" /> मुंबई के दक्षिण भारतीयों की अयोध्या, मथुरा और काशी

मुंबई के दक्षिण भारतीयों की अयोध्या, मथुरा और काशी

माटुंगा का संबंध मातंग ऋषि से जोड़ा जाता है, वह पौराणिक ऋषि, जो पंपा नदी के तट पर महायज्ञ कर ‘महर्षि’ कहलाए और निवासस्थान बनाकर माटुंगा में ही रह गए। माटुंगा का महत्व १९२० के दशक में बढ़ा, जब यहां हिंदू, पारसी और तेुलुगु समुदाय की कालोनियां बसने लगीं। धीरे-धीरे इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की स्कीमों ने यहां रौनक लगाई और ’४०, ‘५० और ’६० के दशक में नौकरी-धंधे की तलाश में दक्षिण‌ भारत से लोग मुंबई आने लगे। इन लोगों ने यहां छोटे-छोटे होटेल और दुकानें खोलीं और पगड़ी सिस्टम में घर लेकर यहीं रहने भी लगे।
दक्षिण भारत से आए इन लोगों ने माटुंगा में अपने मंदिर भी बनवाए। रेलवे अधिकारी डॉ. सरस्वती अय्यर के कई संबंधी इस क्षेत्र में रहते हैं। उन्होंने बताया, ‘हाल के वर्षों में माटुंगा की शिक्षा संस्थाओं में दक्षिण का आधिपत्य कमजोर हुआ है, पर दक्षिण भारतीयों के लिए माटुंगा आज भी चुंबक है। पोंगल, नवरात्र, विशु, ओणम, आदि त्योहारों में इसकी झलक देखी जा सकती है।’
माटुंगा में ऐतिहासिक महत्व के कई मंदिर हैं। इनमें चार प्रमुख मंदिर अकेले फूल गली में हैंः आस्तिक समाज मंदिर, साउथ इंडियन भजन समाज मंदिर, श्री कन्यका परमेश्वरी मं‌‌दिर और शंकर मठम मंदिर। हर मंदिर के अपने विशेष भक्त हैं। आस्तिक समाज मंदिर के केरलीय, भजन समाज मंदिर व शंकर मठम मंदिरों के तमिल और श्री कन्यका परमेश्वरी मंदिर के तेलुगु।
आस्तिक समाज मंदिर
माटुंगा में आज भी ऐसे बुजुर्ग तमिलभाषी मिल जाएंगे जो प्रतिदिन सुबह आस्तिक समाज मंदिर में जाकर भगवान को प्रणाम करके ही दिन की शुरुआत करते हैं। १९२३ में मात्र श्री राम के चित्र के साथ आरंभ माटुंगा के सबसे पुराने इस दक्षिण भारतीय मंदिर के चार गर्भगृहों में अर्धागिणी सीता, अनुज लक्ष्मण और हनुमानजी के साथ श्री राम की स्वर्णखचित मूर्तियां, श्री कृष्ण (श्री गुरुवायूरप्पन), श्री सुब्रमणिया और स्वामी अयप्पन अलग-अलग विराजमान हैं।
कोच्चु गुरुवायूर मंदिर के रूप में भी प्रसिद्ध आस्तिक समाज का यह मंदिर शिल्प शास्त्र के अनुरूप निर्मित है और स्थापत्य, पूजा व अनुष्ठान विधियों में केरल के मूल मंदिर का प्रतिरूप है। रामनवमी उत्सव में जब यहां कुचिपुडी, भरतनाट्यम और मोहिनीअट्टम का सम्मिलित नृत्योत्सव जिसने भी देखा है, यहां बार-बार आना चाहेगा। मंदिर के अन्य प्रसिद्ध उत्सव हैं विनायक चतुर्थी और भगवान कार्तिकेय की स्कंद षष्ठी। आस्तिक समाज मंदिर में बरगद का एक वृक्ष इच्छापूर्ति के लिए बहुत फलदायक माना जाता है। मंदिर में सत्संग, वेद व ज्योतिष की कक्षाएं चलती रहती हैं और सांस्कृतिक केंद्र विवाह, आदि आयोजनों से हमेशा व्यस्त बना रहता है।
साउथ इंडियन भजन समाज मंदिर
साउथ इंडियन भजन समाज ने १९२७ में माटुंगा में जब अपनी शुरुआत की, तब यह बहुत छोटी सी जगह थी, जहां दक्षिण भारतीय समाज के लोग एकत्र होकर भजन गाया करते थे। आज यह भव्य मंदिर है, जिसका सबसे विशिष्ट आकर्षण है देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाओं से सज्ज राजगोपुरम। भीतर तमिलनाडु के तंजौर जिले से लाया गया भगवान राम का अलंकृत चित्र है। विशिष्ट अवसरों पर भगवत प्रतिमाओं को स्वर्ण कवच में मंडित किया जाता है और भगवान को सोने के झूले में झुलाया जाता है। मंदिर का मौजूदा स्वरूप यहां के मुख्य पुजारी ब्रह्मश्री एम. वी. गणेश शेट्टी की देन है। मंदिर के मुख्य उत्सव रामनवमी और नवरात्र हैं।
श्री शंकर मठम
