" /> देर आए, दुरुस्त आए!, लिख दी गई है ताजपोशी की स्क्रिप्ट, बदलाव के सकारात्मक संदेश

देर आए, दुरुस्त आए!, लिख दी गई है ताजपोशी की स्क्रिप्ट, बदलाव के सकारात्मक संदेश

अब से छह माह बाद कांग्रेस का पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। संगठन में हुए बदलाव से संकेत मिले हैं कि कमान एक बार फिर राहुल गांधी को ही सौंपी जाएगी। दरअसल, फेरबदल में छिपे राजनीतिक संदेश उसी तरफ इशारा कर रहे हैं। फेरबदल को लेकर हल्ला मचानेवाले और सार्वजनिक रूप से पार्टी की आलोचना करने वाले वरिष्ठतम नेता आजाद साहब के पर पूरी तरह से कतर दिए गए हैं। आजाद पर गाज गिरेगी ये तो उसी दिन से तय था जब उन्होंने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे। उसी दिन से वह गांधी परिवार के निशाने पर आ गए थे। पिछली सीडब्ल्यूसी मीटिंग में उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का अध्यक्ष गांधी परिवार से अलग का बनना चाहिए। फिलहाल जो बदलाव हुए हैं, उनमें राजनीतिक रूप से कई सियासी मायने छिपे हैं, जिसका असर अगले छह माह के भीतर दिखेगा।
कांग्रेस अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव के लिए हवा अभी से राहुल गांधी के पक्ष में बनाई जा रही है। पार्टी-संगठन में किए फेरबदल में राहुल के करीबियों पर नेतृत्व ने फिर भरोसा जताते हुए अहम जिम्मेदारी सौंपी है, जिसने राहुल की कमान लेने की संभावना को पुख्ता किया है। पार्टी में फेरबदल राहुल के भविष्य को ध्यान में रखकर किया गया है। संदेश स्पष्ट है कि उन्हें ही पार्टी की दोबारा कमान सौंपी जाएगी।

