" /> महामारियों से रक्षा करनेवाली देवी

महामारियों से रक्षा करनेवाली देवी

अगस्त, १८९६ में हांगकांग से आनेवाले जहाजों में आए चूहों से मुंबई में जोरों का ब्यूबोनिक प्लेग पैâला। हर रोज ४०० या ज्यादा तादाद में लोग मरने लगे। १९१८ में जहाजियों के जरिए चोरी-छिपे दाखिल हुए ‘बॉम्बे फीवर’ ने सिर्फ चार महीने में नवजातों और बच्चों सहित १६०० जानें ले लीं। १९९४ में प्लेग ने सूरत में तबाही के साथ एक बार फिर अपनी जोरदार धमक महसूस कराई। बीच-बीच में चेचक, हैजा, एंथ्रेक्स, स्वाइन फ्लू और डेंग्यू जैसी बीमारियां भी मुंबईवासियों के लिए आतंक बनती रहीं। भक्तों का मानना है कि इन सभी मौकों पर शीतलादेवी ने ही इन महामारियों से मुंबई के लोगों की रक्षा की।
कोरोना वायरस के रूप में यह खतरा एक बार फिर सामने है। काल का परकाला माना जानेवाला यह वायरस अब मुंबई में दस्तक दे चुका है। माता के दरबार में भक्तों की कतारें एक बार फिर से लंबी होने लगी हैं-इस कामना के साथ कि शीतला माता अपने हाथ के झाडू से फटकार कर इस बीमारी को भगा देंगी, जो दुनिया के सामने इन दिनों सबसे भयानक खतरा बनी हुई है।
नगर पर जब भी संक्रामक रोग का आक्रमण हो या गंभीर बीमारी से परिवार में किसी की जान पर आफत आ जाए तो सबसे पहले ध्यान आता है माहिम की इन देवी का, जो आरोग्य की देवी हैं। शीतलादेवी मुंबई की सप्तदेवियों में एक हैं। चेचक-खसरा, छोटी माता जैसे चर्मरोगों और संक्रामक रोगों से छुटकारा दिलाने में उनकी महिमा सिद्ध है। बच्चों की रक्षा की कामना से उनकी आराधना सबसे अधिक की जाती है। विवाह और संतान जन्म के बाद शीतला पूजन तो सदियों से परंपरा का अंग है।
सर्वधर्म समभाव का प्रतीक
माहिम की दरगाह और ऑवर लेडी ऑफ विक्टोरिया चर्च के बीच स्थित शीतला मंदिर आरोग्य रक्षा के साथ किस तरह सर्वधर्म समभाव और सहअस्तित्व का प्रतीक है इसकी सबसे ताजा मिसाल हैं १९९२-९३ के सांप्रदायिक दंगे। इन भयानक दंगों के दौरान माहिम जब भीषण खून-खराबे का निशाना बना हुआ था, इस मंदिर ने अपना विशाल परिसर बगैर अपनी सुरक्षा की दुश्चिंता के विभिन्न समुदाय के लोगों को शरण देने के ‌लिए खोल दिया था। शीतला मंदिर सभी धर्मों की एकनिष्ठ मान्यतावाले मुंबई के गिने-चुने धर्मस्थलों में से है। मुस्लिम समुदाय के लोग आज भी अपने मांगलिक अवसरों पर मंदिर के कुएं के पवित्र जल का उपयोग किया करते हैं। क्षेत्र के ईसाई परिवारों के तमाम युवक-युव‌तियां इसी जल से स्नान कर विवाह समारोह के लिए चर्च जाते हैं। शीतलादेवी कोली, आगरियों, पाठारे प्रभु और सूर्यवंशी समाज के अलावा राजस्थान समाज के भी एक वर्ग की कुलदेवी हैं। इसलिए मंदिर के धार्मिक अनुष्ठानों में इन समुदायों की सबसे अधिक उपस्थिति देखी जा सकती है।
मंदिर के बाहर की दुकानों से आपको ओटी (पान, फूल, अक्षत, नारियल, सिंदूर, चावल, चुनरी, पूरणपोली) का नैवेद्य मिल जाएगा। चैत्र अष्टमी मंदिर का विशेष अवसर है, जब शीतला माता की पूजा के साथ भोग और बासी खाया जाता है। मंदिर में हर जगह बड़ों की गोद में और उनके हाथ थामे नवजात और छोटे बच्चे दिखते हैं। शीतल (निरोग) होने की कामना से परिसर के विशाल कुएं के जल में स्नानार्थियों की भीड़ लगी रहती है। माता को अर्पित करने के बाद भक्त यह पानी साथ भी ले जाते हैं। मान्यता है कि पानी की मिकदार घटने के साथ चर्मरोग भी घटते जाएंगे। मंगलवार और गुरुवार मंदिर के विशेष दिन हैं, जब यह परिसर गुंजार दिखाई देता है। शीतला अष्टमी के साथ अश्विन नवरात्र और माघी नवरात्र के दिन यहां काफी भक्त जुटते हैं। माघी नवरात्र की पंचमी को पालकी निकला करती है।
स्वयंभू प्रतिमा
शीतलादेवी मंदिर कोकण शैली में निर्मित तीन शताब्दी प्राचीन मंदिर है, ‌जिसकी शोभा बढ़ाते हैं विशाल वृक्ष और सवा सौ वर्ष से भी अधिक पुराने दीपस्तंभ। मंदिर में मुख रूप में विराजमान शीतलादेवी की प्रतिमा मछुआरों को समुद्र में मिली और स्वयंभू है। मंदिर में त्रिमुखी महाकाली और श्री शांति दुर्गा सहित छह अन्य देवियां भी विराजी हैं। इनमें खोकलादेवी मुख्यत: ग्रामदेवी हैं, जिनकी आराधना छाती की जकड़न और फेफड़े के रोगों के राहत में सहायक है। खोकलादेवी को आटे और नमक से बने प्रसाद भोग विशेष प्रिय है। विशालकाय तीन शिवलिंगों के साथ इस परिसर में गणेश, हनुमानजी, शंकरजी, विठ्ठल रुक्मिणी और साई बाबा के मंदिर भी हैं। मंदिर का संचालन मुंबई के कई अन्य प्रमुख मंदिरों की तरह गौड़ सारस्वत ब्राह्मण ट्रस्ट करता है। म्हात्रे परिवार पांच पीढ़ियों से मंदिर में पूजा करवा रहा है।