमा पर जो खूनी संघर्ष हुआ, इससे चीन का वास्तविक चेहरा फिर सामने आ गया!

१९७५ के बाद पहला
हिंदुस्थान और चीन के सैनिकों के बीच लद्दाख स्थित सीमाई इलाके में झड़प हुई, उसमें हमारी ओर से २० जवान शहीद हुए, चीन को कितना नुकसान हुआ है? अधिकृत रूप से इसका खुलासा नहीं हो सका। चीन और हिंदुस्थान के बीच सीमा को लेकर विवाद है। ३ हजार ४८८ किलोमीटर लंबी विवादित सीमा को लेकर १९७५ से अब तक कई बार ऐसी झड़प होती रही है लेकिन एक ही बार में हमारे २० सैनिक शहीद हुए, ऐसी यह पहली घटना है। १९७५ में चीनी सैनिकों ने आसाम राइफल के ४ जवानों की हत्या की थी। उसके बाद विवाद और हाथापाई होती रही लेकिन दोनों पक्ष से गोली नहीं चलाई गई। अभी भी २० जवानों की हत्या गोली या बम से नहीं, बल्कि पत्थर, र्इंट व लोहे की रॉड के साथ तारों का इस्तेमाल करके की गई। गोली नहीं चलानी है। इस आदेश का पालन दोनों ओर के सैनिकों ने किया लेकिन एक-दूसरे की बलि लेने के लिए पाषाण युग के हथियारों का इस्तेमाल किया। लद्दाख की सरहद सैनिकों के खून से लाल हो गई।

बदला कैसे लेंगे?
चीन ने हमारे २० सैनिकों की हत्या कर दी, इसका बदला मोदी सरकार वैâसे लेगी? यही वास्तविक सवाल है। या बदला लेने के लिए, सर्जिकल स्ट्राइक करके विजय का डंका पीटने के लिए पाकिस्तान को आरक्षित रखा है? २० जवानों की हत्या का बदला मोदी सरकार ने नहीं लिया तो हमारा सबसे बड़ा अपमान साबित होगा। चीन के साथ १९६२ का युद्ध नेहरू की गलत नीतियों के कारण हार गए थे, ऐसा डंका भाजपावाले अब नहीं पीट सकेंगे। गलवान घाटी में चीन के सैनिक घुस गए और अब गलवान घाटी चीन के कब्जे में है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बुधवार की दोपहर को अधिकृत तौर पर इसकी घोषणा की। ‘गलवान वैली चीन का हिस्सा है।’ इस पर हिंदुस्थान की ओर से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की गई। मोदी सरकार ने तटस्थता की नीति छोड़कर अमेरिका के पीछे ज्यादा घूमने की नीति अपनाई। यहां यह याद रखना चाहिए कि इससे सरहद पर चीन ज्यादा आक्रामक हो गया। हिंदुस्थान की सरहद पर स्थित ज्यादातर देश आज चीन की टोलीवाले हैं। पाकिस्तान, नेपाल व श्रीलंका, ये देश चीन की मदद पर जीवित हैं तथा चीन के इशारे पर हिंदुस्थान को चुनौती दे रहे हैं। महासत्ता अमेरिका से मित्रता वगैरह ठीक है लेकिन सीमा अशांत रही तो महासत्ता क्या करेगी? अमेरिका के लिए करीबी पड़ोसी चीन से झगड़ा करना विदेश व रक्षा नीति नहीं हो सकती है। दुर्भाग्य से आज यही होता दिख रहा है।

व्यापार शुरू ही है!
आज स्थिति ऐसी है कि सरहद पर विवाद सुलग रहा है इसके बावजूद चीन के साथ हमारा व्यापार जारी है। २० जवानों को श्रद्धांजलि के रूप में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की घोषणा तो हमारे प्रधानमंत्री को करनी चाहिए थी, परंतु यह भी नहीं हुआ। आजादी के बाद ७० वर्षों में हम हमारे देश की सीमा को ठीक नहीं कर सके। १९६२ में चीन द्वारा हिंदुस्थान पर हमला करने तक हमारी उत्तरी सीमाएं हमें सही ढंग से मालूम ही नहीं थीं, जिस मैक मोहन रेखा की जानकारी थी, वह सिर्फ नक्शे में थी। वास्तव में इस बर्फीले क्षेत्र में हम कभी गए ही नहीं थे। तिब्बत को हम आजादी के पहले ही छोड़ चुके थे। तिब्बत जब तक आजाद था तब-तक हिंदुस्थान-चीन के बीच सीमा विवाद शुरू नहीं हुआ था। तिब्बत गया और चीनी फौज हमारी चौखट पर आकर खड़ी हो गई। ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’, इस नारे का चीन ने अर्थ ये लगाया था कि चीन द्वारा निगले गए क्षेत्र पर अब तुम कभी भी दावा न करना। अरुणाचल-तवांग सीमा पर तब भी चीनी सैनिक घुसपैठ कर ही रहे थे। १९६२ के बाद चीन से सही संवाद नहीं हो सका। वाजपेयी ‘जनता’ सरकार में विदेश मंत्री बने तथा बीजिंग गए। उसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री की हैसियत से चीन गए। उनके प्रतिनिधिमंडल में अटलबिहारी वाजपेयी विपक्ष के नेता के रूप में गए थे। उस दौरे में पत्रकारों ने वाजपेयी से सवाल पूछा था कि, ‘१९६२ में चीन ने जब हमला किया था तब सीमा विवाद को लेकर आपकी जो भूमिका थी, वह आज भी है क्या?’