कांग्रेस का मतलब, गांधी परिवार! इसलिए मुश्किल लगता है कि कभी कांग्रेस खुद को गांधी परिवार से अलग भी कर पाएगी। छह महीने बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव होना निश्चित है। शायद वोटिंग हो या सर्वसम्मति से अध्यक्ष पद का चुनाव हो। लेकिन अगला अध्यक्ष कौन बनेगा, उसकी पूरी पटकथा लिख दी गई है। दरअसल, बिखरे संगठन, दूर होते कार्यकर्ता, मुंह मोड़ते मतदाता व हार देखकर कांग्रेस पार्टी अब खुद को रिफॉर्म करना चाहती है। इस दिशा में पहला कदम बढ़ा भी दिया है।
दरअसल २०१४ का लोकसभा हारने के बाद कांग्रेस नेताओं ने जनता से जुड़ाव एकदम खत्म कर दिया। कमोबेश, जनता ने भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया। पांच-छह सालों में जितने भी छोटे-बड़े चुनाव हुए, जनता ने कांग्रेस से दूरी बनाई। वहीं, दूसरा कारण पार्टी में अनुशासन की कमी होती गई। क्षेत्रीय नेताओं की अनदेखी भी हुई। कांग्रेस अब गंभीरता से मंथन कर रही है।
पार्टी-संगठन में बदलाव होने शुरू हो गए हैं। युवा नेताओं को तवज्जो दिए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। बदलाव को लेकर कांग्रेस पार्टी में अंदरखाने उठे ज्वालामुखी को शांत करने का भी प्रयास हो रहा है। कई अप्रत्याशित और अचंभित करने वाले बदलाव किए जा रहे हैं। बदलाव की मांग करनेवाले कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में गिने जानेवाले गुलाम नबी आजाद को किनारे कर दिया गया है। अब से छह माह बाद कांग्रेस का पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। संगठन में हुए बदलाव से संकेत मिले हैं कि कमान एक बार फिर राहुल गांधी को ही सौंपी जाएगी। दरअसल, फेरबदल में छिपे राजनीतिक संदेश उसी तरफ इशारा कर रहे हैं। फेरबदल को लेकर हल्ला मचानेवाले और सार्वजनिक रूप से पार्टी की आलोचना करने वाले वरिष्ठतम नेता आजाद साहब के पर पूरी तरह से कतर दिए गए हैं। आजाद पर गाज गिरेगी ये तो उसी दिन से तय था जब उन्होंने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे। उसी दिन से वह गांधी परिवार के निशाने पर आ गए थे। पिछली सीडब्ल्यूसी मीटिंग में उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का अध्यक्ष गांधी परिवार से अलग का बनना चाहिए। फिलहाल जो बदलाव हुए हैं, उनमें राजनीतिक रूप से कई सियासी मायने छिपे हैं, जिसका असर अगले छह माह के भीतर दिखेगा।
कांग्रेस अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव के लिए हवा अभी से राहुल गांधी के पक्ष में बनाई जा रही है। पार्टी-संगठन में किए फेरबदल में राहुल के करीबियों पर नेतृत्व ने फिर भरोसा जताते हुए अहम जिम्मेदारी सौंपी है, जिसने राहुल की कमान लेने की संभावना को पुख्ता किया है। पार्टी में फेरबदल राहुल के भविष्य को ध्यान में रखकर किया गया है। संदेश स्पष्ट है कि उन्हें ही पार्टी की दोबारा कमान सौंपी जाएगी। पार्टी में जो बदलाव हुए हैं उनमें ज्यादातर राज्यों की जिम्मेदारी राहुल के करीबियों को सौंपी गई है। तारिक अनवर जैसे बड़े नाम जिन्हें खुद राहुल गांधी एनसीपी से लेकर आए हैं। ऐसे नामों को वह अपने पूर्व के कार्यकाल में बड़ी जिम्मेदारियां सौंपना चाहते थे। लेकिन तब ऐसा नहीं होने दिया गया पर उनके लिए अब रास्ते खोल दिए गए हैं। यही कारण है कि तारिक अनवर को महासचिव के अलावा अपने संसदीय क्षेत्र राज्य केरल की भी जिम्मेदारी सौंपी है।
राहुल गांधी खेमे के ऐसे और भी नाम हैं जिन्हें तवज्जो दी गई है। हाल ही में अजय माकन को महासचिव बनाने के बाद तय हो गया था कि अब युवाओं को अहम जिम्मेदारियां दी जाएंगी। हुआ भी कुछ वैसा ही। युवा चेहरों में देवेंद्र यादव को उत्तराखंड, राजीव जाटव को गुजरात, राजीव शुक्ला को हिमाचल प्रदेश, विवेक बंसल को हरियाणा, मनीष चतरथ को अरुणाचल, जितेंद्र सिंह को असम और जितिन प्रसाद को पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी मिली है। राहुल गांधी के भरोसेमंद रणदीप सिंह सुरजेवाला को महासचिव बनाकर कर्नाटक की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही पीएल पूनिया, शक्ति सिंह गोहिल, आरपीएन सिंह की जिम्मेदारी पहले की तरह बरकरार है।
बिहार चुनाव को ध्यान में रखकर भी बदलाव किए गए हैं। उसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस इस बात को स्वीकारती है कि पूर्व में उनसे कुछ गलतियां हुर्इं, जिसका फायदा भाजपा को प्रत्यक्ष रूप से हुआ। जनता से कांग्रेस नेताओं ने कनेक्टिविटी खत्म कर दी थी। जनता ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने भी पार्टी से दूर बनाई। दूरी बनाने का नतीजा क्या हुआ, परिणाम सामने है। उनका जो अपना कैडर वोट हुआ करता था, वह भी सिमट गया। लेकिन इस तल्ख हकीकत को कांग्रेस सब कुछ लुटा देने के बाद समझी। खैर, देर आए दुरुस्त आए। नरेंद्र मोदी से मुकाबले करने के लिए कांग्रेस युवाओं से सजाई गई है। नए सिरे से कार्य योजनाएं बनाई गई हैं। देखते हैं संगठन में किए बदलाव का कितना फायदा मिलता है?