" /> ड्रैगन के छक्के छुड़ाएंगे बोफोर्स!… सियाचिन व करगिल के युद्ध में हुई थी कारगर

ड्रैगन के छक्के छुड़ाएंगे बोफोर्स!… सियाचिन व करगिल के युद्ध में हुई थी कारगर

हिंदुस्थान के राजनीतिक मोर्चे पर हालांकि विवादास्पद बोफोर्स तोपें अच्छी साबित नहीं हुई हैं लेकिन विश्व के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड में सीजफायर से पहले सैनिकों के लिए ये एक अच्छी दोस्त साबित होती रही हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि वायु दबाव में इसका घर्षण बहुत ही कम होने के कारण इसकी मार करने की रेंज और क्षमता बढ़ जाती है। यही नहीं करगिल युद्ध में भी ये तोपें अपना कमाल दिखा चुकी हैं और अब इन्हें लद्दाख में चीन सीमा पर तैनात कर इनकी एक और परीक्षा की तैयारी है। उस स्थिति में अगर दोनों मुल्कों के बीच संघर्ष होता है तो बड़ी संख्या में बोफोर्स तोपों को अब लद्दाख में एलएसी पर युद्ध की स्थिति में तैयार रखा गया है।
सियाचिन हिमखंड में तैनात रहे एक तोपखाना रेजिमेंट के अधिकारी का मत था कि पाक गोलाबारी के लिए बोफोर्स एक अच्छा और करारा जवाब था क्योंकि इसकी खास विशेषताओं के कारण इसकी मारक क्षमता ३५ से ४५ किमी की दूरी और ऊंचाई तक बढ़ जाती है। अब यही उम्मीद चीन सीमा पर भी की जा सकती है। हालांकि अपनी रक्षा और प्रतिरक्षा की रणनीति में भारतीय सेना बोफोर्स के अतिरिक्त अन्य कुछ हथियारों को भी अपना दोस्त इस हिमखंड पर बना चुकी है, जिसमें १७ किमी से अधिक की दूरी तक मार करनेवाली १०५ मिमी की तोपें तो हैं, जो इस क्षेत्र में २३ किमी की दूरी तक मार करती हैं। हालांकि ऐसी तोपें अपनी अनुवृत तथा ठोस गति के कारण लक्ष्य को निशाना बनाने में कभी-कभी कठिनाई पेश करती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में सभी तोपखानों से अधिक १२० मिमी के मोर्टार का प्रयोग किया जाता है और रोचक बात इस हिमखंड के युद्धस्थल का यह है कि सीजफायर से पहले तक प्रतिदिन सैकड़ों गोले इन हथियारों से दागे जाते रहे हैं।