" /> यूपी में तस्वीरें बोल रही हैं और…ध्रुवीकरण से धरती डोल रही है!!

यूपी में तस्वीरें बोल रही हैं और…ध्रुवीकरण से धरती डोल रही है!!

यूपी में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, वहां नेता तो क्या, अब तो तस्वीरें भी बोलने लगी हैं। कहीं कोई तस्वीर यह दास्तां बयां करती है कि यहां सभी जाति और धर्म के लिए समान नजरिया है तो कोई तस्वीर यह बताने का प्रयास करती है कि यूपी में विपक्षी पार्टियां किस तरह नाकारा हैं? इन सबके बीच जब अचानक से आई कुछ तस्वीरें यह दर्शाने का भरसक प्रयास करें कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में दिल्ली और लखनऊ के बीच सामंजस्य की कोई कमी नहीं है तो अनायास ही सभी का ध्यान उन तस्वीरों पर टिक जाता है और उन तस्वीरों का साफ-साफ कारण समझते भी देर नहीं लगती। यदि कोई कहे कि इसके पीछे कोई कारण ही नहीं है, तो यह भी समझना जरूरी हो जाता है कि तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ बाकायदा ‘फोटो सेशन’ कराने की जरूरत क्यों पड़ी? आज के दौर में जब सियासत में कोई काम बेवजह नहीं होता तब इतना बड़ा फोटो सेशन क्यों? कोई तो वजह होगी? और वो वजह सियासी न हो, ऐसा हो नहीं सकता!
खैर, पिछले ५ सालों से मोदी और योगी के बीच गर्मजोशी से हाथ मिलाने की एक अदद तस्वीर की जिन्हें दरकार थी, उन्हें अचानक से योगी के कंधे पर हाथ रखे कॉरिडोर में इत्मीनान से गहन चर्चा करते हुए मोदी की कई हाई रिजोल्यूशन तस्वीरें मिल जाएं तो इन हाई रिजोल्यूशन तस्वीरों के पीछे का ‘हाई रिजोल्यूशन’ मैसेज भी उन्हें समझ ही लेना चाहिए। समझ लेना चाहिए कि ये कोई साधारण घटना नहीं हैं। इसके पीछे २०२२ के चुनावों का जबरदस्त मैसेज छिपा है। इसलिए इन तस्वीरों को रूटीन घटनाक्रम मान लेना उचित नहीं होगा। भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों की ओर से यह ये दर्शाने का कारगर प्रयास है कि योगी आदित्यनाथ पर प्रधानमंत्री मोदी को कितना भरोसा है, दोनों के बीच कितना आत्मीय तालमेल भी है। राज्य में जब चुनाव हों तो ऐसी तस्वीरें जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ती ही हैं, यह कौन नहीं जानता। अलबत्ता, अब जब ये तस्वीरें आ ही गई हैं तो कम से कम, ये उन आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए काफी होंगी, जो अमूमन यह आरोप लगाते थे कि दोनों के बीच केमिस्ट्री कुछ ठीक नहीं है… या उन लोगों के लिए भी, जो कहते थे कि यूपी के सार्वजनिक कार्यक्रमों तक में मोदी योगी से कटे-कटे से रहते हैं, वे यूपी दौरे के वक्त जितनी गर्मजोशी से दूसरों से मिलते हैं, शायद उतनी गर्मजोशी योगी से मिलते वक्त नहीं होती। इन तस्वीरों के आ जाने के बाद अब शायद उन सभी के पास उंगली उठाने को कुछ खास नहीं बचे। हां, तब भी राजनैतिक गलियारे में तो इस पर चिंतन-मंथन होता ही रहेगा।
यूपी में तस्वीरों की दास्तां केवल यहीं तक सीमित नहीं है। इन दिनों योगी आदित्यनाथ सार्वजनिक मंचों पर हों या किसी यात्रा पर, वे सभी से जोरदार ढंग से मिलते हैं। वे ऐसा शायद ही कोई मौका छोड़ते हों, जहां कोई फोटो अपॉर्चुनिटी नजर आ रही हो। वे कभी ब्राह्मणों को सम्मानित करते हुए नजर आ जाते हैं तो कभी कहीं किसी बच्चे को गोद में लेकर खिलाते हुए दिख पड़ते हैं। हो सकता है यह कवायद आम ही हो पर चुनाव प्रबंधन के युग में राजनीतिक पंडित इसमें चुनावी रंग खोज ही लेते हैं। क्योंकि चुनावी वर्ष में राजनेताओं की ‘फोटोजनिक’ छवि काफी मायने जो रखती है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की छवि एक सख्त प्रशासक के तौर पर बनाई थी। चुनाव के वक्त अब उनकी वही सख्त छवि कहीं अड़चन न बन जाए, इसलिए उनका उदार चेहरा भी दिखाना जरूरी है। लोगों को ये तस्वीरें उसी कड़ी से जुड़ी नजर आ रही हैं।
