" /> राजस्थान का राजनैतिक रण… भाजपा को नाखुशों की तलाश!

राजस्थान का राजनैतिक रण… भाजपा को नाखुशों की तलाश!

रविवार को राजभवन में ११ कैबिनेट और ४ राज्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण के साथ ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सियासी समझ बेहतर होने की तस्वीर नजर आई थी। जिससे अब लग भी रहा है कि राज्य में २०२३ के विधानसभा चुनावों तक यह समझ कायम रहेगी। यह भी साफ नजर आ रहा है कि राज्य बचाने का दबाव दोनों गुटों पर बना हुआ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार को सभी मंत्रियों के विभागों का बंटवारा कर दिया। जहां पहले की ही तरह उन्होंने वित्त और गृह विभाग अपने पास रखा। तो वहीं सचिन पायलट गुट के चारों मंत्रियों को कोई खास महत्व के विभाग दिए गए हों, ऐसा भी नहीं लगा। बावजूद इसके राजस्थान में फिलहाल के लिए तो सत्ताधारी पार्टी का अंदरूनी कलह समाप्त हो गया है, यह कहा जा सकता है। पायलट के समर्थक कुछ अन्य विधायकों को संसदीय सचिव, बोर्ड चेयरमैन और अन्य राजनीतिक नियुक्तियों में भी शामिल किया जा सकता है।
राजस्थान यह सत्ता बदलाव वाला राज्य है। यहां अमूमन ५ वर्षों में सत्ता बदल ही जाती है। परंतु इस बार कांग्रेस ने इस परंपरा को तोड़ने का संकल्प किया है। तभी तो राजस्थान के कांग्रेस प्रभारी अजय माकन जोर देकर कहते हैं कि हमें २०२३ के चुनावों में कई सालों के ट्रेंड को बदलना है। माना जा सकता है कि कांग्रेस प्रभारी सिर्फ यह कह ही नहीं रहे, काफी हद तक यह कर भी रहे हैं। गहलोत और पायलट गुटों को एक साथ लाकर मंत्रिपरिषद का विस्तार करना इसकी बानगी है। इस प्रयास के पुख्ता होने पर सचिन पायलट का वो बयान भी मुहर लगाता है जिसमें वे कहते हैं कि यहां लोग सोचते हैं कि राजस्थान में परिवर्तन होगा, हमें उस सोच को खत्म करना है। राजस्थान में २०२३ में हम फिर सरकार बनाएंगे। पायलट की ही तरह खुद मुख्यमंत्री गहलोत भी दावा करते हैं, ‘अगले चुनाव की तैयारी आज से शुरू हो गई है हमारी। जनता की सरकार से जो अपेक्षाएं हैं, उन्हें पूरा करके दिखाएंगे। हम जनता की भावनाओं और अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे और अगली बार फिर से सरकार बनाने में कामयाब होंगे।’
जनता की भावनाओं और अपेक्षाओं की बात करते वक्त गहलोत जब चुनाव जीतने और कामयाब होने का दावा करते हैं, तब यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने पार्टी आलाकमान और विशेष तौर पर पायलट गुट की भावनाओं और अपेक्षाओं के बारे में भी कुछ सोच रखा होगा। यदि उन्होंने यह सोचा नहीं होता तो शायद मंत्रिमंडल में कुछ निर्दलीय चेहरे भी नजर आते और गहलोत शपथ ग्रहण से पहले विधायकों की बैठक के दौरान राज्य कांग्रेस के कार्यालय में दावे से यह कहते हुए नजर नहीं आते कि राजस्थान में बार-बार सरकार बदलती है, लेकिन इस बार सरकार रिपीट करके दिखाएंगे। पूरी कांग्रेस एकजुट है।
राजस्थान में गहलोत सरकार बचाने में निर्दलीय विधायकों ने अहम भूमिका निभाई थी, ऐसे में माना जा रहा था कि मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें भी स्थान मिलेगा। जब ऐसा नहीं हुआ तो आशंका व्यक्त की जाने लगी कि ये निर्दलीय विधायक इसका विरोध करेंगे। परंतु आश्चर्यजनक ढंग से ऐसा नहीं हुआ, बल्कि निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने तो यहां तक कह दिया कि हमने भाजपा की नापाक हरकत को विफल करने के लिए हमेशा सरकार का समर्थन किया है और आगे भी करते रहेंगे। मंत्रिमंडल में जगह नहीं पाने वाले छह विधायकों को रविवार रात मुख्यमंत्री के सलाहकार पद पर नियुक्त कर दिया। इनमें तीन निर्दलीय विधायक हैं। यहां निश्चित तौर पर गहलोत सियासी समीकरण बिठाने में सफल रहे हैं। इसीलिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब यह जोर