" /> यादों के झरखों से : नाच का जादू

यादों के झरखों से : नाच का जादू

सन् १९७१ में निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म ‘कटी पतंग’ जब रिलीज हुई तो दर्शक ‘शब्बो’ पर फिदा फिदा हो गए। बिजली की तेज गति से नाचनेवाली बिंदू जब नाचते हुए गाती हैं, ‘मेरा नाम शबनम है, लोग मुझे प्यार से शब्बो कहते हैं…’। अपने थिरकते जिस्म और उत्तेजक मुस्कान से बिंदू ने दर्शकों पर अपने नाच का जादू चला दिया था।
वास्तव में बिंदू की पहली फिल्म थी ‘दो रास्ते’ जिसमें बिंदू ने खलनायिका की भूमिका निभाई थी। इसके बाद ‘इत्तफाक’ रिलीज हुई लेकिन इन दोनों फिल्मों के सफल होने के बाद भी उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। लेकिन फिल्म ‘कटी पतंग’ ने कमाल कर दिया। ‘कटी पतंग’ के बाद बिंदू के अभिनय की पतंग ऐसी उड़ी कि उन्होंने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। बिंदू केवल डांसर या खलनायिका की भूमिका ही नहीं करना चाहती थीं बल्कि वे चाहती थीं कि वे ऐसी भूमिका निभाएं जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाए। किंतु बिंदू को उस वक्त डांसर और वैंप के ही रोल मिल रहे थे। उस समय बिंदू को जो भी फिल्में मिलती गर्इं वे उन्हें स्वीकारती गर्इं। वजह ये थी कि उनके पिता का छोटी उम्र में देहांत हो चुका था और उन पर सात छोटी बहनों सहित एक भाई की जिम्मेदारी थी। एक ऐसा भी दौर आया जब बिंदू एक साथ ३२ फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थीं।
बचपन से ही बिंदू दिलीप कुमार की फिल्में देखा करती थीं और ये कल्पना करती थीं कि जब वे अभिनेत्री बनेंगी तब दिलीप कुमार के साथ जरूर काम करेंगी। अभिनेत्री बनने के बाद जब वे पार्टियों में दिलीप कुमार को देखतीं तो वे मन ही मन सोचतीं कि उन्हें कब मौका मिलेगा दिलीप कुमार के साथ काम करने का। लेकिन सौभाग्य से उन्हें बहुत इंतजार नहीं करना पड़ा। बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘दास्तान’ में बिंदू को दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिल ही गया। आखिरकार वो दिन भी आ गया जब वैâमरे के सामने बिंदू दिलीप कुमार के सामने खड़ी थीं। बिंदू के दिल की धड़कनें तेज चल रही थीं। मन कहीं ऊंचे आकाश में उड़ रहा था। प्रसन्नता का ऐसा आलम था कि उसे वे शब्दों में नहीं बांध सकती थीं।
दिलीप कुमार के साथ काम करने के बाद ऐसा ही आनंद उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘अभिमान’ में काम करने के दौरान मिला। फिल्म की आउटडोर शूटिंग हरिद्वार में चल रही थी। एक दिन शाम को शूटिंग खत्म कर यूनिट जब लौट रही थी तो बिंदू कार में ड्राइवर के बगलवाली सीट पर बैठी थीं और पीछे की सीट पर अमिताभ बच्चन बैठे थे। उन दिनों बिंदू को पान खाने का बेहद शौक था। बिंदू मुंह में पान दबाए बड़े शौक से उसे चबा रही थीं और पीछे खड़की से बाहर थूकती जा रही थीं। आधे रास्ते के बाद जब कार एक रेस्तरां के पास खाना खाने के लिए रुकी और सभी लोग कार से बाहर निकले। बाहर निकलते ही जब बिंदू की नजर अमिताभ बच्चन के कुर्ते पर पड़ी तो कुर्ता बिंदू के पान की पीक से छींटदार बन गया था। ये देखकर बिंदू सन्न रह गर्इं और मन ही मन ये सोचने लगीं कि इतने बड़े स्टार होने के बावजूद अमिताभ सारे रास्ते चुप रहे और उन्होंने बिंदू से कुछ भी नहीं कहा। बिंदू ने जब अमिताभ से बार-बार माफी मांगी तो अमिताभ सहज भाव से बोले, ‘आपको माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। आपने ये सारी छपाई कोई जानबूझकर तो नहीं की है।’ उस दिन बिंदू ने ये महसूस किया कि जीवन में ऊंचाइयों को छूने और उन्हें हासिल करने के लिए अमिताभ जैसी सहनशीलता और विनम्रता भी होनी चाहिए। साधारण आदमी ऐसी ही विशेषताओं से बड़ा और विशेष इंसान बनता है। ढेर सारी फिल्मों में अपना जौहर दिखानेवाली बिंदू का वैवाहिक जीवन हर तरह से सुखी रहा किंतु वे मातृत्व सुख से वंचित रहीं। विवाह के ८ वर्षों बाद जब बिंदू मां बननेवाली थीं तो डॉक्टरों ने उन्हें डांस करने से रोका। लेकिन एक शूटिंग के दौरान काम के प्रति समर्पित बिंदू का कदम गलत पड़ जाने से उन्हें गर्भपात हो गया और वे हमेशा के लिए मां बनने से वंचित हो गर्इं।

-नरेंद्र उपाध्याय