भाजपा को सत्ता में बने रहने और सम्मानजनक सीटें हासिल करने के लिए कई तबकों की नाराजगी दूर करने की जरूरत है, यह पार्टी आलाकमान बेहतर जानता है। इसलिए शायद कृषि कानून वापसी के साथ-साथ गैस सिलिंडर पर सब्सिडी बहाली और गरीब कल्याण योजना को एक्सटेंशन देने जैसे प्रभावी कदम आनन-फानन में उठाए गए हैं। जातिगत नाराजगी दूर करने के भी हर स्तर पर भरसक प्रयास हो रहे हैं। ये होने भी चाहिए थे क्योंकि यूपी में ब्राह्मणों का एक बड़ा तबका सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से नाराज है तो छोटी जातियों के किसानों का एक बड़ा तबका भाजपा के ‘ब्राह्मण’ मंत्री से। लखीमपुर खीरी कांड के बाद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा यूपी में भाजपा के गले की हड्डी बन गए हैं। उनसे नाराज किसानों का एक बड़ा वर्ग भाजपा से दूरी बनाए हुए है। उनकी नाराजगी कृषि कानूनों की वापसी से काफी हद तक कम जरूर हुई है पर वो पूरी तरह से खत्म हो गई हो, ऐसा भी नहीं है। उनकी ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं कि उन परिवारों का क्या, जिनके परिवारजन कार से कुचलकर मारे गए। इसीलिए जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का फोटो सेशन होता है तो मंत्री अजय कुमार मिश्रा को उस सार्वजनिक तस्वीर से दूर रखा जाता है, ताकि उत्तर प्रदेश के चुनाव पर उनकी छाप पड़ने से रोकी जा सके। हालांकि तब भी भाजपा को अंदरखाने यह सवाल जरूर सालता होगा कि आखिर लखीमपुर पीड़ितों के दिलों पर पड़ी छाप वैâसे मिटेगी?
एक कहावत है, जहर ही जहर को काटता है। विपक्ष, खासकर अखिलेश यादव इस कहावत के मायने बेहतर जानते होंगे। इसलिए जब केशव प्रसाद मौर्य राज्य में ३०० से अधिक सीटों पर कमल खिलाने का विश्वास जता रहे होते हैं, तब अखिलेश यादव की मित्र दलों के साथ आर्इं कुछ फोटो उनके विश्वास को डिगाने के लिए काफी नजर आती हैं। भाजपा जानती है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपना दल, आम आदमी पार्टी और आरएलडी समेत ८ से ९ दलों के साथ मजबूती से ‘कमल कुचलने’ के कार्यक्रम की भूमिका बना रहे हैं। उनकी ओर से जारी तस्वीरें इसका साफ-साफ संकेत भी देती हैं। ये तस्वीरें भी निश्चित तौर पर मतदाताओं के दिमाग पर मजबूती से असर छोड़ेंगी, इसका भी भाजपा को भली-भांति अनुमान है। ऐसे में भाजपा के लिए लखीमपुर खीरी की विभक्त तस्वीरों का असर कम कर, दूसरी तस्वीरों की ओर जनता का रुख मोड़ना भी जरूरी हो जाता है। वे तस्वीरें वीभत्स न भी हों तो कोई बात नहीं, पर उनमें ध्यान बंटाने की क्षमता तो जरूर ही होनी चाहिए। लिहाजा भाजपा के सांसद-मंत्रियों से लेकर आम कार्यकर्ता तक आए दिन कोई न कोई तस्वीर ट्वीट कर ही देते हैं। न जाने कौन सी तस्वीर काम कर जाए।
खैर, यूपी में कट्टरवाद की ज्वालामुखी अंदर ही अंदर धड़क रही है। कुछ छोटी-मोटी पार्टियां कट्टरवाद की उस आग में र्इंधन का काम कर रही हैं। लिहाजा यूपी में कभी भी कोई भीषण विस्फोट हो सकता है। भाजपा और योगी भले ही अपने ‘सुशासन’ के लिए खुद की पीठ थपथपा रहे हों, अपने छोट-मोटे नामांतरण और सुधार के निर्णयों पर आश्वस्त होकर बैठे हों, पर वे निश्चित तौर पर यूपी में बढ़ रहे धार्मिक उन्माद से बेखबर नहीं होंगे। बेखबर वे इस बात से भी नहीं होंगे कि इस वक्त जरूरत से ज्यादा ध्रुवीकरण यूपी की जड़ों को खोखला कर रहा है। इतना खोखला कि आने वाले वक्त में उसका भयंकर खामियाजा भुगतना पड़ेगा। न केवल यूपी को बल्कि पूरे देश को भी। तब उन तस्वीरों का कोई मोल नहीं होगा जो इन दिनों भारतीय जनता पार्टी का हर एक नेता खोज रहा है, क्योंकि तब राज्य की कुल तस्वीर ही अलग होगी और उसकी कल्पना शायद सत्ताधारी पार्टी ने भी नहीं की होगी। आज सत्ताधारी भाजपा के लिए चुनावी तस्वीरों से ज्यादा राज्य की असल तस्वीर पर गौर करने की जरूरत है। इस फोटोजनिक इमेज को तो लोग समय के साथ भूल जाएंगे परंतु जो तस्वीर उसकी नाक के नीचे बन रही है वो आने वाले लंबे वक्त तक न भुलाई जा सकेगी और न ही मिटाई जा सकेगी।