‘मैं सिर्फ दिल की आवाज सुनता हूं!’- आयुष्मान खुराना

‘नेशनल अवॉर्ड’ विनर आयुष्मान अपनी नई फिल्म ‘बाला’ को लेकर सुर्खियों में हैं। यह फिल्म ७ नवंबर को रिलीज हो रही है। आयुष्मान के साथ भूमि पेडणेकर और यामी गौतम दो लीड एक्ट्रेस हैं। प्रस्तुत है आयुष्मान खुराना से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
‘बाला’ और ‘उजड़ा चमन’ एक ही विषय पर आधारित हैं। क्या कहना चाहेंगे आप इस पर?’
मुझे इस विषय पर कुछ कहने की मनाही है। अगर एक ही विषय पर एक साथ और भी फिल्में बनती हैं तो इसमें कलाकार क्या कर सकते हैं? इससे पहले भी भगत सिंह पर एक साथ दो या तीन फिल्में एक ही समय में बनी थीं। एक ही टॉपिक पर एक साथ फिल्मों का टकराना पहली बार नहीं हुआ है।
फिल्म ‘बाला’ में कोई मैसेज भी दिया गया है?
अक्सर फिल्म मेकर्स कोशिश करते हैं कि अपनी फिल्मों के जरिए वे मनोरंजन के अलावा समाज को कुछ मैसेज भी दें। फिल्म्स और समाज में गिव एंड टेक का रिश्ता होता है। यह फिल्म उन सभी लोगों पर कटाक्ष करती है जिन्हें उनके जीवन में कुछ न कुछ कॉम्प्लेक्स है। किसी की हाइट कम है, तो कोई मोटापे से परेशान है, तो कोई पतला है लेकिन इन सभी के ऊपर हमारी जिंदगी है, उसे खुशी से गुजारनी है। अपने शारीरिक कमियों से हमें ऊपर उठना होगा।
कोई कॉम्पलेक्स जिससे बाहर आने में आपको वक्त लगा?
पांचवीं कक्षा के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं बहुत पतला हूं। वैसे मैं तो आज भी पतला हूं। ऐसा नहीं कि मैं खाता नहीं था। खाता तो मैं बहुत था पर हाई मेटाबॉलिज्म के कारण मेरा वजन नहीं बढ़ता था। मैं खुद को लो फील करने लगा। कॉलेज में मैं टेनिस खेलने लगा। यह मेरा फेवरिट स्पोर्ट्स है, फिर कॉलेज में मुझे टेनिस कोच ने कहा, तुम बहुत पतले हो, टेनिस मत खेला करो। मुझे बहुत बुरा लगा कि मेरे पतले होने का कनेक्शन मेरे वीक होने से लगाया गया। जब मैं २९-३० वर्ष का हुआ तो मेरा वजन थोड़ा बढ़ गया फिर मुझसे कहा गया कि अब वजन बढ़ गया है। अगर ज्यादा टेनिस खेलोगे तो वैâलोरीज ज्यादा बर्न होगी। जितने लोग उतनी बातें। इतने बड़े देश में हजारों लोगों को कई प्रकार के कॉम्प्लेक्स हैं।
एक आम युवक से बॉलीवुड कमर्शियल स्टार की जर्नी क्या सेल्फ डिस्कवरी की?
अपनी खुद की आवाज को पहचानना, अपने दिल के जज्बे को जानना बहुत जरूरी है। ये मैंने सेल्फ डिस्कवरी की अपने सफर में। मेरा सोचना है कि आप अपने अनुभवों के आधार पर सीखो। दुनियाभर के लोगों से उनकी राय पूछते रहेंगे तो कन्फ्यूज हो जाएंगे। मेरी पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ रिलीज हुई। सफल होने पर अन्य फिल्मों के प्रस्ताव आने लगे। मैंने कुछ सीनियर्स की राय लेनी चाही क्योंकि तब लगता था कि मैं फिल्मी परिवार से नहीं हूं और यहां की जानकारी नहीं है इसलिए लोगों से विचार-विमर्श करूं लेकिन मैंने सोचा नहीं, सिर्फ अपने दिल की आवाज सुनो। शत-प्रतिशत सही जानकारी किसी के पास नहीं क्योंकि कभी न्यूकमर्स की फिल्म हिट होती है तो कभी सीनियर्स की फ्लॉप। किसी के पास कोई सक्सेस फॉर्मूला नहीं होता। दूसरों से राय लेना बंद किया तो मेरा अनुभवों का दायरा बढ़ता गया। अब मैं सिर्फ दिल की आवाज सुनता हूं।
‘अंधाधुन’ के लिए आपको राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। क्या यह फिलिंग लाइफ चेंजिंग है?
मुझे लगता है कि कुछ नहीं बदला है जीवन में। देश का पुरस्कार सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसमें मान-सम्मान, प्यार एक्सेप्टेंस सब शामिल है। मैं पहले भी विनम्र था और आज भी हूं। हां, अब परिवार के साथ वक्त बिताने के लिए पहले जैसी फुर्सत नहीं मिलती, इसका मुझे अफसोस है। फिल्मों के प्रस्ताव आते हैं, जो अच्छे हैं उन्हें स्वीकारता हूं। पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को बैलेंस करना उतना आसान भी नहीं है जो मैं करने का प्रयास करता हूं। मेरी फिल्मों को व्यावसायिक सफलता भी मिली है। इससे लाइफ में चेंज आया है। मेरी प्रोफेशनल लाइफ अच्छी चलने से मुझे ज्यादा फिल्में ऑफर हो रही हैं। मैं परिवार को कम वक्त दे पा रहा हूं।
रीयल नेम – निशांत खुराना
जन्मस्थान – चंडीगढ़
जन्म तारीख – १४ सितंबर, १९८४
कद – ५ फुट ८ इंच
वजन – ६० किलोग्राम
मनपसंद अभिनेता – अमिताभ बच्चन
मनपसंद अभिनेत्री – माधुरी दीक्षित