" /> जाति ही पूछो अपराधी की!, फिर निकला जाति का कार्ड

जाति ही पूछो अपराधी की!, फिर निकला जाति का कार्ड

उत्तर प्रदेश में आठ पुलिस वालों को मार एक हफ्ते में ही विकास से दुर्दांत दुबे बने अपराधी के एनकाउंटर के बाद से कई सवाल उठने लगे हैं। सवाल विकास दुबे और साथियों को संरक्षण व सुरक्षा देने वाले सफेदपोशों पर है। सवाल कई संदेहास्पद एनकाउंटर करने वाली यूपी पुलिस पर हैं तो सबसे बड़ा सवाल अपराधी की जाति को लेकर भी है। विकास दुबे को पकड़ने की कवायद में पांच साथियों को पुलिस ने मार गिराया। वारदात के कुछ ही घंटों में विकास दुबे के घर पर बुलडोजर चलवा कर उसे गिरा दिया। अदालत से लेकर मानवाधिकार आयोग तक आधिकारिक शिकायतें जा चुकी हैं और जनता की अदालत में भी विकास दुबे बनाम एक जाति विशेष के साथ हो रहे व्यवहार का मुकदमा चला दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों द्वारा प्रदेश में ब्राह्मणों के साथ अब तक हुई ज्यादतियां सामने लाई जा रही हैं। पार्टियां ब्राह्मण चेहरों को इस मुहिम में आगे कर रही हैं। खोज खोज कर ब्राह्मणों के साथ नाइंसाफी के वाकये गिनाए जा रहे हैं। बीते तीन सालों में समाज की इस ताकतवर बिरादरी के साथ आर्थिक, सामाजिक व प्राशासनिक भेदभाव के उदाहरण विपक्ष गिनाने में लगा है। कभी ब्राह्मण दलित गठजोड़ के सहारे यूपी में बहुमत की सरकार बना चुकी बहुजन समाज पार्टी की मुखिया को भी फिर से ब्राह्मणों की सुध आई है और वो अपराध के नाम पर एक बिरादरी विशेष को निशाना न बनाने की गुहार लगा रही हैं।
फिलवक्त उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर विकास दुबे का एनकाउंटर हो चुका है, मगर उसकी पटकथा अभी लिखी जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या २०२२ के चुनाव में विकास दुबे की पटकथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भारी पड़ सकती है? दुबे के अंतिम संस्कार के बाद कई तरह के सवालों ने अपनी राह बना ली। विपक्ष और पुलिस एक्सपर्ट की ओर से एनकाउंटर पर अंगुलियां उठ रही हैं तो उसकी सीबीआई जांच क्यों नहीं कराई? सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि क्या योगी सरकार ने खुद को बचाने के लिए एसआईटी गठित की है। तब्लीगी समाज के प्रमुख मौलाना साद का जिक्र हुआ। यूपी में कांग्रेस पार्टी के ब्राह्मण चेहरे जितिन प्रसाद, पूर्व राज्यसभा सांसद हुसैन दलवई और जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू यादव ने भी ‘एनकाउंटर और जाति’ पर कुछ इशारा किया है।
बात विकास दुबे के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की नहीं है। असली मसला तो इस पर सवाल कर ब्राह्मण वोटरों में हमदर्दी जगाने की है। कहने के लिए अपराधी की जाति नहीं होती है। लेकिन बिहार-यूपी में बाहुबलियों की जाति भी होती है और उनका धर्म भी। शहाबुद्दीन, मुन्ना शुक्ल, अनंत सिंह से लेकर मुख़्तार अंसारी, अतीक अहमद, डीपी यादव और ब्रजेश सिंह, सबकी अपनी राजनीति है।
उज्जैन में महाकाल मंदिर के बाहर जब विकास दुबे पकड़ा गया था। उसके बाद से ही ये चर्चा होने लगी कि वो एनकांउटर में मारा जाएगा। सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने ऐसी ही राय दी। ठीक वैसा हुआ भी। एसटीएफ का कहना है कि उसने आत्मरक्षा यानी सिविल डिफेंस में दुबे को मारा। भागने के चक्कर में वो पुलिस पर गोली चला रहा था। एनकांउटर की जांच को लेकर शिकायत हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। विकास दुबे का पुलिसवालों को मारना और फिर खुद मारा जाना। इस घटना ने हमारे सिस्टम की पोल खोल दी है। खाकी, खादी और अपराध की सांठगांठ को पूरे देश में देखा। ये भी तय है कि अगर वो जिंदा रहता तो कई राज खुलते। न जाने कौन कौन बेनकाब होता, लेकिन ये सब विकास की मौत के साथ ही दफन हो गए।
विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई थी। कुछ लोगों ने लिखा कि योगी सरकार में जाति विशेष को निशाना बनाया जा रहा है। ठाकुर और ब्राह्मण राजनीति पर चर्चा तेज हो गई। जानकारों का सवाल था कि दुबे की हत्या ने उत्तर प्रदेश में ठाकुर समुदाय के खिलाफ ब्राह्मणों के नेतृत्व वाले एक युद्ध को प्रज्वलित किया है।
इस मामले के जानकार बताते हैं कि यूपी में दुबे एनकाउंटर कई तरह के राजनीतिक व सामाजिक बदलावों का जरिया बन सकता है। लोगों ने सोशल मीडिया में लिखा कि विकास दुबे की हत्या नहीं हुई है, बल्कि विश्वास को मार दिया गया है। लोग आपस में मिलकर इस केस की चर्चा न करें, उनमें एक सामाजिक दूरी बनी रहे, इसके लिए कोरोना की आड़ लेकर ५५ घंटे का लॉकडाउन कर दिया गया।
जब लोगों में यह चर्चा होने लगी कि ये सब दुबे मामले को शांत करने के लिए हो रहा है तो सरकार के कान खुल गए। आनन-फानन में यह घोषणा कर दी गई कि अब हर सप्ताहांत पर सरकारी और निजी कार्यालय बंद रहेंगे। इसके पीछे कोरोना को ही बड़ी वजह बताया गया है। इतने बड़े केस की सीबीआई जांच को लेकर योगी सरकार ने कुछ नहीं कहा। वजह, अगर यह जांच सीबीआई करती तो हो सकता है कि भविष्य में ये मामला योगी सरकार के गले की फांस बन जाए। केंद्र में सत्ता बदलने के बाद सीबीआई के पिटारे से कुछ ऐसा निकल जाए, जो राजनीतिक तौर पर योगी सरकार को नुकसान पहुंचा दे।
कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद सीधे तौर पर इस विवाद में नहीं पड़े, मगर उन्होंने कई ट्वीट कर दिए। एनकाउंटर पर सवाल उठाते हुए लिखा कि यूपी पुलिस ने दुबे के परिजनों और दूसरे रिश्तेदारों के साथ गलत व्यवहार किया है। उन्होंने अमर दुबे के साथ नौ दिन पहले ब्याही महिला की परेशानी के बाबत पुलिस को घेरा। यूपी में लगातार हो रही जातिगत हत्याओं को लेकर फेसबुक लाइव किया गया। दुबे केस में प्रभात मिश्रा जैसे लोगों को क्या जानबूझकर मारा गया, इस पर सवाल खड़े किए गए। इस दौरान लोगों ने यूपी में एक जाति विशेष की मौजूदा दयनीय स्थिति को लेकर कई तरह की बातें लिखीं। आगामी चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने की बात कही गई। जाहिर इस सब के पीछे विपक्ष की सहमति रही होगी और साफ है कि आगामी चुनाव में कई पार्टियां अपने खोए हुए वोट बैंक यानी ब्राह्मणों को दोबारा पार्टी में लाना चाह रही हों।
राजनीतिक दलों के कुछ लोगों ने इस मामले में योगी सरकार पर तंज कसा। सोशल मीडिया पर लिखा गया कि अगर विकास दुबे की जगह कोई ठाकुर होता तो क्या ऐसा ही व्यवहार होता? फेसबुक, व्हॉट्सऐप और ट्विटर पर ऐसे संदेश चल रहे थे कि यूपी में आगे की राजनीतिक लड़ाई ठाकुर बनाम ब्राह्मण है।
सच तो ये है कि यूपी में जिस पार्टी की सरकार रही। विकास दुबे उनके गुण गाता रहा। पुलिस और कोर्ट कचहरी से बचने का ये उसका अचूक तरीका रहा है। उसकी कोई जाति थी तो वह केवल अपराध थी। जीते जी विकास दुबे राजनीति का मोहरा बना रहा। गैर ब्राह्मण नेताओं के लिए ब्राह्मणों के वोट का जुगाड़ करता रहा। अब उसकी मौत पर भी वोट की सियासत जारी है।