" /> पालघर की राखियों से चाइना चित!

पालघर की राखियों से चाइना चित!

चीन की राखियों के बहिष्कार करते हुए जिले की महिलाएं बांस की राखी बना रही हैं, इसकी चर्चा देश समेत विदेश में हो रही है। इन महिलाओं ने चाइना को चित कर दिया है। विक्रमगढ़ तालुका की रहनेवाली तकरीबन ९ ग्राम सभाओं की ३०० आदिवासी महिलाएं देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी नाम कमा रही हैं। इनकी बनाई हुई राखियां पोस्ट के माध्यम से कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत अन्य कई देशों में भेजी जा रही हैं।
विक्रमगढ़ तालुका के वेढ़ी गांव की आदिवासी महिलाएं बांस की डंडी छील कर राखी बना रही हैं, जिनके काम की चर्चा पूरे पालघर में हो रही है। ये महिलाएं कोरोना काल में अपने बेहतरीन काम के चलते अच्छी रकम भी कमा रही हैं। खेती का काम करते हुए ये महिलाएं कुछ घंटे ही बांस की राखियां बनाती हैं। पिछले एक महीने से ९ गांव की ३०० से अधिक महिलाएं राखी बना रही हैं। हर जगह इनके काम की चर्चा होने के कारण इन्हें अच्छा प्रतिसाद भी मिल रहा है। केशव सृष्टि नामक सामाजिक संस्था के ट्रस्टी संतोष गायकवाड़ इन आदिवासी महिलाओं का मार्गदर्शन करते हैं। संस्था की तरफ से इन महिलाओं को राखी बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया है। संतोष गायकवाड़ ने बताया कि महिलाओं की मेहनत रंग लाई है। बांस से राखी बनाने का काम इन महिलाओं का पहला प्रोजेक्ट है। लोगों से इन्हें काफी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। अब तक महिलाएं ५० हजार बांस की राखियां बना चुकी हैं और दस लाख राखी का ऑर्डर उन्हें मिला है, लेकिन वो इस साल संभव नहीं है। उम्मीद है अगले साल तक ये आंकड़े पूरे होंगे। गायकवाड़ ने बताया कि बांस की राखी बनाने के पीछे का मकसद केवल एक है कि हम अपने देश में बने सामानों को बेहतरीन मार्वेâटिंग करें। क्योंकि हमारे देश में चीन से भारी संख्या में सामान या राखी आयात की जाती हैं। ऐसे में अपने देश और राज्य में बने सामानों को खरीदना चाहिए, जिससे ग्रामीण क्षेत्रो में बसे ऐसे हुनर को एक अच्छा मंच मिले। गायकवाड़ ने बताया कि उन्हें देश के साथ विदेश से ऑर्डर मिल रहे हैं। कोरोना काल में राखी की सप्लाई करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि पोस्ट के माध्यम से इसकी सप्लाई की जा रही है।