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किस देवता से हिसाब मांगें?

कोरोना संकट के कारण देशभर के ‘देवता’ लॉकडाउन में बंदी हो गए हैं। पहले देवताओं और दानवों के बीच युद्ध होता था, तब दानव देवताओं को बंदी बना लेते थे, ऐसी कथाएं पुराणों में मिलती हैं। अब कोरोना नामक दानव ने देवताओं को बंदी बना लिया है। मंदिर ही नहीं अपितु किसी भी प्रार्थना स्थल को नहीं खोलना है, ऐसा सरकारी आदेश है। इसलिए अधिकतर सारे धार्मिक उत्सव बंद हैं। मुंबई में होनेवाला माउंट मेरी का मेला रद्द कर दिया गया। लेकिन कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र के भाजपा के सयाने नेताओं ने मुख्यमंत्री ठाकरे से मांग की कि महाराष्ट्र के मंदिरों को तुरंत खोलो। भारतीय जनता पार्टी रोज ‘ये खोलो, वो खोलो’ जैसी मांगें किस आधार पर कर रही है, यह एक बार साफ हो जाए तो अच्छा होगा। जम्मू-कश्मीर में फिलहाल केंद्र का, मतलब राष्ट्रपति शासन शुरू है। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार की अमरनाथ यात्रा को रद्द कर दिया गया है। यहां ‘महाराष्ट्र के मंदिरों को खोलो’ ऐसा कहना और वहां अमरनाथ यात्रा को रद्द करना, यह दोहरी नीति है। भाजपा के नेता कह रहे हैं, ‘वर्तमान संकट काल में समाज को मानसिक और धार्मिक सहारे की आवश्यकता है इसलिए सारे मंदिरों को खोल देना चाहिए।’ दक्षिण के तिरुपति बालाजी मंदिर को खोला गया। पहले ही झटके में ३४ पुजारी कोरोना से संक्रमित हो गए। उसमें से एक मुख्य पुजारी ने अपनी जान गंवा दी। कम-से-कम नेताओं को इस बात का खयाल रखना चाहिए। ‘मंदिरों को खोलो’ जैसा राग अलापने से कोई हिंदुत्ववादी साबित नहीं होगा तथा ‘मस्जिद और चर्च को खोलो’ ऐसी मांगें करने से कोई सेकुलर बनकर चार चांद नहीं लगाएगा। वर्तमान समय ‘जियो और जीने दो’ के मंत्र के अनुपालन का है। आज देश में सबसे ज्यादा आवश्यकता है लोगों को धीरज देने की और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के निर्माण की। मुंबई में ५ हजार बेड का दुनिया का सबसे बड़ा संक्रमण रोग अस्पताल मनपा शुरू करेगी, ऐसा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने घोषित किया। यह भी एक प्रकार का मंदिर नहीं है क्या? आज सारे अस्पताल और कोविड केंद्र एक प्रकार से मंदिर का ही स्वरूप प्राप्त कर चुके हैं। लॉकडाउन में धार्मिक स्थलों पर बंदी भले हुई हो लेकिन सफेद कपड़ों के देवदूत अस्पताल में सेवारत हैं। मुंबई मनपा के नायर अस्पताल में अब तक ५०० से अधिक नवजात बालकों ने कोरोना को मात दी। इन बच्चों को जन्म देनेवाली माताएं कोरोना संक्रमित थीं इसलिए जन्मे बच्चों की सुरक्षा करना यह सफेद कपड़ों के देवदूतों का कर्तव्य था और उन्होंने उसे पूरा करके भी दिखाया। देवताओं से और क्या अपेक्षा होती है! अमरनाथ यात्रा और माउंट मेरी की यात्रा रद्द भले ही हुई हो लेकिन भक्तों की यात्रा अस्पतालों में उमड़ पड़ी है। कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें सच्ची ताकत यहीं मिल रही है। मंदिर बंद होने के कारण उस पर आश्रित प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका पर संकट बना ही हुआ है। जो देवताओं पर ही निर्भर है, उसका रास्ता भी देवता ही दिखाएंगे। कर्नाटक में कोरोना महामारी भयानक रूप ले चुकी है और सरकार के एक मंत्री हतबल होकर कहते हैं, ‘अब जो होगा भगवान ही देखेंगे!’ जब भगवान को ही सब देखना है तो इतनी दौड़भाग और उपद्रव करके तुम सत्ता पर आए ही क्यों? सत्ता पवित्र है और ईश्वरीय प्रसाद है। कर्नाटक में कई मंदिर और मठ हैं। उनकी पवित्रता और सामाजिक कार्य बहुत वृहद है। पिछले दिनों ‘राहुल गांधी ने मठ में जाने से पहले मांसाहार किया’, ऐसा भावनात्मक आरोप कर्नाटक भाजपा के एक मंत्री ने लगाया था। इस तरह की बातों की बजाय स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्था को मजबूत करके कोरोना पीड़ितों की मदद करो। आखिरकार, लड़ाई इंसानों को ही लड़नी पड़ती है। अयोध्या के प्रभु श्रीराम की अस्मिता के लिए भक्तों के खून से सरयू लाल हो गई। ऐसा धार्मिक संघर्ष दुनिया भर में चलता ही रहता है। मंदिर और प्रार्थना स्थलों में पवित्र मूर्तियां हैं और उन मंदिरों के भरोसे करोड़ों लोगों का जीवनयापन हो रहा है। मंदिर बंद होने से पूजा-अर्चना करनेवाले गुरव समाज की आय बंद हो गई है। मंदिर में कीर्तन करनेवाले, भजन करनेवाले, इतना ही नहीं मंदिरों के बाहर गाय के लिए चारा-पानी का पुण्य दान करवानेवाले, चप्पल संभालने वाले, नारियल, प्रसाद, फूल बेचनेवाले सभी लोग बेरोजगार हो गए हैं। इन सभी की आजीविका का सवाल है। एक अमरनाथ यात्रा से लाखों लोगों के घर में चूल्हा जलता है। उस अमरनाथ यात्रा में बाधा उत्पन्न करनेवाले पाकिस्तानी आतंकवादियों को हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे ने फटकार लगाई और तब जाकर रास्ता खुला। कोरोना के कारण अमरनाथ यात्रा सहित देशभर के मंदिरों को बंद करना पड़ा। किस देवता से जवाब मांगें?