" /> बालासाहेब का जज्बा महत्वपूर्ण था!, अयोध्या शिलान्यास पर बोले यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह

बालासाहेब का जज्बा महत्वपूर्ण था!, अयोध्या शिलान्यास पर बोले यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह

अयोध्या में रामलला का मंदिर बनना ही चाहिए। इसके लिए हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख श्री बालासाहेब ठाकरे का जज्बा महत्वपूर्ण था। यह बात उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कही। अयोध्या में जब कारसेवा हुई थी तब कल्याण सिंह ही यूपी के मुख्यमंत्री थे। ‘दोपहर का सामना’ से विशेष बातचीत करते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए जो आंदोलन हुए उसमें बालासाहेब की भूमिका सराहनीय रही। आंदोलन ही नहीं बल्कि हर मोर्चे वे हमेशा हिंदुओं के साथ खड़े रहते थे। कल्याण सिंह ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिर निर्माण के लिए अग्रणी भूमिका निभानेवाले कुछ नेता आज हमारे बीच नहीं हैं, वे होते तो और खुशी होती। अयोध्या में आगामी ५ अगस्त को राम मंदिर का भूमिपूजन होगा। कारसेवकों द्वारा दिया गया बलिदान फलीभूत होने जा रहा है। राम मंदिर आंदोलन के समय देश ही नहीं, विदेशों में रह रहे हिंदुओं ने भी अयोध्या की ओर कूच किया था। आंदोलन के समय की बात करके कल्याण सिंह आज भी रोमांचित हो उठते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्मस्थान को सहेजने के लिए रामभक्तों को सदियों इंतजार करना पड़ा। पांच अगस्त की तारीख आखिरकार मुकर्रर हुई, जिस दिन मंदिर का भूमिपूजन होगा। कहते हैं कि ‘ख्वाब और हकीकत’ में खासा अंतर होता है। देखा हुआ ख्वाब जब हकीकत में तब्दील होता है तो इंसान खुद को धन्य समझता है। हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख श्री बालासाहेब ठाकरे जैसे नायकों ने अपने परिश्रम की आहूति दी। वैसे बालासाहेब ठाकरे मंदिर के निर्माण के समय मौजूद नहीं हैं लेकिन अब वे खुश होंगे। मंदिर निर्माण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले अन्य महान नेता भी आज फूले नहीं समा रहे होंगे। कल्याण सिंह भी आज ऐसा ही महसूस करते हैं। उन्होंने वर्षों पहले एक अकल्पनीय सपना देखा था, जो सच होने को है। राम मंदिर निर्माण की पहली र्इंट पांच अगस्त को रखी जाएगी। कल्याण सिंह ८८ वर्ष के हो गए हैं, स्वास्थ्य ज्यादा ठीक नहीं रहता, बोलते हैं तो जुबान लड़खड़ाती है। इसके बावजूद ६ दिसंबर १९९२ की तारीख को लिए अपने पैâसले पर गर्व करते हैं। मंदिर निर्माण के भूमिपूजन को लेकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से डॉ. रमेश ठाकुर ने विशेष बातचीत की। पेश है बातचीत का प्रमुख अंश-

दशकों पुराना आपका सपना हकीकत बनने जा रहा है। कैसा महसूस कर रहे हैं आप?
मन को सुकून मिल रहा है। वैसे सपना मात्र मेरे अकेले का नहीं, समूची आवाम का था। हर रामभक्तों की एक ही आकांक्षा थी, एक ही सपना और एक ही सामूहिक संकल्प था, अयोध्या में राम मंदिर बनते देखना। सुप्रीम कोर्ट को कोटि-कोटि धन्यवाद, जिसने नासूर मसले का हल निकालकर मंदिर बनने का रास्ता साफ किया। प्रभु श्रीराम केवल भगवान ही नहीं, बल्कि अनगिनत लोगों की आस्था के बिंदु हैं जिनके नाम लेने मात्र से लोगों की सुबह होती है। इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है उनकी जन्मस्थली को सहेंजे और उसे सुरक्षित रखें। इसी को ध्यान में रखकर ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में क्रांति हुई। उसे कृत्य समझ लो, या संकल्प?