आदि शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत श्री शंकर मठम ने पिछले ही वर्ष अपनी ८०वीं पायदान पर कदम रखा है। मंदिर की शुरुआत १९३९ में आदि शंकराचार्य के परम भक्त श्री सुब्रमणिया शास्त्रीगल ने वेदों के अध्ययन-अध्यापन से की थी, जिसका क्रम आज तक अखंडित है। मंदिर का मौजूदा स्वरूप १९५४ की देन है, जब विभिन्न आचार्यो ने यहां विभिन्न भगवानों की प्रतिमाएं स्थापित कीं। अधिराज भगवान शिव होने के नाते देवालय के मुख्य पर्व हैं महाशिवरात्रि और आदि शंकर जयंती।
अपने सुंदर वास्तु के कारण मंदिर सहज ही महानगर के सुंदरतम मंदिरों में अपनी गणना कराता है। प्रवेश करते ही दो विशालकाय हाथी आपका स्वागत करते हैं। ३६ और १००८ पंखु‌ड़ियों वाले कमल दल मानों हिंदू धर्म के दर्शन का प्रतिनिधित्व करते दिखते हैं। सीढ़ियां चढ़कर जब आप ऊपर केंद्रीय कक्ष में जाएंगे तो अद्वैत दर्शक के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य और अन्य आचार्यों के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय सुंदर चित्रों, कलाकृतियों और मूर्तिशिल्पों के दर्शन होंगे।
श्री कन्यका परमेश्वरी मंदिर
श्री कन्यका परमेश्वरी मंदिर माटुंगा के मंदिरों में संभवतः सबसे नया है। अष्टलक्ष्मी का यह मंदिर आंध्र प्रदेश के पेणुगोंडा के देवी कन्यका मंदिर का ही लघु प्रतिरूप है, जिसकी कुंभाभिषेक विधि २४ फरवरी, २००० को जगतगुरु शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती और विजयेंद्र सरस्वती के हाथों संपन्न हुई। आकार में लघु होने के बावजूद इस देवी मंदिर के नियमित भक्त हैं, जिनमें अधिकांश आंध्र प्रदेश के तेलुग समाज के हैं। यहां धन और वैभव की देवी लक्ष्मी – धनलक्ष्मी, महालक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, आदिलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, धैर्यलक्ष्मी – इन अष्ट रूपों में विराजमान हैं। शीघ्र विवाह होने और अभीष्ट वर की कामना से यहां कुमारी कन्याओं का तांता हमेशा बना रहता है। मुख्य पर्व नवरात्र है।
श्री मरुबाई गांवदेवी
डॉन बास्को स्कूल के सामने श्री मरुबाई गांवदेवी मंदिर जो स्थानीय गांवदेवी का मंदिर है, जनश्रुति के अनुसार जिन्हें मां दुर्गा का ही एक अवतार माना जाता है। आज जो माटुंगा है उसे पहले मरुबाई टेकड़ी गांव के नाम से जाना जाता था। जनश्रुति के अनुसार पुराने जमाने में आस-पास के द्वीपों की खारभूमि में मीठे जल का तालाब सिर्फ यहीं था। बाढ़ में पानी जब प्रदूषित हो जाता और संक्रामक बीमारियां फैलने लगतीं तो ग्रामीण देवी का अभिषेक कर वही पानी पीकर पुनः स्वस्थ हो जाया करते थे।
श्री मरुबाई गांवदेवी की आयु ४०० वर्ष प्राचीन आंकी गई है। मूल रूप से यह मंदिर किंग्स सर्किल में पीपल के एक पेड़ के नीचे हुआ करता था। मौजूदा स्वरूप में इसका इतिहास १८८८ से मिलता है, जब इसके लिए भूमि खरीदी गई और इसकी देखभाल की जिम्मेदारी गांव के तत्कालीन गांव के सरपंच काशीनाथ बीकाजी ने संभाली। ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में गावंड ने बहुत से ग्रामीणों को जमीनें दीं। इस शर्त के साथ कि इस भूमि का उपयोग केवल बच्चों की शिक्षा के लिए किया जाएगा। आज माटुंगा, दादर, सायन, वडाला और माहिम में पचास से ज्यादा शिक्षा संस्थाएं मरुबाई का आशीर्वाद स्वरूप ही हैं। मंदिर में मरुबाई की प्रतिमा स्वर्णम‌ंडित है। शारदीय नवरात्र, गोलू उत्सव और हल्दी-कुंकुम श्री मरुबाई गांवदेवी मंदिर के मुख्य उत्सव हैं, जब यहां दर्शन के लिए आने वाली हर महिला को उपहार देकर विदा किया जाता है। यहां एक सामुदायिक हॉल भी है, जिसका योग की कक्षाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में प्रयोग किया जाता है। २००० में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर आज भी काशीनाथ बीकाजी गावंड के वंश के लोगों के प्रबंध में है। १९५२ से यह एक ट्रस्ट के अधीन है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)