वाजपेयी ने सीधे नकारार्थी उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि ‘तब हमें कोई जानकारी नहीं थी। हमारा क्षेत्र चीन ने हथिया लिया, हम इतना ही जानते थे।’ और बाद में उन्होंने पत्रकारों से निजी तौर पर कहा था कि, ‘जिस भाग को हम हमारा समझ रहे थे, प्रत्यक्षरूप से हम वहां कभी गए ही नहीं थे।’ वाजपेयी का यह इकरार सही था। हमें हमारी सरहद पता ही नहीं और सरहद की रक्षा के लिए देश कुर्बानी दे रहा है। गलवान घाटी में चीनी सेना आ गई। हमारे सैनिकों ने प्रतिकार किया। चीन कहता है यह पूरा इलाका हमारा है। उल्टे तुम्हीं लोग घुसपैठ किए हो। इस पर हम चुप्पी साधे बैठे हैं।

हवा निकल गई
प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग सहित अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के बाहुबली राजनीति की भी हवा लद्दाख-गलवान घाटी मामले में निकल गई है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने एक महीने पहले ही आशंका जताई थी कि चीनी सैनिक लद्दाख स्थित हमारे भूभाग में घुस आए हैं। मोदी देश को सच्चाई बताएं। गांधी जो बोल रहे थे, वह सत्य साबित हुआ तथा पराजय छिपाने के लिए गांधी को झूठा ठहराया गया। हिंदुस्थान के २० सैनिक चीन के साथ हुई झड़प में शहीद हुए, कई सैनिक लापता हैं। वे इसी झड़प के दौरान गहरी गलवान घाटी में गिरकर मारे गए होंगे, ऐसा डर है। हमारा एक भी सैनिक चीन में बंदी नहीं है, पहले ऐसा कहा गया। प्रत्यक्ष में हमारे १० सैनिकों को चीन ने बंदी बनाया था, बाद में चीन ने उन्हें छोड़ दिया। यह चीन का आक्रमण है व सरकार इस आक्रमण का प्रतिकार नहीं कर सकी। इस प्रकरण में सरकार ने कई बातों को छिपाए रखा, जिस पर से अब परदा उठा रहा है। पाकिस्तानी फौज करगिल तक पहुंच गई है, यह पता चलते ही प्रधानमंत्री वाजपेयी ने युद्ध का एलान कर दिया था। लद्दाख-गलवान घाटी चीन के जबड़े में पहुंच गई है और हम इससे निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। अब ट्रंप चुनाव हार जाएंगे, ऐसे हालात हैं। ट्रंप के लिए चीन को नाराज करके क्या हासिल किया?

गड़बड़ और भ्रम की स्थिति सरहद पर नहीं, बल्कि दिल्ली में ही है, ऐसा बहुत पहले मोदी ने कहा था। यह अब समझ में आ गया है! चीन के साथ हमारा विवाद खत्म नहीं होनेवाला है क्योंकि इस विवाद का सीधा संबंध अमेरिका के साथ हमारे संबंधों से है। भविष्य में चीन ही हमारा मुख्य दुश्मन होगा इसलिए हिमालय का दुर्गम एवं अति ऊंचा इलाका ही हमारा वास्तविक युद्ध क्षेत्र होगा। चीन की तुलना में पाकिस्तान बेहद दोयम दर्जे का शत्रु है। इसलिए सैन्य कौशल से संबंधित रणनीतियां बनाते समय पाकिस्तान को ज्यादा अहमियत देने की कोई वजह नहीं है। पाकिस्तान से जंग हुई भी तो वह जाने पहचाने भू-भाग से होगी, इसलिए वहां हमारे सैनिक बिलकुल भी कमजोर साबित नहीं होंगे लेकिन चीन के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। गलवान घाटी में हम नीचे गहराई में गिर गए हैं। उसमें से बाहर निकलना होगा। प्रधानमंत्री मोदी के साथ देश खड़ा ही है। लेकिन क्या वे देश की सुनेंगे?