आंदोलन के नायकों में आपकी भूमिका सबसे अलग थी?
मेरे अकेले की नहीं, बल्कि सभी की सहभागिता थी। आंदोलन में एक सामान्य कारसेवक से लेकर सभी छोटे-बड़े किरदार किसी किंवदंती से कम नहीं हैं। सभी की भूमिका एक जैसी है। किसी को कमतर आंकने का मतलब उनकी आस्था पर चोट मारने जैसा होगा। भविष्य में जब-जब राम मंदिर के इतिहास के पन्ने पलटे जाएंगे तो सभी तिलिस्मी आंदोलन के शिल्पकारों की जय-जयकार होगी। चाहे बालासाहेब ठाकरे हों, रामचंद्र परमहंस, अशोक सिंघल जैसे रामभक्त नेता, जो आज हमारे बीच नहीं हैं उनको आज परम पारलौकिक आनंद मिल रहा होगा। मंदिर निर्माण के लिए बालासाहेब ठाकरे का जुनून और जज्बा महत्वपूर्ण हुआ करता था। उनके साथ ही अन्य नेताओं का भी जज्बा काबिले तारीफ था।

भूमिपूजन जैसे ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनेंगे आप?
कहीं भी रहें, मन अभी से गौरवान्वित है। तबीयत अगर ठीक रही तो जाऊंगा। दशकों से दिल में एक ही तमन्ना थी कि अयोध्या में प्रभु का मंदिर बने और झगड़ा समाप्त हो। प्रधानमंत्री के हाथों से भूमिपूजन का कार्य संपन्न होगा, ये हमारे लिए खुशी की बात है। इसलिए जरूरी नहीं कि उस लम्हों को देखने के लिए इंसान का वहां स्वयं होना जरूरी है। प्रभु राम में प्रत्येक इंसान के भीतर अगाध आस्था और श्रद्धा है। घर में रहकर भी वहां जैसी मौजूदगी हम महसूस करेंगे।

वैश्विक संकट में भव्य समारोह के बिना भूमिपूजन कुछ फीका सा महसूस होता है? 
इस दिन का हमें बेसब्री से इंतजार था। आनेवाली पांच अगस्त की तारीख हमारे लिए ऐतिहासिक होनेवाली है। ये तारीख करोड़ों रामभक्तों को सदियों तक माधुर्य का एहसास कराएगी। कोरोना बीमारी भी भव्यता में खलल नहीं डाल सकेगी। तैयारियां जोरों पर हैं, पूरी अयोध्या भक्तों की आगवानी के लिए सजी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वनवास पूरा करके मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम अपने घर को लौट रहे हैं। मेरे जीवन का अंतिम लक्ष्य यही था कि मरने से पहले राम मंदिर का निर्माण होते देखूं। सपना सच हो रहा है, शायद अब शांति से मृत्यु का वरण कर सकूंगा।

मस्जिद ढहाने का मुख्य आरोप आप पर लगा। क्या विध्वंस का कोई मलाल है आपको? 
क्या गलत किया था मैंने? वैसे, इस अध्याय पर चर्चा न हो तो ही अच्छा है, क्योंकि चर्चा हमेशा जीव, इंसान या निर्जीव वस्तु की होती है, जिसका कोई वजूद होता है। एएसआई की किसी रिपोर्ट में विध्वंस स्थल पर मस्जिद होने की बात नहीं कही गई पर ये तथ्य सबके सामने जरूर हैं कि जब-जब वहां खुदाई हुई तो राम युग के कोई न कोई अवशेष मिले। इससे बड़ा सबूत और भला क्या चाहिए। बिलावजह का बखेड़ा खड़ा किया गया। मैं किसी धर्म-समुदाय का विरोध नहीं करता। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण प्रभु राम के जीवंत के आधार पर किया जा रहा है, न कि किसी की आस्था को आहत करके या जोर जबरदस्ती से।

अयोध्या में मंदिर से आस्था के अलावा अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी?
धार्मिक स्थल दोनों की भरपाई करते हैं। उदाहरण के लिए शिर्डी के साई बाबा जैसे मंदिर हमारे सामने हैं। देखिए, आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों अलग-अलग बातें हैं। मन के लिए आस्था, तो पेट के लिए अर्थव्यवस्था जरूरी होती है। दुनियाभर में रहनेवाले रामभक्तों व हिंदुस्थानियों में अमन, शांति व एकता का विश्वास जगेगा। साथ ही अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी, क्योंकि मंदिर निर्माण से कई तरह के रोजगार पैदा होंगे। धार्मिक पर्यटन के रूप में अयोध्या को विश्व पटल पर नई पहचान मिलेगी। इससे राज्य व केंद्र सरकार को प्रत्यक्ष रूप से फायदा होगा।