देकर कहते हैं कि सभी वर्गों और कार्यकर्ताओं का सम्मान करने के लिए नई कैबिनेट बनी है। प्रयास किया है कि एससी/एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक सभी को वैâबिनेट में लिया जाए। सभी लोग बहुत खुश हैं। तो उनके खुश होने का कारण भी साफ नजर आता है। आलाकमान का उन पर भरोसे का असर भी दिखता है। रविवार का यही भरोसा सोमवार को मंत्रिपरिषद के नए मंत्रियों के विभागों के बंटवारे के वक्त भी दिखता है, जहां वो एक बार फिर २०२३ के विधानसभा चुनाव में राज्य में फिर कांग्रेस की सरकार बनाने का विश्वास जताते हैं।
हालांकि यह जितना सच है, उतना ही सच यह भी है कि गहलोत की इस खुशी में विपक्षी खलल डालने का हरसंभव प्रयास भी करेंगे। चाहे वो निर्दलीयों के माध्यम से हो या फिर पार्टी के असंतुष्टों के जरिए। पार्टी में कहीं न कहीं कलह पैदा करके भाजपा उस कलह में विद्रोह का तेल डालने का प्रयास अवश्य करेगी। अलबत्ता, कुछ हद तक ही सही इस विद्रोह को रोकने का इंतजाम भी गहलोत यह कहकर कर चुके हैं कि जो मंत्री नहीं बन पाए, उनकी भूमिका कम नहीं है। जो बच गए हैं उन्हें भी एडजस्ट किया जाएगा। हमारा प्रयास है कि अधिकतर विधायकों को एडजस्ट कर लें। हम उन्हें बोर्ड चेयरमैन, सीएम एडवाइजर बनाएंगे। राज्य में दलित मंत्री न होने की बात कई बार सचिन पायलट ने उठाई थी और अब चार दलित विधायकों को मंत्री बनाया जा चुका है, महिला मंत्रियों की संख्या भी बढ़ाई गई है और आदिवासी व जाट नेताओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में ब्राह्मणों का भी खयाल रखा गया है। हर तरह से कांग्रेस २०२३ की लड़ाई लड़ने को तैयार हो चुकी है और समय रहते उसने अपनी टीम भी पुख्ता कर ली है, पर जब भाजपा प्रवक्ता रामलाल शर्मा कहते हैं कि निश्चित रूप से विधायकों में नाराजगी है। वरिष्ठ नेताओं की उम्मीद थी कि सरकार में हमें मान सम्मान मिलेगा। कांग्रेस ने दीपेंद्र शेखावत, भरत सिंह, रामनारायण जैसे वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर दिया है। १३ निर्दलीय विधायकों में से एक भी मंत्री नहीं बनाए गए हैं। आनेवाले समय में इन सबकी नाराजगी देखने को मिलेगी.., तब कांग्रेस के कान खड़े हो जाने चाहिए और उसे कम से कम यह तो समझ ही लेना चाहिए कि नाराज विधायकों के मन में चाहे जो चल रहा है पर उसे लेकर भाजपा के मन में क्या चल रहा है?
भाजपा के रामलाल शर्मा जब अपनी बातों में यह जोड़ते हैं और कहते हैं कि बृजेंद्र ओला पहले दमदार मंत्री रहे हैं, अब उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया है। मुरारीलाल मीणा को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है। इस तरह से पायलट गुट को साफ किया गया है। सचिन पायलट अपने राजनीतिक भविष्य के लिए भले चाहे जैसे बयान दें, लेकिन हकीकत यही है कि पायलट समर्थक विधायकों को दरकिनार किया गया है। यह अपने आप में यह दर्शाने के लिए काफी है कि कांग्रेस का कमजोर पक्ष क्या है और राज्य में उसके सियासी दुश्मन को उसका कितना आभास है। राजस्थान भाजपा भलीभांति जानती है कि कुछ असंतुष्ट कांग्रेसी व कुछ निर्दलीय विधायक गहलोत सरकार की कमजोर कड़ी हैं। गहलोत लाख कोशिश कर लें तब भी वे सभी को तो खुश नहीं कर सकते। उन्हीं नाखुशों की भाजपा को अगले चुनाव तक शिद्दत से तलाश रहेगी। हालांकि अधिकांश भाजपाई तो खुद ही पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा की कद्दावर नेता वसुंधरा राजे सिंधिया से नाखुश हैं। लिहाजा राजस्थान में आनेवाले पूरे वर्ष सियासी सस्पेंस का माहौल बना रहेगा। विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ जब खुद ट्वीट करके कहें कि असंतुलित मंत्रिमंडल कब तक संतुलित होकर चलता है, यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा, तब इस पर विचार करना जरूरी भी हो जाता है।